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Farrukhabad News: मोटर बोट से सामान ले जाने में प्रति चक्कर देने पड़ रहे 500 से 800 रुपये
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फर्रुखाबाद। गंगा की तेज धार के मुहाने पर आए दिलीप की मड़ैया के बाढ़ पीड़ितों को ईंटें, घरेलू सामान सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए प्रति चक्कर 500 से 800 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। सरकारी दो मोटरबोट नाकाफी हैं। वह सिर्फ ग्रामीणों को लाने और ले जाने के काम आ रही हैं। एक मोटरबोट में पांच-छह सौ ईंटें ही ले जा रहे हैं।
सदर तहसील के गांव दिलीप की मड़ैया का अस्तित्व लगभग खत्म होने वाला है। जिन परिवारों में सदस्यों की संख्या अधिक थी और चार-छह दिन का समय मिल गया, उन्होंने मकानों को तोड़कर ईंटें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए नाव व मोटरबोट का प्रयोग किया। पांचाल घाट सोता बहादुरपुर के पांच-छह मोटरबोट दिन-रात बिलावलपुर से दिलीप की मड़ैया तक चलाए जा रहे हैं। खेतों में पांच से छह फीट पानी होने की वजह से बैलगाड़ी, ट्रैक्टर ट्रॉली आदि वाहनों का आना-जाना नामुमकिन है। लिहाजा बाढ़ पीड़ितों के लिए मोटरबोट ही एकमात्र सहारा है। ऐसे में संचालकों ने भी आपदा को अवसर बना लिया। एक बार में करीब 500 ईंटें लाने के बदले 500 से 800 रुपये प्रति चक्कर लिए जा रहे हैं। इससे बाढ़ पीड़ितों के ऊपर आर्थिक मार पड़ रही है।
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फोटो-33, प्रेमचंद्र
गांव के प्रेमचंद्र बताते हैं कि जो ईंटें निकाली हैं इन्हें मोटरबोट से ले जाएंगे। वह 400 रुपये प्रति चक्कर के हिसाब से ईंटें बिलावलपुर की तरफ ले जाएंगे। वहां से ट्रैक्टर से हैवतपुर गढि़या तक ले जाएंगे। ईंट महंगी है, इसलिए अभी ले जाकर टिनशेड डालकर समय काटेंगे।
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फोटो-34, ओमकार
ओमकार बताते हैं कि वह अपनी ईंटें भैरोघाट ले जा रहे हैं। एक बार में स्टीमर 500 ईंटें ले जाता है। उन्होंने 700 रुपये प्रति चक्कर तय किया है। अब गांव में तो कुछ बचा नहीं। मकान की चंद दीवारें ही तोड़ सके। पूरा मकान गंगा में समा गया है।
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सदर तहसील के गांव दिलीप की मड़ैया का अस्तित्व लगभग खत्म होने वाला है। जिन परिवारों में सदस्यों की संख्या अधिक थी और चार-छह दिन का समय मिल गया, उन्होंने मकानों को तोड़कर ईंटें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए नाव व मोटरबोट का प्रयोग किया। पांचाल घाट सोता बहादुरपुर के पांच-छह मोटरबोट दिन-रात बिलावलपुर से दिलीप की मड़ैया तक चलाए जा रहे हैं। खेतों में पांच से छह फीट पानी होने की वजह से बैलगाड़ी, ट्रैक्टर ट्रॉली आदि वाहनों का आना-जाना नामुमकिन है। लिहाजा बाढ़ पीड़ितों के लिए मोटरबोट ही एकमात्र सहारा है। ऐसे में संचालकों ने भी आपदा को अवसर बना लिया। एक बार में करीब 500 ईंटें लाने के बदले 500 से 800 रुपये प्रति चक्कर लिए जा रहे हैं। इससे बाढ़ पीड़ितों के ऊपर आर्थिक मार पड़ रही है।
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फोटो-33, प्रेमचंद्र
गांव के प्रेमचंद्र बताते हैं कि जो ईंटें निकाली हैं इन्हें मोटरबोट से ले जाएंगे। वह 400 रुपये प्रति चक्कर के हिसाब से ईंटें बिलावलपुर की तरफ ले जाएंगे। वहां से ट्रैक्टर से हैवतपुर गढि़या तक ले जाएंगे। ईंट महंगी है, इसलिए अभी ले जाकर टिनशेड डालकर समय काटेंगे।
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फोटो-34, ओमकार
ओमकार बताते हैं कि वह अपनी ईंटें भैरोघाट ले जा रहे हैं। एक बार में स्टीमर 500 ईंटें ले जाता है। उन्होंने 700 रुपये प्रति चक्कर तय किया है। अब गांव में तो कुछ बचा नहीं। मकान की चंद दीवारें ही तोड़ सके। पूरा मकान गंगा में समा गया है।