‘कातिलों का सजा’: सियासी आसमान से सलाखों के पीछे, मुलायम के दौर में कहा गया मिनी CM, कमलेश पाठक का रसूख खत्म
Auraiya Double Murder Case: कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी और मिनी मुख्यमंत्री के रूप में पहचाने जाने वाले पूर्व एमएलसी कमलेश पाठक का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव और दोहरे हत्याकांड में उम्रकैद की सजा के साथ बदल चुका है। कभी छात्रसंघ की गहरी दोस्ती से सियासी परछाई कहे जाने वाले मंजुल चौबे से उनकी दुश्मनी और हनुमान मंदिर की जमीन का विवाद उनके राजनीतिक पतन की बड़ी वजह बन गया।
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में कमलेश पाठक एक ऐसा नाम रहा, जिसका रसूख और बेबाक अंदाज हमेशा चर्चा में रहा। 28 साल की उम्र में वर्ष 1985 में लोकदल के टिकट पर पहली बार विधायक बनने वाले कमलेश पाठक ने प्रदेश की सियासत में अपनी धमक का एहसास तब कराया, जब उसने जनता दल के विधायकों को तोड़कर मुलायम सिंह यादव की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई।
इसके बाद वह मुलायम सिंह के सबसे करीबी नेताओं में शुमार हो गया और एक दौर ऐसा आया जब लोग उसे मिनी मुख्यमंत्री कहकर बुलाने लगे थे। कमलेश पाठक 1990 में समाजवादी पार्टी से एमएलसी बना और 1991 में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद वर्ष 2002 में डेरापुर (अब सिकंदरा) विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर दोबारा विधानसभा में कदम रखा।
जिले की बहाली के लिए आंदोलन की अगुवाई की
हालांकि 2007 में औरैया सीट से कमलेश को बसपा के शेखर तिवारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2000 में जब मुलायम सरकार ने बसपा शासनकाल में बने औरैया जिले का अस्तित्व समाप्त करने की घोषणा की, तो कमलेश पाठक अपनी ही पार्टी और नेता के विरोध में खुलकर खड़ा हो गया था। जिले की बहाली के लिए उसने आंदोलन की अगुवाई की।
काले झंडे दिखाने के बाद मनमुटाव रहा
मंडी समिति में जनसभा करने आए मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के हेलीकॉप्टर को कमलेश पाठक ने जनता के साथ मिलकर काले झंडे दिखाए। इस जनआंदोलन के आगे आखिरकार मुलायम सरकार को झुकना पड़ा और औरैया को दोबारा जिले का दर्जा मिला। काले झंडे दिखाने की घटना के बाद मुलायम सिंह और कमलेश पाठक के बीच कुछ समय तक मनमुटाव रहा, लेकिन अन्य पार्टी में जाने की चर्चाओं के बीच मुलायम सिंह ने उसे वापस बुलाकर गले लगा लिया था।
दोहरे हत्याकांड में नाम आने के बाद जेल भेज दिया गया
वर्ष 2012 में सिकंदरा सीट से चुनाव हारने के बाद भी 2013 में सपा सरकार ने उसे रेशम विभाग का अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया था। 17 मई 2015 को फिर से एमएलसी बनाया। राजनीतिक रसूख के चरम पर रहने वाले कमलेश पाठक का सफर 15 मार्च 2020 को उस समय पलट गया, जब चर्चित दोहरे हत्याकांड में नाम आने के बाद उसे जेल भेज दिया गया।
कभी जो बने थे परछाई, वही बने कट्टर विरोधी
जिले के सियासी गलियारों में कभी कमलेश पाठक और मंजुल चौबे की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। भड़ारीपुर गांव के कमलेश पाठक और मंजुल चौबे के बीच इतना गहरा दोस्ताना था कि लोग मंजुल को कमलेश पाठक की परछाई तक कहते थे। यह रिश्ता उस समय और मजबूत हुआ जब तिलक महाविद्यालय से मंजुल चौबे छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए।
छात्रसंघ चुनाव से शुरू हुई दोस्ती
उस दौर में कमलेश पाठक उनके सबसे बड़े मददगार और राजनीतिक संरक्षक बनकर साथ खड़े नजर आए थे। दशकों पुरानी इस गहरी दोस्ती को किसी की नजर लग गई और मंजुल अपने राजनीतिक साथी कमलेश पाठक के कट्टर दुश्मन हो गए। इससे दोनों के बीच ऐसी खटास पैदा की कि दूरियां लगातार बढ़ती चली गईं। इसके बाद मंजुल चौबे ने भाजपा नेताओं का साथ लिया। जबकि कमलेश पाठक सपा के साथ अपनी निष्ठा मजबूत करते रहे।
जमीन के टुकड़े ने बोए दुश्मनी के बीज
राजनीतिक विचारधारा अलग होने के बाद दोनों के बीच वर्चस्व की असली लड़ाई नरायनपुर स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास सरकारी एक बीघा जमीन को लेकर शुरू हुई। कमलेश ने अपने रसूख के चलते अधिकारियों की सांठगांठ से इस बेशकीमती जमीन का बैनामा करा लिया। इसके बाद मंजुल चौबे ने खुलकर विरोध किया। कोर्ट से जमीन का पट्टा निरस्त करा दिया। पट्टा निरस्त कराना दोनों के बीच अंतिम कील साबित हुआ और वर्षों पुरानी दोस्ती सीधे तौर पर एक-दूसरे के आमने-सामने वर्चस्व की खूनी जंग में तब्दील हो गई।
आंदोलन व रैलियों में उमड़ने वाली वही भीड़, फैसला सुनने पहुंची
कमलेश पाठक ने अपनी कार्यशैली से मुखर वक्ता की पहचान बनाई थी। यही वजह थी कि जिस पार्टी में उनका रुतबा मिनी मुख्यमंत्री के तौर पर जाना जाता था। उसी समाजवादी पार्टी के खिलाफ वो जिले का वजूद बचाने के लिए खड़ा हो गया था। मुखर वक्ता होने के चलते उनके आंदोलन से लेकर चुनावी रैलियों में अक्सर भारी भीड़ उमड़ती थी। जेल जाने के बाद से भले कमलेश पाठक के वर्चस्व के दिन खत्म हो गए हों, लेकिन आंदोलन व रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ कोर्ट में उनका फैसला सुनने भी पहुंची।