एटा। शहर के मुख्य नाले और उसके बफर जोन पर अतिक्रमण का मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण पहुंच गया है। अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह बनाम प्रमुख सचिव, जल एवं सिंचाई संसाधन विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार आदि पर एनजीटी में सुनवाई हुई। अधिकरण ने मामले को पर्यावरण से जुड़ा मानते हुए सभी विपक्षी पक्षों को नोटिस जारी कर दिए हैं। अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी।वादी अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह के अनुसार एटा शहर का मुख्य नाला कैलाश मंदिर स्थित तालाब से निकलकर मानुपर की ओर जाता है। इसकी लंबाई करीब 13 किलोमीटर है। इसी में शहर के दूसरे हिस्से का नाला भी आकर मिलता है, जिसके बाद यह शीतलपुर, मानपुर और भदों होते हुए सकीट तक पहुंचता है। उनका आरोप है कि नाले और उसके बफर जोन पर विभिन्न स्थानों पर अतिक्रमण कर लिया गया है, जो पर्यावरणीय नियमों के विपरीत है और जल निकासी व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। सुनवाई के दौरान वादी पक्ष ने शीतलपुर, मानपुर और भदों गांव स्थित नाले से संबंधित राजस्व अभिलेख, मौजा मानपुर में हुए कथित अतिक्रमण के फोटोग्राफ तथा शहर के नाले के सेटेलाइट चित्र अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किए। इन साक्ष्यों से नाले की मूल स्थिति और उस पर हुए अतिक्रमण की पुष्टि हुई। इस मामले में पहले वादी अजय प्रताप सिंह एडवोकेट और दूसरे वादी गल्ला व्यापारी कैलाश चंद्र राठौर हैं। विपक्षी पक्षों में प्रमुख सचिव, सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग, प्रमुख सचिव नगर विकास विभाग, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष, जिलाधिकारी एटा तथा दो निजी पक्षकार शामिल हैं। एनजीटी द्वारा सभी पक्षों से जवाब तलब करते हुए अगली सुनवाई के लिए 9 अक्टूबर की तिथि निर्धारित की गई है। वहीं, वादी कैलाश चंद्र राठौर ने बताया है कि इस सरकारी नाले की पटरियां पर लंबे समय से निर्माण किया जा रहा है। कई बाद इसको लेकर तहसील और नगर पालिका में शिकायत की गई। तत्कालीन अफसर इसकी अनदेखी करते रहे। उन्होंने अफसरों पर अतिक्रमण कारियों से मिलीभगत और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। अब इस मामले में एनजीटी में सुनवाई होगी