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Farrukhabad News: मुठभेड़ में घायल युवक को गंभीर चोट, अब पुलिस टीम पर प्राथमिकी के आदेश
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फर्रुखाबाद। कायमगंज थाना क्षेत्र में 19 मार्च को हुई कथित पुलिस मुठभेड़ में घायल अभियुक्त कुलदीप को गंभीर चोट लगी थी। पुलिस टीम के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज न कराने के मामले में अदालत ने संज्ञान लिया। विशेष न्यायाधीश दस्यु प्रभावित क्षेत्र/तृतीय अपर जनपद एवं सत्र न्यायाधीश शैलेंद्र सचान ने पुलिस मुठभेड़ का नेतृत्व करने वाले प्रभारी निरीक्षक मदन मोहन चतुर्वेदी और एसपी फतेहगढ़ को सात दिन के भीतर एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष विवेचना कराने के आदेश दिए हैं। मामले में की गई कार्रवाई से संबंधित आख्या 20 अगस्त तक अदालत में पेश करनी होगी।
जनपद कासगंज थाना पटियाली के मिलक ईकाई अताइयापुर निवासी अभियुक्त कुलदीप ने जमानत प्रार्थना पत्र में पुलिस पर गोली मारने का आरोप लगाया था। अदालत ने पाया कि कुलदीप के बाएं पैर में गोली के प्रवेश और निकास के घाव थे। मेडिकल रिपोर्ट और बयान से स्पष्ट है कि गोली पैर के आर-पार हुई थी। कुलदीप ने गोली लगने के बाद अत्यधिक रक्तस्राव और तेज दर्द की बात कही। पांच माह बाद भी चलने पर पैर में दर्द होने की जानकारी दी। मेडिकल करने वाले डॉ. विपिन सिंह ने गंभीर चोट की विधिक परिभाषा न जानने की बात स्वीकार की। अदालत ने चोट को साधारण बताने वाली पूरक रिपोर्ट पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि घायल का मजिस्ट्रेट या चिकित्साधिकारी के समक्ष बयान दर्ज कराया जाना अनिवार्य है। न्यायालय ने चिकित्साधिकारी डॉ. विपिन सिंह के आचरण की जांच के आदेश दिए हैं। मुख्य चिकित्साधिकारी फर्रुखाबाद को यह जांच करानी होगी। समय सीमा में कार्रवाई न होने पर 20 अगस्त को अवमानना कार्रवाई पर विचार होगा। पुलिस अधीक्षक और प्रभारी निरीक्षक चतुर्वेदी के खिलाफ उच्च न्यायालय को संदर्भित किया जा सकता है।
मुठभेड़ में सिपाही के घायल होने की कहानी भी संदिग्ध
अदालत ने पुलिस अभिलेखों में हेड कांस्टेबल धर्मेंद्र तिवारी को मुठभेड़ में घायल बताया जाना संदिग्ध पाया। बाद की विवेचना में पुलिसकर्मियों ने चोट खेल में गिरने से लगना बताया था। न्यायालय ने पुलिस का गोली लगने वाला कथानक प्रथम दृष्टया गलत माना। सुप्रीम कोर्ट के पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया गया। गंभीर चोट होने पर पुलिस टीम के खिलाफ एफआईआर अनिवार्य है।
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जनपद कासगंज थाना पटियाली के मिलक ईकाई अताइयापुर निवासी अभियुक्त कुलदीप ने जमानत प्रार्थना पत्र में पुलिस पर गोली मारने का आरोप लगाया था। अदालत ने पाया कि कुलदीप के बाएं पैर में गोली के प्रवेश और निकास के घाव थे। मेडिकल रिपोर्ट और बयान से स्पष्ट है कि गोली पैर के आर-पार हुई थी। कुलदीप ने गोली लगने के बाद अत्यधिक रक्तस्राव और तेज दर्द की बात कही। पांच माह बाद भी चलने पर पैर में दर्द होने की जानकारी दी। मेडिकल करने वाले डॉ. विपिन सिंह ने गंभीर चोट की विधिक परिभाषा न जानने की बात स्वीकार की। अदालत ने चोट को साधारण बताने वाली पूरक रिपोर्ट पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि घायल का मजिस्ट्रेट या चिकित्साधिकारी के समक्ष बयान दर्ज कराया जाना अनिवार्य है। न्यायालय ने चिकित्साधिकारी डॉ. विपिन सिंह के आचरण की जांच के आदेश दिए हैं। मुख्य चिकित्साधिकारी फर्रुखाबाद को यह जांच करानी होगी। समय सीमा में कार्रवाई न होने पर 20 अगस्त को अवमानना कार्रवाई पर विचार होगा। पुलिस अधीक्षक और प्रभारी निरीक्षक चतुर्वेदी के खिलाफ उच्च न्यायालय को संदर्भित किया जा सकता है।
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मुठभेड़ में सिपाही के घायल होने की कहानी भी संदिग्ध
अदालत ने पुलिस अभिलेखों में हेड कांस्टेबल धर्मेंद्र तिवारी को मुठभेड़ में घायल बताया जाना संदिग्ध पाया। बाद की विवेचना में पुलिसकर्मियों ने चोट खेल में गिरने से लगना बताया था। न्यायालय ने पुलिस का गोली लगने वाला कथानक प्रथम दृष्टया गलत माना। सुप्रीम कोर्ट के पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया गया। गंभीर चोट होने पर पुलिस टीम के खिलाफ एफआईआर अनिवार्य है।
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