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Budaun News: पांच साल में दो हजार से ज्यादा जिंदगियां निगल गए सड़क हादसे
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राजकीय मेडिकल कॉलेज के पास स्थित तिराहा। संवाद
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बदायूं। जिले की सड़कें अब सफर का रास्ता कम और मौत का रास्ता ज्यादा बनती जा रही हैं। वर्ष 2021 से अब तक हुए सड़क हादसों में 2,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, बावजूद इसके हालात सुधारने के दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। प्रशासन हर साल सड़क सुरक्षा अभियान चलाता है, बैठकें होती हैं, योजनाएं बनती हैं, लेकिन सड़कों पर मौत का सिलसिला नहीं थम रहा।
जिले में तेज रफ्तार, ओवरलोड वाहन, खराब सड़कें, अंधे मोड़, अवैध कट और यातायात नियमों की अनदेखी जिले में हादसों की वजह बन चुकी है। जिले में 17 स्थानों को ब्लैक स्पॉट घोषित किया गया, लेकिन वहां सुरक्षा के इंतजाम आज भी अधूरे हैं। न पर्याप्त संकेतक लगे हैं। न बैरियर हैं। न ही रोशनी की ही समुचित व्यवस्था है। हालात यह हैं कि इन स्थानों पर भी लोग जान गवां रहे हैं।
लोगों का कहना है कि केवल चालान काटने और अभियान चलाने से हादसे नहीं रुकेंगे। दुर्घटना संभावित स्थानों पर इंजीनियरिंग सुधार, स्पीड कंट्रोल, सड़क किनारे सुरक्षा बैरियर, बेहतर प्रकाश व्यवस्था और प्रभावी निगरानी की जरूरत है। वहीं लोगों को भी यातायात नियमों के प्रति जिम्मेदार बनना होगा।
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हर आंकड़े के पीछे एक उजड़ा परिवार
पांच वर्षों में सड़क हादसों में गईं दो हजार से अधिक जानें सिर्फ आंकड़ें नहीं, बल्कि हजारों परिवारों का दर्द हैं। किसी ने बेटा खोया, किसी ने पिता तो किसी ने अपना जीवनसाथी। कई घरों की आर्थिक रीढ़ टूट गई, बच्चों की पढ़ाई छूट गई और परिवारों पर संकट का पहाड़ टूट पड़ा। हादसों के बाद कुछ दिन चर्चा होती है, लेकिन फिर सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। कछला में भी ओवरस्पीड की वजह से छह महिलाओं की जान चली गई थी।
ओवरस्पीड और लापरवाही बन रही सबसे बड़ी वजह
जिले में अधिकांश सड़क हादसों के पीछे तेज रफ्तार और लापरवाह ड्राइविंग मुख्य कारण बनकर सामने आ रही है। हाईवे और प्रमुख मार्गों पर वाहन चालक निर्धारित गति सीमा की अनदेखी करते हैं। कई बार चालक मोबाइल फोन पर बात करते हुए या ओवरटेक की होड़ में दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। भारी वाहन चालकों की लापरवाही भी हादसों की बड़ी वजह है। ट्रैक्टर-ट्रॉली, डंपर और ओवरलोड वाहनों के कारण सड़कें और अधिक खतरनाक हो गई हैं।
हादसों के बाद सबसे बड़ी चुनौती बनता है गोल्डन ऑवर
सड़क दुर्घटना के बाद का पहला एक घंटा ‘गोल्डन ऑवर’ माना जाता है। इस दौरान समय पर इलाज मिल जाए तो गंभीर रूप से घायल व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है, लेकिन जिले के ट्रॉमा सुविधाओं की कमी के कारण घायलों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। कई मामलों में लोग घंटों सड़क पर तड़पते रहते हैं। यदि हाईवे और प्रमुख मार्गों पर त्वरित चिकित्सा सहायता की व्यवस्था मजबूत हो जाए तो मौतों का आंकड़ा काफी हद तक कम किया जा सकता है।
-- -ऐसे बच सकती हैं कई जिंदगियां-- -- --
- निर्धारित गति सीमा का पालन करें।
- दोपहिया वाहन पर हेलमेट और चारपहिया में सीट बेल्ट जरूर लगाएं।
- ओवरटेक केवल सुरक्षित स्थान पर करें।
- नशे की हालत में वाहन न चलाएं।
- मोबाइल फोन का प्रयोग करते हुए ड्राइविंग न करें।
- रात में डिपर और हेडलाइट का सही इस्तेमाल करें।
- ब्लैक स्पॉट और अंधे मोड़ों पर विशेष सावधानी बरतें।
- थकान महसूस होने पर वाहन रोककर आराम करें।
पांच साल में हुए हादसों की संख्या
साल दुर्घटना मृतक घायल
2026 290 180 200
2025 650 393 574
2024 618 396 451
