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Jhansi: मेडिकल कॉलेज में सुरक्षित प्रसव के दावे फेल, 22 दिन में 5 महिलाओं की मौत
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
Published by: दीपक महाजन
Updated Fri, 06 Feb 2026 11:24 AM IST
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सार
तमाम योजनाओं के बावजूद महिलाओं की मौतों ने अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मेडिकल कॉलेज, झांसी
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
जिस मेडिकल कॉलेज को सुरक्षित मातृत्व की सबसे मजबूत कड़ी माना जाता है, उसी में पिछले 22 दिनों में प्रसव के दाैरान पांच महिलाओं की मौत ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता को बेनकाब कर दिया है। जिन महिलाओं को सुरक्षित गोद में बच्चा लेकर घर लौटना था, वे अस्पताल से कफन में लौटीं। तमाम योजनाओं के बावजूद महिलाओं की मौतों ने अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में पांच महिलाओं की मौत का मामला सीडीओ कार्यालय में बृहस्पतिवार को हुई डीएचएस (डिस्ट्रिक हेल्थ सोसाइटी) की बैठक में उठा। बताया गया कि इनमें से चार महिलाओं की माैत सामान्य प्रसव के बावजूद हुई जबकि पांचवीं की माैत गर्भस्थ शिशु के दम तोड़ने से हुई। आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि सीडीओ जुनैद अहमद और सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय की मौजूदगी में मेडिकल कॉलेज में 23 दिसंबर से 14 जनवरी तक प्रसव के दाैरान महिलाओं की मौत पर चिंता जाहिर की गई। प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया है और जल्द ही डीएम की अध्यक्षता में विशेषज्ञ डॉक्टरों की मौजूदगी में समीक्षा होगी।
यह बताए मौत के कारण
23 दिसंबर को मेवातीपुरा की मंजू की मृत्यु - कार्डियक अरेस्ट एवं एक्यूट रीनल फेल्योर।
27 दिसंबर को मऊरानीपुर की कल्पना की मौत - न्यूरोजेनिक शॉक।
8 जनवरी को मगरपुर की मंता की मृत्यु - हाई रिस्क प्रेगनेंसी।
10 जनवरी को टोड़ी फतेहपुर की गायत्री की मौत - न्यूरोजेनिक शॉक।
14 जनवरी को मऊरानीपुर की लक्ष्मी की मृत्यु- गर्भ में बच्चे के मरने से।
नोट - प्रथम चारों महिलाओं से जन्म लेने वाले शिशु स्वस्थ हैं।
सुरक्षित प्रसव के लिए ये चल रहीं योजनाएं
जननी सुरक्षा योजना में संस्थागत प्रसव पर जोर होता है। सरकारी अस्पताल में प्रसव होने पर 1400 व निजी अस्पताल में 1000 रुपये मिलते हैं।
जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम में गर्भवती को लाने-ले जाने, दवा, खाने-पीने की सुविधा मिलती है। जरूरत पर दवा खरीदकर भी दी जाती है।
नियमित टीकाकरण के तहत गर्भधारण होते ही डीटी का टीका लगता है। सभी जांचें निशुल्क होती हैं। प्रसव होने तक चार बार जांच व अल्ट्रासाउंड होता है।
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत सीएचसी, पीएचसी, महिला जिला अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में हर माह की एक, नौ, 16 व 24 को स्पेशल क्लीनिक लगती है, जिसमें विशेषज्ञ जांच करते हैं।
जिन महिलाओं को एचआरपी (हाई रिस्क प्रेगनेंसी) होती है, उनकी प्रसव होने तक आठ बार जांच होती है।
मेडिकल कॉलेज में प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत का आंकड़ा कम हुआ है। 22 दिन में पांच महिलाओं की मौत की डेथ ऑडिट होने के बाद रिपोर्ट एमडीआर की बैठक में रखी है।- डाॅ. सिप्पी अग्रवाल, विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज
एमडीआर बैठक में पांच महिलाओं की मौत की समीक्षा की गई है। हकीकत यह है कि जिले में प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत का आंकड़ा काफी कम हुआ है।- डॉ. सुधाकर पांडेय, सीएमओ
बच्चे की मौत के मामले में नहीं हुई कोई कार्रवाई
