हर आंख नम: नहर में डूबे तीनों भाइयों के शव मिले, चीत्कार से दहला गांव, छिना पिता का साया और छिन गया सुहाग
कासगंज में पोस्टमार्टम होने के बाद तीनों भाइयों के शव गांव में पहुंचते ही हाहाकार मच गया। हर गली, मोहल्ला से रोने की आवाज आने लगी। गमगीन माहौल में तीनों युवाओं का अंतिम संस्कार किया गया।
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कासगंज की नहर में 6 जून को डूबे सिकंदराराऊ के टीकरी कलां गांव के तीनों भाइयों के शव मिल गए। 24 घंटे से अधिक चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद रविवार दोपहर तीनों के शव बाहर निकाले गए। इस हादसे ने एक ही झटके में पूरे परिवार को उजाड़ कर रख दिया है। स्थिति यह है कि घर में केवल पांच विधवा महिलाएं और बिलखते बच्चे ही बचे हैं। उनकी चीत्कार से रविवार को पूरा गांव दहल गया।
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मां न रो पा रही थी न कुछ कह पा रही
टीकरी कलां गांव की 70 वर्षीय कमलेश देवी पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है कि उनकी आंखों के आंसू भी सूख चुके हैं। नियति ने उनसे सब कुछ छीन लिया। 20 साल पहले पुलिस विभाग में तैनात पति डालचंद्र की ऑन ड्यूटी बीमारी से मौत हो गई थी। बड़े बेटे शैलेंद्र को जैसे-तैसे मृतक आश्रित कोटे में नौकरी मिली। अभी इस दुख से परिवार संभला ही था कि दो साल पहले दूसरे नंबर के बेटे विकास (30) की सड़क हादसे में मौत हो गई। विकास अपने पीछे पत्नी और चार मासूम बच्चों को छोड़ गया।
अब, शनिवार को कलेजे के तीन और टुकड़े जयप्रकाश, अजय और हरेंद्र उर्फ छोटू एक साथ दुनिया से चले गए। एक साथ तीन बेटों की मौत से मां इस कदर सदमे में है कि वह न रो पा रही है और न ही कुछ बोल पा रही हैं। उनकी हालत देख आस-पड़ोस के लोगों से भी नहीं देखी जा रही। सदमे में वे कई बार बेसुध हो गईं। बेटों की याद में बार-बार उनकी हालत बिगड़ जा रही है।
कोख में सात महीने का बच्चा और मांग का सिंदूर उजड़ गया
तीसरे नंबर के बेटे जयप्रकाश की पत्नी आठ महीने की गर्भवती है। जिस बच्चे ने अभी दुनिया में कदम भी नहीं रखा, उसके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया। चौथे नंबर के बेटे अजय की शादी को सालभर हुआ है, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं है। उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है।
सबसे छोटा बेटा हरेंद्र उर्फ छोटू की शादी 20 फरवरी 2026 को हुई थी। हाथों की मेहंदी का रंग अभी छूटा भी नहीं था कि उसकी पत्नी का सुहाग उजड़ गया। घर में महिलाओं की चीख-पुकार मची हुई है। इस चीख-पुकार के बीच घर की बहुओं की हालत देखकर ग्रामीणों का कलेजा फटा जा रहा है।
मेहनत-मजदूरी से चलता था पेट, अब भरण-पोषण का संकट
तीनों भाई गांव में अपनी वृद्ध मां के साथ रहते थे। तीनों मिलकर मजदूरी का ठेका लेते थे। फिलहाल मक्का कटान में लगे थे। दिन-रात पसीना बहाकर वे जो कमाते थे, उसी से इस बड़े परिवार का भरण-पोषण होता था। साथ ही बड़े भाई की पत्नी व बच्चों का भी ध्यान रख रहे थे। बड़ा बेटा शैलेंद्र वर्तमान में मैनपुरी में सिपाही पद पर तैनात है। वह परिवार से अलग रहता है। कमाऊ बेटों के चले जाने से अब इस लाचार परिवार के सामने रोटी का भीषण संकट खड़ा हो गया है। घर के अंधकार को दूर करने का कोई रास्ता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
अंतिम संस्कार में रो पड़ा पूरा गांव
कासगंज में पोस्टमार्टम होने के बाद तीनों भाइयों के शव गांव में पहुंचते ही हाहाकार मच गया। हर गली, मोहल्ला से रोने की आवाज आने लगी। गमगीन माहौल में तीनों युवाओं का अंतिम संस्कार किया गया।