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Hathras News: मनरेगा में खेल निराले, नियम से 55.18 लाख रुपये ज्यादा खर्च कर डाले
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Thu, 26 Mar 2026 02:59 AM IST
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प्रशांत भारती
हाथरस। जनपद में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की वित्तीय वर्ष की समीक्षा में पता चला है कि प्रशासनिक मद में खर्च की तय सीमा को ताक पर रखकर लाखों रुपये अतिरिक्त खर्च कर दिए गए। सरकारी मानकों के अनुसार जहां कुल खर्च का महज पांच फीसदी ही प्रशासनिक मद में व्यय होना चाहिए था, लेकिन अधिकारियों ने निर्धारित बजट से 55.18 लाख रुपये ज्यादा खर्च कर दिए।
वित्तीय वर्ष के दौरान मनरेगा के तहत कराए गए विभिन्न कार्यों पर कुल 3055.74 लाख रुपये खर्च किए गए। नियमानुसार इस कुल धनराशि के सापेक्ष प्रशासनिक मद (स्टाफ वेतन, स्टेशनरी व अन्य कार्यालयी कार्य) में अधिकतम 137.50 लाख रुपये ही खर्च किए जा सकते थे। धरातल पर स्थिति इसके उलट रही और प्रशासनिक मद में 192.69 लाख रुपये ठिकाने लगा दिए गए।
इस प्रकार मानक से 55.18 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ योजना पर डाला गया है। हैरानी की बात यह है कि प्रशासनिक मद से ब्लॉक से लेकर जिला मुख्यालय तक अफसरों की गाड़ियां दौड़ रही हैं, जबकि कार्मिक वेतन के लिए हंगामा कर रहे हैं। संवाद
ये हैं खर्च के मानक
शासन द्वारा मनरेगा के सुचारू संचालन के लिए प्रशासनिक खर्च के स्पष्ट मानक तय किए गए हैं। कुल आवंटित धनराशि का केवल पांच प्रतिशत ही इस मद में व्यय किया जा सकता है।
जिला मुख्यालय पर खर्च : 0.5 फीसदी
ब्लॉक स्तर पर खर्च : 1 फीसदी
ग्राम पंचायत स्तर पर खर्च : 3.5 फीसदी
नियमों की अनदेखी पर उठ रहे सवाल
विकास कार्यों के बजट में से प्रशासनिक मद में हुई यह ''''फिजूलखर्ची'''' अब विभाग के गले की फांस बन सकती है। एक तरफ जहां ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के लिए बजट की कमी का रोना रोया जाता है तो दूसरी ओर प्रशासनिक तामझाम पर मानकों से ज्यादा खर्च कर देना गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करता है।
सात माह से मानदेय के लिए तरस रहे एपीओ
जिले में मनरेगा को धरातल पर उतारने वाले जिम्मेदार ही इन-दिनों आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। विभिन्न ब्लॉकों में तैनात अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारियों (एपीओ) को पिछले सात माह से वेतन नहीं मिला है। वेतन न मिलने से इनके सामने परिवार के भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है। विभागीय सूत्रों की मानें तो बजट के अभाव में इनका मानदेय रुका हुआ है। दूसरी ओर, ग्राम पंचायतों में तैनात रोजगार सेवक भी लंबे समय से मानदेय न मिलने के विरोध में प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी जता रहे हैं।
ये पूर्व में रोजगार सेवकों के मानदेय आहरित करने में ही हुई थी। रोजगार सेवक द्वारा न्यूनतम लगभग 2.8 लाख रुपये का कार्य कराया जाना चाहिए, तभी संपूर्ण कार्य के व्यय के सापेक्ष 3.5 फीसदी प्रशासनिक मद में उसका मानदेय दिया जा सकेगा। पर ऐसा न होने पर भी दबाव बनाकर रोजगार सेवकों का मानदेय निकलवाया गया। इस मामले में स्पष्टीकरण तलब किया गया है, उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाएगा।
