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Bijnor News: मेरठ में हुआ था पोस्टमार्टम, स्पष्ट नहीं हुआ था मौत का कारण
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बिजनौर। चर्चित प्रबल अग्रवाल हत्याकांड में 16 जनवरी 2013 को मेरठ के सरदार वल्लभभाई पटेल संयुक्त चिकित्सालय में पोस्टमार्टम किया गया था। 15 जनवरी 2013 को हस्तिनापुर गंगा क्षेत्र में प्रबल का शव वहां एक स्थानीय व्यक्ति को मिला था। 26 दिन गंगा के पानी में शव पड़ा रहने से बुरी तरह क्षतविक्षत हो गया था। इस कारण डॉक्टर तत्काल मौत का कारण तय नहीं कर सके थे और विसरा जांच के लिए भेज दिया था।
केस डायरी में मौजूद पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार प्रबल अग्रवाल का शव तीन सप्ताह से ज्यादा पुराना बताया गया था। शव में सड़न इतनी अधिक थी कि शरीर का रंग हरा-काला पड़ चुका था। त्वचा कई स्थानों से उधड़ चुकी थी और चेहरा, गर्दन व शरीर के अन्य हिस्सों की पहचान करना भी मुश्किल हो गया था। आंखें, जीभ और कई मुलायम ऊतक पूरी तरह नष्ट हो चुके थे।
डॉक्टरों ने जांच के दौरान पेट में लगभग 90 ग्राम अधपचा भोजन मिलने का उल्लेख किया। मूत्राशय खाली पाया गया। सिर, गर्दन और शरीर के बाहरी हिस्सों में सड़न के कारण किसी स्पष्ट चोट का निष्कर्ष निकालना संभव नहीं हो सका। मामले की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टरों ने मस्तिष्क, फेफड़े, हृदय, यकृत, प्लीहा, दोनों गुर्दे तथा पेट की सामग्री सहित महत्वपूर्ण अंगों को सुरक्षित (प्रिजर्व) कर सीलबंद किया और रासायनिक परीक्षण (विसरा जांच) के लिए भेज दिया।
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केस लड़ने को तैयार नहीं थे वकील, बहन ने वकालत में लिया दाखिला
बिजनौर। प्रबल की हत्या करने वाले आरोपियों के रसूख और धनबल का दबदबा जजी में खूब चला। शुरुआत में प्रबल का केस लड़ने को वकील तैयार नहीं थे तो बहन प्राची ने वकालत की पढ़ाई करने की ठानी और एलएलबी में दाखिला लिया। हालांकि शादी होने के बाद वकालत की पढ़ाई बीच में छूट गई। सिर्फ दो साल तक ही एलएलबी की पढ़ाई कर सकीं। प्राची ने गणित से एमएससी, बीएड और एमफिल की डिग्री हासिल कर रखी है।
उधर प्रबल भी बीकॉम करने के बाद सीए की तैयारी में लगा था। प्राची ने बताया कि शुरुआत में प्रबल का केस लड़ने के लिए वकील तैयार नहीं हुए। बाद में सत्यपाल जंघाला ने केस लड़ने पर हामी भरी। इसी बीच एमएससी, एमफिल होने के बाद भी प्राची ने खुद वकील बनने का मन बनाया। 2014 में कृष्णा कॉलेज में दाखिला भी लिया और दो साल तक वकालत की पढ़ाई। 2016 में शादी और ससुराल चले जाने की वजह से वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी। उधर प्रबल का केस लड़ रहे अधिवक्ता सत्यपाल जंघाला की कोरोना काल में मृत्यु हो गई। इसके बाद प्राची को इस केस में कोई वकील नहीं मिला। अमरोहा और मेरठ से भी वकील बुलाए गए। प्राची बताती हैं कि दूसरे जिलों से वकील बुलाने के लिए खर्च ज्यादा आ रहा था। कोरोनाकाल के बाद अहमद जखावत ने इस केस को लड़ने की जिम्मेदारी ली।
