White Vulture: जंगल सिकुड़ा तो अलीगढ़ में घुसा दुर्लभ सफेद गिद्ध, देख वन्यजीव विशेषज्ञ भी रह गए हैरान
सफेद गिद्ध दुनिया के उन गिने-चुने पक्षियों में है जो औजार का इस्तेमाल करते हैं। यह शुतुरमुर्ग के अंडे को तोड़ने के लिए पत्थर उठाकर उस पर मारता है।
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पीला व नारंगी चेहरा और गर्दन के आसपास खड़े हुए लंबे पंख। तस्वीर में दिख रहा यह पक्षी सफेद गिद्ध है। पहली बार इसे अलीगढ़ के तालानगरी में देखा गया, जिसकी उम्र लगभग चार से आठ वर्ष के बीच हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह एक वयस्क गिद्ध है जो लगातार घटते वन क्षेत्र और बढ़ते शहरीकरण के चलते अलीगढ़ की आबादी तक आ पहुंचा।
तस्वीर देखते ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वन्यजीव विज्ञान विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. अफीफ उल्लाह ने तत्काल इसे पहचान लिया और बताया कि पहले पश्चिमी अफ़्रीका से लेकर उत्तर भारत, पाकिस्तान और नेपाल में काफी तादाद में पाया जाता था लेकिन अब इसकी आबादी में बहुत गिरावट आई है और इसे अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने संकटग्रस्त घोषित कर दिया है।
उन्होंने यहां तक कहा कि जंगलों के सिकुड़ने और भोजन के प्राकृतिक स्रोत कम होने के कारण यह दुर्लभ गिद्ध अब आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास भोजन तलाशने लगा है। जंगल कम होने से मृत पशुओं की उपलब्धता भी घट गई है जो गिद्धों का मुख्य भोजन होते हैं। इसी वजह से ये पक्षी अब कूड़े के ढेर और डंपिंग ग्राउंड जैसे स्थानों के आसपास देखे जाने लगे हैं।
दरअसल अलीगढ़ का कुल वन क्षेत्र जिले के भौगोलिक क्षेत्रफल का महज 1.6 से 1.8 प्रतिशत रह गया है। करीब छह से सात हजार हेक्टेयर आरक्षित और संरक्षित वन क्षेत्र इस प्रजाति के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा। ऐसे में इन पक्षियों का प्राकृतिक आवास लगातार सीमित होता जा रहा है।
औजार इस्तेमाल करने वाला गिद्ध
इसे इजिप्शियन वल्चर भी कहते हैं। यह दुनिया के उन गिने-चुने पक्षियों में है जो औजार का इस्तेमाल करते हैं। यह शुतुरमुर्ग के अंडे को तोड़ने के लिए पत्थर उठाकर उस पर मारता है। इसे प्रकृति का नेचुरल सैनिटेशन वर्कर माना जाता है क्योंकि यह मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को साफ रखने में मदद करता है। यह गिद्ध छह हजार मीटर तक ऊंचाई पर उड़ सकता है और कई बार लंबी दूरी तक भोजन की तलाश में उड़ान भरता है। डाइक्लोफेनाक जैसी पशु दवाओं और आवास खत्म होने के कारण भारत में गिद्धों की कई प्रजातियों की आबादी पिछले 20–25 साल में 90% तक घट चुकी है।
एएमयू करेगा विस्तृत अध्ययन
एएमयू का वन्यजीव विज्ञान विभाग अब जिले में इस प्रजाति की संख्या, आवास और व्यवहार में आए बदलाव का विस्तृत सर्वे कराने की तैयारी कर रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पिछले दो दशकों में इनकी आबादी में कितनी गिरावट आई है, इसका सटीक आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है। चर्चा यह भी है कि हाल के दिनों में रामघाट रोड को चौड़ा करने के लिए क्वार्सी से अतरौली तक बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई हुई है। इसी वजह से यह गिद्ध भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ा।