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Budaun News: टेसू के रंगों का ढलता दौर, हर्बल गुलाल ने संभाली होली बाजार की बागडोर
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
Updated Fri, 27 Feb 2026 01:55 AM IST
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पेड़ में लगे टेसू के फूल। फाइल फोटो
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बदायूं। कभी होली की सुबह टेसू (पलाश) के फूलों की खुशबू से गांव-देहात महक उठते थे। आंगन में उबलते फूलों के रंग, बच्चों की खिलखिलाहट और केसरिया पानी की छपछपाहट होली की असली पहचान हुआ करती थी। बदलते समय के साथ वही टेसू अब यादों में सिमट गया है और उसकी जगह पैक्ड हर्बल गुलाल ने ले ली है।
ब्रज संस्कृति की पहचान माने जाने वाले बदायूं जिले में होली के रंगों की तस्वीर अब काफी बदल चुकी है। एक समय ऐसा था जब गांव-देहात में बच्चे और बड़े मिलकर पेड़ों से टेसू के फूल इकट्ठा करते थे। इन फूलों को पानी में उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग तैयार किया जाता था, जिससे होली खेली जाती थी और कपड़ों को भी रंगा जाता था। उस दौर में यह रंग इतना गाढ़ा और प्राकृतिक होता था कि दुपट्टे, साफे और अन्य वस्त्र भी रंगे जाते थे।
बुजुर्ग बताते हैं कि आजादी से पहले जिले में टेसू के फूलों का अच्छा कारोबार होता था। यहां से तैयार रंग आसपास के जनपदों तक भेजे जाते थे और यह किसानों की अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण साधन था। कादर चौक निवासी 60 वर्षीय करन सिंह बताते हैं कि बचपन में टेसू के फूलों को भिगोकर रंग तैयार किया जाता था, जो होली की असली पहचान होता था।
टेसू का महत्व केवल रंगों तक सीमित नहीं था। इसके चौड़े पत्तों से दोना-पत्तल बनाए जाते थे, जिन पर दावतों और सामाजिक आयोजनों में भोजन कराया जाता था। यह पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल व्यवस्था थी। स्थानीय निवासी 60 वर्षीय ब्रजेश चौहान बताते हैं कि स्कूल के दिनों में टेसू के पत्तों में चाट मिलती थी और शादी-ब्याह में इसके पत्तलों पर भोजन का अलग ही आनंद होता था। यह न तो प्रदूषण फैलाते थे और न ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते थे। आज सिंथेटिक दोना-पत्तल के चलन ने उस परंपरा को लगभग खत्म कर दिया है, जो जलाने पर हानिकारक गैस छोड़ते हैं।
-- -80 से 150 रुपये प्रति किलो है कीमत-- -
समय के साथ बाजार में सस्ते और चटख रासायनिक रंग आए, जिसके बाद हर्बल गुलाल का दौर शुरू हुआ। अरारोट बेस में फूड और फ्रूट कलर मिलाकर तैयार किए जाने वाले हर्बल रंगों ने बाजार में मजबूत पकड़ बना ली। उपभोक्ताओं की मांग अब पैक्ड, सुरक्षित और त्वचा के अनुकूल रंगों की ओर बढ़ गई है। आज जिले में टेसू के फूलों का स्थानीय कारोबार लगभग समाप्त हो चुका है। यदि कहीं मांग होती भी है तो फूल राजस्थान और मध्य प्रदेश से मंगाए जाते हैं। फुटकर बाजार में इनकी कीमत 80 से 150 रुपये प्रति किलो तक होने के कारण आम उपभोक्ता हर्बल गुलाल को प्राथमिकता देता है। इस तरह परंपरा और आधुनिकता के बीच होली के रंगों का स्वरूप बदल गया है। प्राकृतिक रंगों की खुशबू अब यादों में सिमटती जा रही है, जबकि बाजार में सुरक्षित और पैक्ड रंगों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।
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ब्रज संस्कृति की पहचान माने जाने वाले बदायूं जिले में होली के रंगों की तस्वीर अब काफी बदल चुकी है। एक समय ऐसा था जब गांव-देहात में बच्चे और बड़े मिलकर पेड़ों से टेसू के फूल इकट्ठा करते थे। इन फूलों को पानी में उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग तैयार किया जाता था, जिससे होली खेली जाती थी और कपड़ों को भी रंगा जाता था। उस दौर में यह रंग इतना गाढ़ा और प्राकृतिक होता था कि दुपट्टे, साफे और अन्य वस्त्र भी रंगे जाते थे।
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बुजुर्ग बताते हैं कि आजादी से पहले जिले में टेसू के फूलों का अच्छा कारोबार होता था। यहां से तैयार रंग आसपास के जनपदों तक भेजे जाते थे और यह किसानों की अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण साधन था। कादर चौक निवासी 60 वर्षीय करन सिंह बताते हैं कि बचपन में टेसू के फूलों को भिगोकर रंग तैयार किया जाता था, जो होली की असली पहचान होता था।
टेसू का महत्व केवल रंगों तक सीमित नहीं था। इसके चौड़े पत्तों से दोना-पत्तल बनाए जाते थे, जिन पर दावतों और सामाजिक आयोजनों में भोजन कराया जाता था। यह पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल व्यवस्था थी। स्थानीय निवासी 60 वर्षीय ब्रजेश चौहान बताते हैं कि स्कूल के दिनों में टेसू के पत्तों में चाट मिलती थी और शादी-ब्याह में इसके पत्तलों पर भोजन का अलग ही आनंद होता था। यह न तो प्रदूषण फैलाते थे और न ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते थे। आज सिंथेटिक दोना-पत्तल के चलन ने उस परंपरा को लगभग खत्म कर दिया है, जो जलाने पर हानिकारक गैस छोड़ते हैं।
समय के साथ बाजार में सस्ते और चटख रासायनिक रंग आए, जिसके बाद हर्बल गुलाल का दौर शुरू हुआ। अरारोट बेस में फूड और फ्रूट कलर मिलाकर तैयार किए जाने वाले हर्बल रंगों ने बाजार में मजबूत पकड़ बना ली। उपभोक्ताओं की मांग अब पैक्ड, सुरक्षित और त्वचा के अनुकूल रंगों की ओर बढ़ गई है। आज जिले में टेसू के फूलों का स्थानीय कारोबार लगभग समाप्त हो चुका है। यदि कहीं मांग होती भी है तो फूल राजस्थान और मध्य प्रदेश से मंगाए जाते हैं। फुटकर बाजार में इनकी कीमत 80 से 150 रुपये प्रति किलो तक होने के कारण आम उपभोक्ता हर्बल गुलाल को प्राथमिकता देता है। इस तरह परंपरा और आधुनिकता के बीच होली के रंगों का स्वरूप बदल गया है। प्राकृतिक रंगों की खुशबू अब यादों में सिमटती जा रही है, जबकि बाजार में सुरक्षित और पैक्ड रंगों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।