मुकर गए थे 12 गवाह, पांच गवाही से सजा के अंजाम तक पहुंचा मुकदमा
बिजनौर। यूं तो प्रबल हत्याकांड में सात अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। मगर मुजरिमों ने केस को कमजोर करने की हरसंभव कोशिश की। जिन्होंने 12 गवाहों को अपने पक्ष में कर लिया था जोकि अदालत में गवाही से मुकर गए। सिर्फ पांच गवाही ही आरोपियों को सजा दिलाने में अहम साबित हुई।
19 दिसंबर 2012 को शहनाई बैंक्वेट हॉल में अग्रसेन जयंती कार्यक्रम के दौरान प्रबल अग्रवाल (23) की पीट पीटकर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद शव को गंगा में फेंक दिया गया। हत्या के छह महीने बाद ही बेटे की मौत के सदमे में आलोक अग्रवाल की मौत हो गई थी। पिता की मौत के बाद प्रबल की बहन प्राची ने अदालत में केस की पैरवी की।
प्राची ने बताया कि इस केस में 17 गवाह थे, जिनमें से 12 मुकर गए। सिर्फ पांच ने ही पक्ष में गवाही दी। प्रबल के मामा राजकुमार, रिश्ते के चाचा अनुराग रस्तोगी और प्राची की गवाही अहम रही। वहीं हस्तिनापुर के रहने वाले प्रवीण कुमार और अरविंद कुमार ने भी गवाही दी। बता दें कि हस्तिनापुर के पास गंगा नदी के तट पर झाड़ियों में सबसे पहले शव प्रवीण कुमार और अरविंद कुमार ने ही देखा था। जिसके चलते शव बरामद होने के संबंध में इनकी गवाही चली।
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अदालत में दो बार दाखिल हुए आरोप पत्र
बिजनौर। 20 दिसंबर 2012 को प्रबल के गायब होने पर शहर कोतवाली में गुमशुदगी दर्ज की गई थी। इसके बाद 23 दिसंबर को अपहरण में तरमीम किया गया। सात अगस्त 2013 को पहली बार छह आरोपियों के खिलाफ हत्या, अपहरण और साक्ष्य मिटाने के आरोप में आरोप पत्र दाखिल किया गया। इसके बाद दूसरा आरोप पत्र छह सितंबर 2013 को दाखिल किया गया। दूसरे आरोप पत्र में अनुज गुप्ता को आरोपी बनाया गया। मामले में 17 जनवरी 2013 को अदालत ने पुलिस से आख्या तलब की थी।
14 साल की लड़ाई, 352 तारीख के बाद इंसाफ की घड़ी आई
बिजनौर। 19 दिसंबर की रात प्रबल की हत्या हुई और 15 जनवरी 2013 को उसका शव मिला। 26 जुलाई 2013 को पुलिस ने कोर्ट में इस केस में आरोपपत्र दाखिल किया। 14 सालों तक चली इस इंसाफ की लड़ाई में 352 तारीख लगी। इसके बाद प्राची के लिए शुक्रवार को इंसाफ की घड़ी आ ही गई। सिफारिश, लालच और धमकियों के बीच प्रबल हत्याकांड के सातों अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। शुक्रवार को कोर्ट में मौजूद प्रबल की बहन प्राची ने बताया कि जिरह पूरी होने में ही एक साल का वक्त लग गया। आरोपियों के अधिवक्ता की ओर से हमेशा अगली तारीख लेने का प्रयास किया जाता था। जिरह के वक्त भी बात पूरी नहीं होती थी और तारीख ले ली जाती थी। इसके बावजूद उसने हार नहीं मानी और हर तारीख पर आती रही।
कभी नोएडा तो कभी लखनऊ से आकर लड़ा केस
