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Gonda News: अभिनय करने के साथ व्यवस्था से लड़ भी रहे रंगकर्मी
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Thu, 26 Mar 2026 11:32 PM IST
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गोंडा में मंच पर अभिनय करते रंगकर्मी। फाइल फोटो
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गोंडा। रोशनी जलती है, पर्दा उठता है और तालियों की गूंज के बीच दर्शकों को सब कुछ व्यवस्थित नजर आता है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जहां कलाकार अभिनय से पहले व्यवस्था की लड़ाई लड़ते हैं। कई बार उसी में थक भी जाते हैं। विश्व रंगमंच दिवस शुक्रवार को है, लेकिन गोंडा का रंगमंच आज भी जुगाड़ के सहारे साँस ले रहा है।
टाउन हॉल के भीतर का दृश्य किसी व्यवस्थित थिएटर से ज्यादा एक अस्थायी कार्यशाला जैसा दिखता है। यहां कलाकार ही मिस्त्री हैं, वही बिजली सुधारते हैं, वही सफाई करते हैं। कोई पर्दा टांग रहा होता है, तो कोई उधार के साउंड सिस्टम को दुरुस्त कर रहा होता है। रंगकर्मी महेश सिंह कहते हैं कि यहां स्क्रिप्ट से ज्यादा चिंता इस बात की होती है कि माइक चलेगा या नहीं।
रंगकर्मी देवव्रत सिंह का कहना है कि डॉ. संपूर्णानंद प्रेक्षागृह (टाउन हॉल) कागजों में जिले का प्रमुख मंच है, लेकिन व्यवहार में यह एक बहुउद्देशीय हॉल बनकर रह गया है। यहां लाइटिंग अधूरी, साउंड व्यवस्था अस्थायी और बैकस्टेज सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं। एक जीवंत रंगमंच के लिए जरूरी संसाधन या तो नदारद है या बेहद कमजोर स्थिति में उपलब्ध हैं। सबसे बड़ी समस्या मंच की उपलब्धता है। अपने ही शहर में नाटक करने के लिए अनुमति का इंतजार करना पड़ता है।
टाउन हॉल में अक्सर नेताओं की बैठकें, अधिकारियों की कार्यशालाएं और स्कूलों के कार्यक्रम पहले से तय रहते हैं। ऐसे में नाटक के लिए तारीख निकालना किसी जंग से कम नहीं। यह जंग रंगकर्मी आज भी लड़ रहे हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी दीपक श्रीवास्तव का कहना है कि रंगमंच को यहां पर असुविधाओं से जूझना पड़ रहा है। एक दो नहीं, कई स्तर पर बुनियादी समस्याएं हैं। (संवाद)
फाइलों में गुम हो गईं सुधार की योजनाएं
एक समय गोंडा में मिनी ऑडिटोरियम, ओपन थिएटर और रिहर्सल स्पेस बनाने की योजनाएं बनी थीं। कलाकारों को लगा कि अब रंगमंच को नई पहचान मिलेगी, लेकिन अफसर बदले, प्राथमिकताएं बदलीं और योजनाएं फाइलों में दफन हो गईं। आज वे सिर्फ चर्चाओं में जिंदा हैं। संसाधनों की कमी और भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं को भी दुविधा में डाल दिया है। युवा कलाकार पिंटू का कहना है कि यहां मेहनत का मंच नहीं, सिर्फ संघर्ष का मंच है।
कुछ समर्पित के दम पर जिंदा रंगमंच
गोंडा का रंगमंच आज भी कुछ समर्पित लोगों के सहारे चल रहा है। वही स्क्रिप्ट लिखते हैं, रिहर्सल कराते हैं, फंड जुटाते हैं और अंत में मंच भी सजाते हैं। यानी कलाकार ही पूरी व्यवस्था बन चुके हैं। रंगकर्मियों का मानना है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि प्राथमिकता की भी है। गोंडा की मिट्टी ने ही महाकवि तुलसीदास, घाघ और रामनाथ सिंह ‘अदम गोंडवी’ जैसे महान रचनाकार दिए हैं। आज उसी मिट्टी के कलाकार मंच के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उर्मिला पांडेय का कहना है कि जरूरत है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस ओर गंभीरता से सोचें, ताकि कलाकारों को जुगाड़ नहीं, एक सशक्त मंच मिल सके।
