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Bijnor News: 28 पन्नों में आया आदेश, अपर अदालत में 122 महीना 22 दिन चला केस
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बिजनौर। 14 साल पहले जिले में चर्चित रहे प्रबल अग्रवाल हत्याकांड में सात आरोपियों को सजा सुनाई गई। यह आदेश 28 पन्नों में आया। वहीं तीन साल तक निचली अदालत चलने के बाद अपर अदालत में 122 महीना और 22 दिन सुनवाई हुई और फैसला सुनाया गया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि विवेचना की खामियों का लाभ दोषियों को नहीं मिल सकता है। प्रबल की हत्या का मामला अपर सत्र न्यायाधीश की कोर्ट में नौ मई 2016 को पहुंचा। इससे पहले इस केस पर निचली अदालत में सुनवाई हो रही थी। इसके बाद अपर सत्र न्यायाधीश की कोर्ट में यह मामला दस साल, दो महीना 22 दिन चला, जिसके बाद शुक्रवार को फैसला आया।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने दिलाई सजा
सातों आरोपियों को दोषी ठहराने के पीछे अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और मजबूत श्रृंखला को सबसे अहम आधार माना। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने घटनाक्रम की ऐसी कड़ी प्रस्तुत की, जो एक-दूसरे से जुड़कर आरोपियों की संलिप्तता की पुष्टि करती है और किसी अन्य संभावना की गुंजाइश नहीं छोड़ती।
पक्ष द्रोही घोषित किए गए मुकरने वाले गवाह
अदालत के आदेश जिक्र है कि गवाह मुकेश कुमार अग्रवाल, सौराज सिंह, मदन सिंह, सोनू शर्मा, अतुल कुमार अग्रवाल ने अपने बयान में घटना को लेकर इनकार कर दिया था। जिसके चलते अभियोजन पक्ष ने इन्हें पक्षद्रोही घोषित कर दिया।
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पुलिस ने विवेचना में की भारी लापरवाही
अदालत ने आदेश में कहा कि तत्कालीन विवेचकों ने आरोपियों के मोबाइल नंबरों की सीडीआर और लोकेशन नहीं ली, साथ ही जयंती समारोह में हो रही वीडियोग्राफी भी नहीं ली गई। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, एएसपी सिटी द्वारा सही तरीके से विवेचना को मॉनिटर करना प्रतीत नहीं होता है। विवेचना के संबंध में उक्त कृत्य, कार्यशैली को संदेह के घेरे में लाता है।
तत्कालीन एसपी और विवेचकों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश
अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि कैसे को कमजोर करने के लिए पुलिस ने सही तरीके से विवेचना नहीं की। जिसके चलते अदालत ने तत्कालीन एसपी, तत्कालीन एएसपी सिटी, सीओ और तीन विवेचकों के खिलाफ विभागीय जांच और कानूनी कार्रवाई करने तथा उक्त कार्रवाई से अदालत को 6 महीने के अंदर अवगत कराने के आदेश डीजीपी को दिए हैं। बता दें कि तत्कालीन विवेचक राकेश वशिष्ठ सीओ के पद से रिटायर हो चुके हैं। तत्कालीन सीओ राजेश सिंह की मौत हो चुकी है। ऐसे में अब विवेचक अब्दुल सलाम, सुनील प्रताप और राकेश वशिष्ठ पर ही कार्रवाई हो सकती है।
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परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने दिलाई सजा
सातों आरोपियों को दोषी ठहराने के पीछे अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और मजबूत श्रृंखला को सबसे अहम आधार माना। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने घटनाक्रम की ऐसी कड़ी प्रस्तुत की, जो एक-दूसरे से जुड़कर आरोपियों की संलिप्तता की पुष्टि करती है और किसी अन्य संभावना की गुंजाइश नहीं छोड़ती।
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पक्ष द्रोही घोषित किए गए मुकरने वाले गवाह
अदालत के आदेश जिक्र है कि गवाह मुकेश कुमार अग्रवाल, सौराज सिंह, मदन सिंह, सोनू शर्मा, अतुल कुमार अग्रवाल ने अपने बयान में घटना को लेकर इनकार कर दिया था। जिसके चलते अभियोजन पक्ष ने इन्हें पक्षद्रोही घोषित कर दिया।
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पुलिस ने विवेचना में की भारी लापरवाही
अदालत ने आदेश में कहा कि तत्कालीन विवेचकों ने आरोपियों के मोबाइल नंबरों की सीडीआर और लोकेशन नहीं ली, साथ ही जयंती समारोह में हो रही वीडियोग्राफी भी नहीं ली गई। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, एएसपी सिटी द्वारा सही तरीके से विवेचना को मॉनिटर करना प्रतीत नहीं होता है। विवेचना के संबंध में उक्त कृत्य, कार्यशैली को संदेह के घेरे में लाता है।
तत्कालीन एसपी और विवेचकों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश
अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि कैसे को कमजोर करने के लिए पुलिस ने सही तरीके से विवेचना नहीं की। जिसके चलते अदालत ने तत्कालीन एसपी, तत्कालीन एएसपी सिटी, सीओ और तीन विवेचकों के खिलाफ विभागीय जांच और कानूनी कार्रवाई करने तथा उक्त कार्रवाई से अदालत को 6 महीने के अंदर अवगत कराने के आदेश डीजीपी को दिए हैं। बता दें कि तत्कालीन विवेचक राकेश वशिष्ठ सीओ के पद से रिटायर हो चुके हैं। तत्कालीन सीओ राजेश सिंह की मौत हो चुकी है। ऐसे में अब विवेचक अब्दुल सलाम, सुनील प्रताप और राकेश वशिष्ठ पर ही कार्रवाई हो सकती है।