इकलौते भाई प्रबल की हत्या के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए प्राची ने कम संघर्ष नहीं किया। प्राची ने बताया कि 2016 में उनकी शादी लखनऊ के अंकुर रस्तोगी के साथ हुई। अंकुर नोएडा में नौकरी करते हैं। ऐसे में कभी नोएडा तो कभी ससुराल लखनऊ से बिजनौर तारीख पर आना पड़ता था। प्राची ने बताया कि जजी में सुबह से लेकर शाम तक बैठी रहती थी। शाम को मालूम पड़ता था कि अगली तारीख लग चुकी है।
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केस डायरी में मौजूद पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार प्रबल अग्रवाल का शव तीन सप्ताह से ज्यादा पुराना बताया गया था। शव में सड़न इतनी अधिक थी कि शरीर का रंग हरा-काला पड़ चुका था। त्वचा कई स्थानों से उधड़ चुकी थी और चेहरा, गर्दन व शरीर के अन्य हिस्सों की पहचान करना भी मुश्किल हो गया था। आंखें, जीभ और कई मुलायम ऊतक पूरी तरह नष्ट हो चुके थे।
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डॉक्टरों ने जांच के दौरान पेट में लगभग 90 ग्राम अधपचा भोजन मिलने का उल्लेख किया। मूत्राशय खाली पाया गया। सिर, गर्दन और शरीर के बाहरी हिस्सों में सड़न के कारण किसी स्पष्ट चोट का निष्कर्ष निकालना संभव नहीं हो सका। मामले की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टरों ने मस्तिष्क, फेफड़े, हृदय, यकृत, प्लीहा, दोनों गुर्दे तथा पेट की सामग्री सहित महत्वपूर्ण अंगों को सुरक्षित (प्रिजर्व) कर सीलबंद किया और रासायनिक परीक्षण (विसरा जांच) के लिए भेज दिया।
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केस लड़ने को तैयार नहीं थे वकील, बहन ने वकालत में लिया दाखिला
बिजनौर। प्रबल की हत्या करने वाले आरोपियों के रसूख और धनबल का दबदबा जजी में खूब चला। शुरुआत में प्रबल का केस लड़ने को वकील तैयार नहीं थे तो बहन प्राची ने वकालत की पढ़ाई करने की ठानी और एलएलबी में दाखिला लिया। हालांकि शादी होने के बाद वकालत की पढ़ाई बीच में छूट गई। सिर्फ दो साल तक ही एलएलबी की पढ़ाई कर सकीं। प्राची ने गणित से एमएससी, बीएड और एमफिल की डिग्री हासिल कर रखी है।
उधर प्रबल भी बीकॉम करने के बाद सीए की तैयारी में लगा था। प्राची ने बताया कि शुरुआत में प्रबल का केस लड़ने के लिए वकील तैयार नहीं हुए। बाद में सत्यपाल जंघाला ने केस लड़ने पर हामी भरी। इसी बीच एमएससी, एमफिल होने के बाद भी प्राची ने खुद वकील बनने का मन बनाया। 2014 में कृष्णा कॉलेज में दाखिला भी लिया और दो साल तक वकालत की पढ़ाई। 2016 में शादी और ससुराल चले जाने की वजह से वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी। उधर प्रबल का केस लड़ रहे अधिवक्ता सत्यपाल जंघाला की कोरोना काल में मृत्यु हो गई। इसके बाद प्राची को इस केस में कोई वकील नहीं मिला। अमरोहा और मेरठ से भी वकील बुलाए गए। प्राची बताती हैं कि दूसरे जिलों से वकील बुलाने के लिए खर्च ज्यादा आ रहा था। कोरोनाकाल के बाद अहमद जखावत ने इस केस को लड़ने की जिम्मेदारी ली।
मुकर गए थे 12 गवाह, पांच गवाही से सजा के अंजाम तक पहुंचा मुकदमा