नाक में बढ़े मांस की सर्जरी से नौ वर्ष के बच्चे कृष्णा की मौत के मामले को न तो जिला स्वास्थ्य विभाग और न मेडिकल कॉलेज प्रशासन गंभीरता से ले रहा है। सूत्रों के अनुसार पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। यही वजह है नोटिस के 10 दिन बाद भी संबंधित चिकित्सक ने न तो कोई जवाब दिया है और न ही डेथ ऑडिट कमेटी के पास मामला भेजा गया है। सीएमएस डॉ. सचिन माहुर का कहना है कि चिकित्सक के जवाब का इंतजार है। उसके बाद ही आगे की कार्रवाई तय होगी।
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महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में पांच महिलाओं की मौत का मामला सीडीओ कार्यालय में बृहस्पतिवार को हुई डीएचएस (डिस्ट्रिक हेल्थ सोसाइटी) की बैठक में उठा। बताया गया कि इनमें से चार महिलाओं की माैत सामान्य प्रसव के बावजूद हुई जबकि पांचवीं की माैत गर्भस्थ शिशु के दम तोड़ने से हुई। आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि सीडीओ जुनैद अहमद और सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय की मौजूदगी में मेडिकल कॉलेज में 23 दिसंबर से 14 जनवरी तक प्रसव के दाैरान महिलाओं की मौत पर चिंता जाहिर की गई। प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया है और जल्द ही डीएम की अध्यक्षता में विशेषज्ञ डॉक्टरों की मौजूदगी में समीक्षा होगी।
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यह बताए मौत के कारण
23 दिसंबर को मेवातीपुरा की मंजू की मृत्यु - कार्डियक अरेस्ट एवं एक्यूट रीनल फेल्योर।
27 दिसंबर को मऊरानीपुर की कल्पना की मौत - न्यूरोजेनिक शॉक।
8 जनवरी को मगरपुर की मंता की मृत्यु - हाई रिस्क प्रेगनेंसी।
10 जनवरी को टोड़ी फतेहपुर की गायत्री की मौत - न्यूरोजेनिक शॉक।
14 जनवरी को मऊरानीपुर की लक्ष्मी की मृत्यु- गर्भ में बच्चे के मरने से।
नोट - प्रथम चारों महिलाओं से जन्म लेने वाले शिशु स्वस्थ हैं।
सुरक्षित प्रसव के लिए ये चल रहीं योजनाएं
जननी सुरक्षा योजना में संस्थागत प्रसव पर जोर होता है। सरकारी अस्पताल में प्रसव होने पर 1400 व निजी अस्पताल में 1000 रुपये मिलते हैं।
जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम में गर्भवती को लाने-ले जाने, दवा, खाने-पीने की सुविधा मिलती है। जरूरत पर दवा खरीदकर भी दी जाती है।
नियमित टीकाकरण के तहत गर्भधारण होते ही डीटी का टीका लगता है। सभी जांचें निशुल्क होती हैं। प्रसव होने तक चार बार जांच व अल्ट्रासाउंड होता है।
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत सीएचसी, पीएचसी, महिला जिला अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में हर माह की एक, नौ, 16 व 24 को स्पेशल क्लीनिक लगती है, जिसमें विशेषज्ञ जांच करते हैं।
जिन महिलाओं को एचआरपी (हाई रिस्क प्रेगनेंसी) होती है, उनकी प्रसव होने तक आठ बार जांच होती है।
मेडिकल कॉलेज में प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत का आंकड़ा कम हुआ है। 22 दिन में पांच महिलाओं की मौत की डेथ ऑडिट होने के बाद रिपोर्ट एमडीआर की बैठक में रखी है।- डाॅ. सिप्पी अग्रवाल, विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज
एमडीआर बैठक में पांच महिलाओं की मौत की समीक्षा की गई है। हकीकत यह है कि जिले में प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत का आंकड़ा काफी कम हुआ है।- डॉ. सुधाकर पांडेय, सीएमओ
बच्चे की मौत के मामले में नहीं हुई कोई कार्रवाई
नाक में बढ़े मांस की सर्जरी से नौ वर्ष के बच्चे कृष्णा की मौत के मामले को न तो जिला स्वास्थ्य विभाग और न मेडिकल कॉलेज प्रशासन गंभीरता से ले रहा है। सूत्रों के अनुसार पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। यही वजह है नोटिस के 10 दिन बाद भी संबंधित चिकित्सक ने न तो कोई जवाब दिया है और न ही डेथ ऑडिट कमेटी के पास मामला भेजा गया है। सीएमएस डॉ. सचिन माहुर का कहना है कि चिकित्सक के जवाब का इंतजार है। उसके बाद ही आगे की कार्रवाई तय होगी।