2023 576 349 452
2022 5 66 376 418
2021 497 351 354
जिले में अधिकतर मार्ग निर्माणाधीन हैं। इसके कारण कहीं-कहीं कट खुले हुए हैं, जिन्हें सुधारा जा रहा है। वहीं अवैध रूप से खुले हुए कटों को बंद कराने के लिए संबंधित अधिकारियों से वार्ता की जाएगी। साथ ही जिन ब्लैक स्पॉट पर सुरक्षा के इंतजाम नहीं वहां पर संकेतक लगवाए जाएंगे। - हरिओम, एआरटीओ
जिले में तेज रफ्तार, ओवरलोड वाहन, खराब सड़कें, अंधे मोड़, अवैध कट और यातायात नियमों की अनदेखी जिले में हादसों की वजह बन चुकी है। जिले में 17 स्थानों को ब्लैक स्पॉट घोषित किया गया, लेकिन वहां सुरक्षा के इंतजाम आज भी अधूरे हैं। न पर्याप्त संकेतक लगे हैं। न बैरियर हैं। न ही रोशनी की ही समुचित व्यवस्था है। हालात यह हैं कि इन स्थानों पर भी लोग जान गवां रहे हैं।
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लोगों का कहना है कि केवल चालान काटने और अभियान चलाने से हादसे नहीं रुकेंगे। दुर्घटना संभावित स्थानों पर इंजीनियरिंग सुधार, स्पीड कंट्रोल, सड़क किनारे सुरक्षा बैरियर, बेहतर प्रकाश व्यवस्था और प्रभावी निगरानी की जरूरत है। वहीं लोगों को भी यातायात नियमों के प्रति जिम्मेदार बनना होगा।
हर आंकड़े के पीछे एक उजड़ा परिवार
पांच वर्षों में सड़क हादसों में गईं दो हजार से अधिक जानें सिर्फ आंकड़ें नहीं, बल्कि हजारों परिवारों का दर्द हैं। किसी ने बेटा खोया, किसी ने पिता तो किसी ने अपना जीवनसाथी। कई घरों की आर्थिक रीढ़ टूट गई, बच्चों की पढ़ाई छूट गई और परिवारों पर संकट का पहाड़ टूट पड़ा। हादसों के बाद कुछ दिन चर्चा होती है, लेकिन फिर सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। कछला में भी ओवरस्पीड की वजह से छह महिलाओं की जान चली गई थी।
ओवरस्पीड और लापरवाही बन रही सबसे बड़ी वजह
जिले में अधिकांश सड़क हादसों के पीछे तेज रफ्तार और लापरवाह ड्राइविंग मुख्य कारण बनकर सामने आ रही है। हाईवे और प्रमुख मार्गों पर वाहन चालक निर्धारित गति सीमा की अनदेखी करते हैं। कई बार चालक मोबाइल फोन पर बात करते हुए या ओवरटेक की होड़ में दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। भारी वाहन चालकों की लापरवाही भी हादसों की बड़ी वजह है। ट्रैक्टर-ट्रॉली, डंपर और ओवरलोड वाहनों के कारण सड़कें और अधिक खतरनाक हो गई हैं।
हादसों के बाद सबसे बड़ी चुनौती बनता है गोल्डन ऑवर
सड़क दुर्घटना के बाद का पहला एक घंटा ‘गोल्डन ऑवर’ माना जाता है। इस दौरान समय पर इलाज मिल जाए तो गंभीर रूप से घायल व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है, लेकिन जिले के ट्रॉमा सुविधाओं की कमी के कारण घायलों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। कई मामलों में लोग घंटों सड़क पर तड़पते रहते हैं। यदि हाईवे और प्रमुख मार्गों पर त्वरित चिकित्सा सहायता की व्यवस्था मजबूत हो जाए तो मौतों का आंकड़ा काफी हद तक कम किया जा सकता है।
- निर्धारित गति सीमा का पालन करें।
- दोपहिया वाहन पर हेलमेट और चारपहिया में सीट बेल्ट जरूर लगाएं।
- ओवरटेक केवल सुरक्षित स्थान पर करें।
- नशे की हालत में वाहन न चलाएं।
- मोबाइल फोन का प्रयोग करते हुए ड्राइविंग न करें।
- रात में डिपर और हेडलाइट का सही इस्तेमाल करें।
- ब्लैक स्पॉट और अंधे मोड़ों पर विशेष सावधानी बरतें।
- थकान महसूस होने पर वाहन रोककर आराम करें।
पांच साल में हुए हादसों की संख्या
साल दुर्घटना मृतक घायल
2026 290 180 200
2025 650 393 574
2024 618 396 451
2023 576 349 452
2022 5 66 376 418
2021 497 351 354
जिले में अधिकतर मार्ग निर्माणाधीन हैं। इसके कारण कहीं-कहीं कट खुले हुए हैं, जिन्हें सुधारा जा रहा है। वहीं अवैध रूप से खुले हुए कटों को बंद कराने के लिए संबंधित अधिकारियों से वार्ता की जाएगी। साथ ही जिन ब्लैक स्पॉट पर सुरक्षा के इंतजाम नहीं वहां पर संकेतक लगवाए जाएंगे। - हरिओम, एआरटीओ

राजकीय मेडिकल कॉलेज के पास स्थित तिराहा। संवाद