बिजनौर। यूं तो प्रबल हत्याकांड में सात अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। मगर मुजरिमों ने केस को कमजोर करने की हरसंभव कोशिश की। जिन्होंने 12 गवाहों को अपने पक्ष में कर लिया था जोकि अदालत में गवाही से मुकर गए। सिर्फ पांच गवाही ही आरोपियों को सजा दिलाने में अहम साबित हुई।
19 दिसंबर 2012 को शहनाई बैंक्वेट हॉल में अग्रसेन जयंती कार्यक्रम के दौरान प्रबल अग्रवाल (23) की पीट पीटकर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद शव को गंगा में फेंक दिया गया। हत्या के छह महीने बाद ही बेटे की मौत के सदमे में आलोक अग्रवाल की मौत हो गई थी। पिता की मौत के बाद प्रबल की बहन प्राची ने अदालत में केस की पैरवी की।
प्राची ने बताया कि इस केस में 17 गवाह थे, जिनमें से 12 मुकर गए। सिर्फ पांच ने ही पक्ष में गवाही दी। प्रबल के मामा राजकुमार, रिश्ते के चाचा अनुराग रस्तोगी और प्राची की गवाही अहम रही। वहीं हस्तिनापुर के रहने वाले प्रवीण कुमार और अरविंद कुमार ने भी गवाही दी। बता दें कि हस्तिनापुर के पास गंगा नदी के तट पर झाड़ियों में सबसे पहले शव प्रवीण कुमार और अरविंद कुमार ने ही देखा था। जिसके चलते शव बरामद होने के संबंध में इनकी गवाही चली।
अदालत में दो बार दाखिल हुए आरोप पत्र
बिजनौर। 20 दिसंबर 2012 को प्रबल के गायब होने पर शहर कोतवाली में गुमशुदगी दर्ज की गई थी। इसके बाद 23 दिसंबर को अपहरण में तरमीम किया गया। सात अगस्त 2013 को पहली बार छह आरोपियों के खिलाफ हत्या, अपहरण और साक्ष्य मिटाने के आरोप में आरोप पत्र दाखिल किया गया। इसके बाद दूसरा आरोप पत्र छह सितंबर 2013 को दाखिल किया गया। दूसरे आरोप पत्र में अनुज गुप्ता को आरोपी बनाया गया। मामले में 17 जनवरी 2013 को अदालत ने पुलिस से आख्या तलब की थी।
14 साल की लड़ाई, 352 तारीख के बाद इंसाफ की घड़ी आई
बिजनौर। 19 दिसंबर की रात प्रबल की हत्या हुई और 15 जनवरी 2013 को उसका शव मिला। 26 जुलाई 2013 को पुलिस ने कोर्ट में इस केस में आरोपपत्र दाखिल किया। 14 सालों तक चली इस इंसाफ की लड़ाई में 352 तारीख लगी। इसके बाद प्राची के लिए शुक्रवार को इंसाफ की घड़ी आ ही गई। सिफारिश, लालच और धमकियों के बीच प्रबल हत्याकांड के सातों अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। शुक्रवार को कोर्ट में मौजूद प्रबल की बहन प्राची ने बताया कि जिरह पूरी होने में ही एक साल का वक्त लग गया। आरोपियों के अधिवक्ता की ओर से हमेशा अगली तारीख लेने का प्रयास किया जाता था। जिरह के वक्त भी बात पूरी नहीं होती थी और तारीख ले ली जाती थी। इसके बावजूद उसने हार नहीं मानी और हर तारीख पर आती रही।
कभी नोएडा तो कभी लखनऊ से आकर लड़ा केस
इकलौते भाई प्रबल की हत्या के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए प्राची ने कम संघर्ष नहीं किया। प्राची ने बताया कि 2016 में उनकी शादी लखनऊ के अंकुर रस्तोगी के साथ हुई। अंकुर नोएडा में नौकरी करते हैं। ऐसे में कभी नोएडा तो कभी ससुराल लखनऊ से बिजनौर तारीख पर आना पड़ता था। प्राची ने बताया कि जजी में सुबह से लेकर शाम तक बैठी रहती थी। शाम को मालूम पड़ता था कि अगली तारीख लग चुकी है।