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Hathras News: मासूमों की आंखों को बीमार कर रही मोबाइल की लत
Wed, 01 Jul 2026 02:45 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Wed, 01 Jul 2026 02:45 AM IST
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प्रतीकात्मक चित्र।
- फोटो : Archive
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स्मार्टफोन पर रील्स और शॉर्ट वीडियो देखने की लत मासूमों की आंखों पर भारी पड़ रही है। जिला अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में इन दिनों आंखों में सूखापन, जलन, पानी आना और चुभन की शिकायत लेकर पहुंचने वालों में बच्चे भी शामिल हैं, जिनकी उम्र 8 से 15 वर्ष के बीच है।
मंगलवार को ओपीडी में 110 के करीब मरीज पहुंचे, जिनमें 18 बच्चे शामिल रहे। नेत्र रोग विशेषज्ञ डाॅ. राजेंद्र सिंह ने बताया कि जब बच्चे स्मार्टफोन पर लगातार रील्स या वीडियो देखते हैं, तो वे एकटक स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखते हैं।
सामान्य तौर पर एक इंसान की पलकें एक मिनट में 15 से 20 बार झपकनी चाहिए, लेकिन स्क्रीन देखते समय यह दर घटकर मात्र पांच से सात बार रह जाती है। पलकें कम झपकने के कारण आंखों में प्राकृतिक रूप से बनने वाले आंसू तेजी से सूखने लगते हैं। इस कारण कॉर्निया पर बुरा असर पड़ता है और आंखों में सूखापन, लालिमा व लगातार चुभन की समस्या पैदा हो जाती है।
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तेजी से बढ़ रहा है आंखों का नंबर
अस्पताल के ओपीडी में आने वाले कई मामलों में यह भी देखा गया है कि लंबे समय तक नजदीक से स्क्रीन देखने के कारण बच्चों की नजर कमजोर हो रही है और उन्हें कम उम्र में ही मोटा चश्मा लगाना पड़ रहा है। चिकित्सक का कहना है कि डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट आंखों की नसों को थका देती है, जिससे बच्चों में सिरदर्द और चिड़चिड़ापन भी बढ़ रहा है।
लक्षण : जिन्हें नजरअंदाज न करें माता-पिता
-आंखों को बार-बार मलना या खुजलाना।
-आंखों से अचानक पानी आना या लाल हो जाना।
-पलकों में भारीपन या आंखों के अंदर कुछ चुभने का एहसास होना।
-सिरदर्द की शिकायत करना या टीवी/किताबों को बहुत नजदीक से देखना।
चिकित्सकों की सलाह :
- 20-20-20 का नियम : हर 20 मिनट के स्क्रीन टाइम के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और 20 फीट दूर रखी किसी वस्तु को देखें। इससे आंखों की मांसपेशियों को आराम मिलता है।
-स्क्रीन टाइम सीमित करें : पांच साल से छोटे बच्चों को मोबाइल से दूर रखें और बड़े बच्चों के लिए भी स्क्रीन टाइम एक घंटे से अधिक न होने दें।
-आउटडोर एक्टिविटी बढ़ाएं : बच्चों को गैजेट्स की दुनिया से निकालकर मैदान में खेलने के लिए प्रेरित करें। प्राकृतिक रोशनी आंखों के विकास के लिए बहुत जरूरी है।
-डाइट में सुधार : बच्चों के भोजन में विटामिन से भरपूर चीजें जैसे गाजर, हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध और पपीता शामिल करें।
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मंगलवार को ओपीडी में 110 के करीब मरीज पहुंचे, जिनमें 18 बच्चे शामिल रहे। नेत्र रोग विशेषज्ञ डाॅ. राजेंद्र सिंह ने बताया कि जब बच्चे स्मार्टफोन पर लगातार रील्स या वीडियो देखते हैं, तो वे एकटक स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखते हैं।
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सामान्य तौर पर एक इंसान की पलकें एक मिनट में 15 से 20 बार झपकनी चाहिए, लेकिन स्क्रीन देखते समय यह दर घटकर मात्र पांच से सात बार रह जाती है। पलकें कम झपकने के कारण आंखों में प्राकृतिक रूप से बनने वाले आंसू तेजी से सूखने लगते हैं। इस कारण कॉर्निया पर बुरा असर पड़ता है और आंखों में सूखापन, लालिमा व लगातार चुभन की समस्या पैदा हो जाती है।
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तेजी से बढ़ रहा है आंखों का नंबर
अस्पताल के ओपीडी में आने वाले कई मामलों में यह भी देखा गया है कि लंबे समय तक नजदीक से स्क्रीन देखने के कारण बच्चों की नजर कमजोर हो रही है और उन्हें कम उम्र में ही मोटा चश्मा लगाना पड़ रहा है। चिकित्सक का कहना है कि डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट आंखों की नसों को थका देती है, जिससे बच्चों में सिरदर्द और चिड़चिड़ापन भी बढ़ रहा है।
लक्षण : जिन्हें नजरअंदाज न करें माता-पिता
-आंखों को बार-बार मलना या खुजलाना।
-आंखों से अचानक पानी आना या लाल हो जाना।
-पलकों में भारीपन या आंखों के अंदर कुछ चुभने का एहसास होना।
-सिरदर्द की शिकायत करना या टीवी/किताबों को बहुत नजदीक से देखना।
चिकित्सकों की सलाह :
- 20-20-20 का नियम : हर 20 मिनट के स्क्रीन टाइम के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और 20 फीट दूर रखी किसी वस्तु को देखें। इससे आंखों की मांसपेशियों को आराम मिलता है।
-स्क्रीन टाइम सीमित करें : पांच साल से छोटे बच्चों को मोबाइल से दूर रखें और बड़े बच्चों के लिए भी स्क्रीन टाइम एक घंटे से अधिक न होने दें।
-आउटडोर एक्टिविटी बढ़ाएं : बच्चों को गैजेट्स की दुनिया से निकालकर मैदान में खेलने के लिए प्रेरित करें। प्राकृतिक रोशनी आंखों के विकास के लिए बहुत जरूरी है।
-डाइट में सुधार : बच्चों के भोजन में विटामिन से भरपूर चीजें जैसे गाजर, हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध और पपीता शामिल करें।