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Bijnor News: इबादत और बरकतों का पाक महीना है रमजान
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एजाज अहमद
नजीबाबाद। बरकतों और अल्लाह की रहमतों का मुकद्दस महीना रमजान शुरू हो गया है। उलमा फरमाते हैं अल्लाह से नजदीकी बनाने, गुनाहों को माफ कराने और ज्यादा से ज्यादा इबादत करने का रमजान पाकीजा महीना है।
माह-ए-रमजान वह मुबारक महीना है जिसमें मुस्लिमों में बुराइयों से बचने, नेकी और इंसानियत पर चलने, अल्लाह से लौ लगाने जज्बा पैदा होता है। जामा मस्जिद के पेश इमाम मौलाना ईसा रमजान की फजीलत बयां करते हुए कहते हैं। ईमान वालों पर रोजे फर्ज किए गए हैं। रमजान के महीने में लोग खास इबादत करते हैं। गुनाहों से तौबा मांगते हैं। दिलों के मैल साफ करने और अल्लाह के नजदीक पहुंचने के लिए इस महीने में ज्यादा से ज्यादा इबादत की जाती है। यह वो पाक महीना है, जिसमें कुरान नाजिल हुआ। इस महीने ज्यादा से ज्यादा इबादत करें और सदका और खैरात को अमल में लाएं।
स्टेशन वाली मस्जिद के पेश इमाम मुफ्ती असरार फरमाते हैं कि मुकद्दस रमजान में तीन अशरे होते हैं। पहले 10 दिन रहमत, दूसरे 10 मगफिरत और आखिरी 10 दिन जहन्नुम से आजादी के लिए खास इबादतें की जाती हैं। रोजा हमें भूखे-प्यासे और आर्थिक रूप से कमजोरों के प्रति हमदर्दी का जज्बा जगाता है। इस महीने की जाने वाली इबादतों से बंदा अल्लाह के नजदीक पहुंचता है।
अलफलाह इस्लामिक अकैडमी के एमडी मुफ्ती मो. अरशद का कहते हैं रोजे मोमिनों पर फर्ज हैं और तरावीह पढ़ना सुन्नत है। रमजान के महीने में की जाने वाली इबादतों से खुश होकर अल्लाह ताला अपने बंदों पर बरकतों और रहमतों की बौछार करते हैं। उन्होंने कहा कि तरावीह पूरे महीने पढ़ने से ही मुकम्मल सवाब मिलता है।
छीपियान मस्जिद के पेश इमाम मौलाना लियाकत हुसैन फरमाते हैं रमजान वह मुकद्दस महीना है, जिसमें इंसान ग्यारह महीनों में किए गए गुनाहों को इबादत के जरिए माफ करा सकता है। रमजान के तीनों अशरों में तरावीह की खास अहमियत है। चंद दिनों की तरावीह खत्म होने के बाद पूरे महीने पढ़ना जरूरी है।
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नजीबाबाद। बरकतों और अल्लाह की रहमतों का मुकद्दस महीना रमजान शुरू हो गया है। उलमा फरमाते हैं अल्लाह से नजदीकी बनाने, गुनाहों को माफ कराने और ज्यादा से ज्यादा इबादत करने का रमजान पाकीजा महीना है।
माह-ए-रमजान वह मुबारक महीना है जिसमें मुस्लिमों में बुराइयों से बचने, नेकी और इंसानियत पर चलने, अल्लाह से लौ लगाने जज्बा पैदा होता है। जामा मस्जिद के पेश इमाम मौलाना ईसा रमजान की फजीलत बयां करते हुए कहते हैं। ईमान वालों पर रोजे फर्ज किए गए हैं। रमजान के महीने में लोग खास इबादत करते हैं। गुनाहों से तौबा मांगते हैं। दिलों के मैल साफ करने और अल्लाह के नजदीक पहुंचने के लिए इस महीने में ज्यादा से ज्यादा इबादत की जाती है। यह वो पाक महीना है, जिसमें कुरान नाजिल हुआ। इस महीने ज्यादा से ज्यादा इबादत करें और सदका और खैरात को अमल में लाएं।
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स्टेशन वाली मस्जिद के पेश इमाम मुफ्ती असरार फरमाते हैं कि मुकद्दस रमजान में तीन अशरे होते हैं। पहले 10 दिन रहमत, दूसरे 10 मगफिरत और आखिरी 10 दिन जहन्नुम से आजादी के लिए खास इबादतें की जाती हैं। रोजा हमें भूखे-प्यासे और आर्थिक रूप से कमजोरों के प्रति हमदर्दी का जज्बा जगाता है। इस महीने की जाने वाली इबादतों से बंदा अल्लाह के नजदीक पहुंचता है।
अलफलाह इस्लामिक अकैडमी के एमडी मुफ्ती मो. अरशद का कहते हैं रोजे मोमिनों पर फर्ज हैं और तरावीह पढ़ना सुन्नत है। रमजान के महीने में की जाने वाली इबादतों से खुश होकर अल्लाह ताला अपने बंदों पर बरकतों और रहमतों की बौछार करते हैं। उन्होंने कहा कि तरावीह पूरे महीने पढ़ने से ही मुकम्मल सवाब मिलता है।
छीपियान मस्जिद के पेश इमाम मौलाना लियाकत हुसैन फरमाते हैं रमजान वह मुकद्दस महीना है, जिसमें इंसान ग्यारह महीनों में किए गए गुनाहों को इबादत के जरिए माफ करा सकता है। रमजान के तीनों अशरों में तरावीह की खास अहमियत है। चंद दिनों की तरावीह खत्म होने के बाद पूरे महीने पढ़ना जरूरी है।