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Hamirpur News: समय ने बदला होली का रंग, ढोलक-मंजीरों की धुनें हो रहीं विलुप्त

Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 03 Mar 2026 10:01 PM IST
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Time has changed the colours of Holi, the tunes of dholak and cymbals are disappearing.
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गहरौली (हमीरपुर)। अब मोबाइल-टीवी के दौर में पर्व मनाने का अंदाज ही बदल गया है। बुंदेलखंड में होली का विशेष महत्व है, मगर फाग और ढोलक-मंजीरों के स्वर तेजी से लुप्त हो रहे हैं।
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पहले फागुन शुरू होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह फाग गायन की महफिलें सजतीं। शाम ढलते ही ढोलक-मंजीरों की लय पर लोग घरों से निकल पड़ते, राहगीर भी ठहर जाते। चौपालों पर टोलियां फाग गातीं, लेकिन अब न तो टोलियां दिखती हैं, न ढोलक वादक। युवा पीढ़ी डीजे, मोबाइल, टीवी और सीडी प्लेयर में खोई हुई है, फागों की उन्हें कोई खबर ही नहीं। ग्रामीणों का मानना है कि आधुनिकता ने परंपराओं को पीछे धकेल दिया है।
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गांव निवासी पंडित जगदीश त्रिपाठी ने बताया कि पहले वसंत पंचमी से ही चौपालों पर फाग गूंजने लगते थे, अब तो केवल होलिका दहन तक सीमित रह गए हैं। सेवानिवृत्त अध्यापक ठाकुर प्रसाद गुप्ता ने कहा कि चौपालों पर ढोलक-मंजीरा की लय पर फाग की तान अब कहां सुनाई देती है। बुंदेली लोक जीवन की यह धरोहर लुप्त हो रही है। खड़ेही लोधन के प्रेमचंद तिवारी कहते हैं कि अब वक्त की कमी है, लोगों के पास आपसी मेलजोल का समय नहीं है। घर-घर टीवी-सीडी पहुंच गए, चौपाल पर कौन फाग गाने बैठे।
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