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टाउन हॉल के भीतर का दृश्य किसी व्यवस्थित थिएटर से ज्यादा एक अस्थायी कार्यशाला जैसा दिखता है। यहां कलाकार ही मिस्त्री हैं, वही बिजली सुधारते हैं, वही सफाई करते हैं। कोई पर्दा टांग रहा होता है, तो कोई उधार के साउंड सिस्टम को दुरुस्त कर रहा होता है। रंगकर्मी महेश सिंह कहते हैं कि यहां स्क्रिप्ट से ज्यादा चिंता इस बात की होती है कि माइक चलेगा या नहीं।
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रंगकर्मी देवव्रत सिंह का कहना है कि डॉ. संपूर्णानंद प्रेक्षागृह (टाउन हॉल) कागजों में जिले का प्रमुख मंच है, लेकिन व्यवहार में यह एक बहुउद्देशीय हॉल बनकर रह गया है। यहां लाइटिंग अधूरी, साउंड व्यवस्था अस्थायी और बैकस्टेज सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं। एक जीवंत रंगमंच के लिए जरूरी संसाधन या तो नदारद है या बेहद कमजोर स्थिति में उपलब्ध हैं। सबसे बड़ी समस्या मंच की उपलब्धता है। अपने ही शहर में नाटक करने के लिए अनुमति का इंतजार करना पड़ता है।
टाउन हॉल में अक्सर नेताओं की बैठकें, अधिकारियों की कार्यशालाएं और स्कूलों के कार्यक्रम पहले से तय रहते हैं। ऐसे में नाटक के लिए तारीख निकालना किसी जंग से कम नहीं। यह जंग रंगकर्मी आज भी लड़ रहे हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी दीपक श्रीवास्तव का कहना है कि रंगमंच को यहां पर असुविधाओं से जूझना पड़ रहा है। एक दो नहीं, कई स्तर पर बुनियादी समस्याएं हैं। (संवाद)
फाइलों में गुम हो गईं सुधार की योजनाएं
एक समय गोंडा में मिनी ऑडिटोरियम, ओपन थिएटर और रिहर्सल स्पेस बनाने की योजनाएं बनी थीं। कलाकारों को लगा कि अब रंगमंच को नई पहचान मिलेगी, लेकिन अफसर बदले, प्राथमिकताएं बदलीं और योजनाएं फाइलों में दफन हो गईं। आज वे सिर्फ चर्चाओं में जिंदा हैं। संसाधनों की कमी और भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं को भी दुविधा में डाल दिया है। युवा कलाकार पिंटू का कहना है कि यहां मेहनत का मंच नहीं, सिर्फ संघर्ष का मंच है।
कुछ समर्पित के दम पर जिंदा रंगमंच
गोंडा का रंगमंच आज भी कुछ समर्पित लोगों के सहारे चल रहा है। वही स्क्रिप्ट लिखते हैं, रिहर्सल कराते हैं, फंड जुटाते हैं और अंत में मंच भी सजाते हैं। यानी कलाकार ही पूरी व्यवस्था बन चुके हैं। रंगकर्मियों का मानना है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि प्राथमिकता की भी है। गोंडा की मिट्टी ने ही महाकवि तुलसीदास, घाघ और रामनाथ सिंह ‘अदम गोंडवी’ जैसे महान रचनाकार दिए हैं। आज उसी मिट्टी के कलाकार मंच के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उर्मिला पांडेय का कहना है कि जरूरत है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस ओर गंभीरता से सोचें, ताकि कलाकारों को जुगाड़ नहीं, एक सशक्त मंच मिल सके।