-अतुल वत्स, डीएम।
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हाथरस। जनपद में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की वित्तीय वर्ष की समीक्षा में पता चला है कि प्रशासनिक मद में खर्च की तय सीमा को ताक पर रखकर लाखों रुपये अतिरिक्त खर्च कर दिए गए। सरकारी मानकों के अनुसार जहां कुल खर्च का महज पांच फीसदी ही प्रशासनिक मद में व्यय होना चाहिए था, लेकिन अधिकारियों ने निर्धारित बजट से 55.18 लाख रुपये ज्यादा खर्च कर दिए।
वित्तीय वर्ष के दौरान मनरेगा के तहत कराए गए विभिन्न कार्यों पर कुल 3055.74 लाख रुपये खर्च किए गए। नियमानुसार इस कुल धनराशि के सापेक्ष प्रशासनिक मद (स्टाफ वेतन, स्टेशनरी व अन्य कार्यालयी कार्य) में अधिकतम 137.50 लाख रुपये ही खर्च किए जा सकते थे। धरातल पर स्थिति इसके उलट रही और प्रशासनिक मद में 192.69 लाख रुपये ठिकाने लगा दिए गए।
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इस प्रकार मानक से 55.18 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ योजना पर डाला गया है। हैरानी की बात यह है कि प्रशासनिक मद से ब्लॉक से लेकर जिला मुख्यालय तक अफसरों की गाड़ियां दौड़ रही हैं, जबकि कार्मिक वेतन के लिए हंगामा कर रहे हैं। संवाद
ये हैं खर्च के मानक
शासन द्वारा मनरेगा के सुचारू संचालन के लिए प्रशासनिक खर्च के स्पष्ट मानक तय किए गए हैं। कुल आवंटित धनराशि का केवल पांच प्रतिशत ही इस मद में व्यय किया जा सकता है।
जिला मुख्यालय पर खर्च : 0.5 फीसदी
ब्लॉक स्तर पर खर्च : 1 फीसदी
ग्राम पंचायत स्तर पर खर्च : 3.5 फीसदी
नियमों की अनदेखी पर उठ रहे सवाल
विकास कार्यों के बजट में से प्रशासनिक मद में हुई यह ''''फिजूलखर्ची'''' अब विभाग के गले की फांस बन सकती है। एक तरफ जहां ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के लिए बजट की कमी का रोना रोया जाता है तो दूसरी ओर प्रशासनिक तामझाम पर मानकों से ज्यादा खर्च कर देना गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करता है।
सात माह से मानदेय के लिए तरस रहे एपीओ
जिले में मनरेगा को धरातल पर उतारने वाले जिम्मेदार ही इन-दिनों आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। विभिन्न ब्लॉकों में तैनात अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारियों (एपीओ) को पिछले सात माह से वेतन नहीं मिला है। वेतन न मिलने से इनके सामने परिवार के भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है। विभागीय सूत्रों की मानें तो बजट के अभाव में इनका मानदेय रुका हुआ है। दूसरी ओर, ग्राम पंचायतों में तैनात रोजगार सेवक भी लंबे समय से मानदेय न मिलने के विरोध में प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी जता रहे हैं।
ये पूर्व में रोजगार सेवकों के मानदेय आहरित करने में ही हुई थी। रोजगार सेवक द्वारा न्यूनतम लगभग 2.8 लाख रुपये का कार्य कराया जाना चाहिए, तभी संपूर्ण कार्य के व्यय के सापेक्ष 3.5 फीसदी प्रशासनिक मद में उसका मानदेय दिया जा सकेगा। पर ऐसा न होने पर भी दबाव बनाकर रोजगार सेवकों का मानदेय निकलवाया गया। इस मामले में स्पष्टीकरण तलब किया गया है, उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाएगा।
-अतुल वत्स, डीएम।