{"_id":"69a70d87e70442d2bd0d0c9b","slug":"the-tradition-of-lathmar-holi-has-been-alive-in-jarakhar-village-for-89-years-hamirpur-news-c-223-1-hmp1028-136943-2026-03-03","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hamirpur News: जराखर गांव में 89 साल से जीवंत है लट्ठमार होली की परंपरा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hamirpur News: जराखर गांव में 89 साल से जीवंत है लट्ठमार होली की परंपरा
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर
Updated Tue, 03 Mar 2026 10:04 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
राठ (हमीरपुर)। रंगों के पर्व होली पर जराखर गांव लट्ठमार होली के कारण ब्रजभूमि बन जाता है। रंगों की फुहार के बीच हुड़दंग करते पुरुषों पर महिलाएं जमकर लाठियां चटखाती हैं। इससे एक दिन पूर्व होली महोत्सव व फूलों की होली का आयोजन भी होता है।
ग्राम प्रधान कमलेश राजपूत ने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने की थी। उस दौर में ब्रिटिश सरकार गांव के क्रांतिकारियों श्रीपतसहाय रावत, वीर घनश्याम, पंचम लोहार आदि पर मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेज रही थी। दमन से बचने के लिए ये सभी क्रांतिकारी ब्रज क्षेत्र में अज्ञातवास पर रहे। ब्रज की प्रसिद्ध लट्ठमार होली से इतने प्रभावित हुए कि अपने गांव लौटे तो उन्होंने जराखर में भी इसी परंपरा की शुरुआत की। तभी से यह आयोजन हर वर्ष पूरे उत्साह के साथ होता आ रहा है। होलिका दहन के दो दिन बाद दूज में विशाल जुलूस निकाला जाता है। शाम करीब पांच बजे जुलूस के समापन के बाद वह क्षण आता है जिसका सभी को बेसब्री से इंतजार रहता है। गांव के पुरुष पारंपरिक अंदाज में हुड़दंग करते हैं। महिलाएं लाठियां लेकर उनका सामना करती हैं। महिलाएं पूरी मस्ती और हंसी ठिठोली के बीच पुरुषों पर लाठियां भांजती हैं। हालांकि यह सब पूरी मर्यादा और आपसी सहमति के साथ होता है। हंसी ठिठोली का यह सिलसिला शाम सात बजे तक चलता है।
होलिका दहन से शुरू होता है उत्सव
गांव में होली का आयोजन पूरी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। शुभ मुहूर्त पर विधि विधान से होलिका दहन किया जाता है। अगली रात सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। फाग गायन, ढोल-मंजीरों की थाप और लोकगीतों से पूरा वातावरण सराबोर हो जाता है। दूज पर दोपहर में विशाल होलिका जुलूस निकाला जाता है। पूरा गांव रंगों से सराबोर हो जाता है। शाम करीब पांच बजे जुलूस के समापन के बाद लट्ठमार होली होती है। 89 साल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी गांव की बुजुर्ग महिलाएं सहेजे हैं।
Trending Videos
ग्राम प्रधान कमलेश राजपूत ने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने की थी। उस दौर में ब्रिटिश सरकार गांव के क्रांतिकारियों श्रीपतसहाय रावत, वीर घनश्याम, पंचम लोहार आदि पर मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेज रही थी। दमन से बचने के लिए ये सभी क्रांतिकारी ब्रज क्षेत्र में अज्ञातवास पर रहे। ब्रज की प्रसिद्ध लट्ठमार होली से इतने प्रभावित हुए कि अपने गांव लौटे तो उन्होंने जराखर में भी इसी परंपरा की शुरुआत की। तभी से यह आयोजन हर वर्ष पूरे उत्साह के साथ होता आ रहा है। होलिका दहन के दो दिन बाद दूज में विशाल जुलूस निकाला जाता है। शाम करीब पांच बजे जुलूस के समापन के बाद वह क्षण आता है जिसका सभी को बेसब्री से इंतजार रहता है। गांव के पुरुष पारंपरिक अंदाज में हुड़दंग करते हैं। महिलाएं लाठियां लेकर उनका सामना करती हैं। महिलाएं पूरी मस्ती और हंसी ठिठोली के बीच पुरुषों पर लाठियां भांजती हैं। हालांकि यह सब पूरी मर्यादा और आपसी सहमति के साथ होता है। हंसी ठिठोली का यह सिलसिला शाम सात बजे तक चलता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
होलिका दहन से शुरू होता है उत्सव
गांव में होली का आयोजन पूरी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। शुभ मुहूर्त पर विधि विधान से होलिका दहन किया जाता है। अगली रात सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। फाग गायन, ढोल-मंजीरों की थाप और लोकगीतों से पूरा वातावरण सराबोर हो जाता है। दूज पर दोपहर में विशाल होलिका जुलूस निकाला जाता है। पूरा गांव रंगों से सराबोर हो जाता है। शाम करीब पांच बजे जुलूस के समापन के बाद लट्ठमार होली होती है। 89 साल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी गांव की बुजुर्ग महिलाएं सहेजे हैं।
