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'चिल्ड्रेन रोटी बैंक' से चमकी बच्चों की किस्मत
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
Updated Mon, 14 Nov 2016 03:55 PM IST
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चिल्ड्रेन रोटी बैंक के सहारे छह मलिन बस्तियों के 1100 बच्चों की किस्मत चमकाई जा रही है। तीन से 10 साल की उम्र के बच्चों को सप्ताह में रोज एक समय का खाना देने के साथ ही संस्कार और शिक्षा दी जा रही है। यह शुरुआत जूही परमपुरवा के धर्मेंद्र कुमार सिंह ने की। अब शहरवासियों का साथ मिला है। बड़ी संख्या में लोग आए हैं और बच्चों के खाने का इंतजाम कर रहे हैं।
कानपुर यूनिवर्सिटी से बीएससी बायोटेक और बीएचयू से एमएससी बायोटेक करने के बाद धर्मेंद्र कुमार सिंह ने मलिन बस्ती और गरीब परिवार के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। मई 2001 से काम शुरू किया, जो अब बड़ा रूप ले चुका है। धर्मेंद्र ने बताया कि रोटी बैंक से बच्चों को जोड़ा गया। वे खाने के बहाने आए, फिर संस्कार और शिक्षा की बात की गई। इस प्रोजेक्ट से शहरवासी भी जुड़े हैं। तमाम लोग खाना बनाकर लाते हैं और खुद परोसकर बच्चों को खिलाते हैं। सब कहते हैं कि इससे बड़ा पुण्य नहीं हो सकता है। बहरहाल, बच्चों को खाना मिल जाता है। इसी बहाने उन्हें संस्कार और शिक्षा भी दे दी जाती है। यह सिलसिला रोज चलता है। आगे भी जारी रहेगा। किसी से आर्थिक सहायता नहीं ली जाती है।
संस्कार
मलिन बस्ती के हर बच्चे को हाथ धुलकर खाना खाने की सीख दी गई। भीख मांगने और चोरी करने के बजाय शिक्षित बनकर रोजगार करने के लिए प्रेरित किया गया। साफ कपड़े पहनकर घर से निकलने और रोज नहाने का गुरुमंत्र भी दिया गया। इसका अनुपालन बच्चे कर रहे हैं। रोजाना प्रार्थना कराई जाती है। बच्चे जय हिंद बोलकर आपस में बात करते हैं।
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शिक्षा
डेरा बस्ती मिलिट्री कैंप, तोतापुरवा, परमपुरवा, जालसा नगर परमपुरवा और गोसाईंपुरवा मलिन बस्ती के बच्चों की विशेष कक्षाएं लगती हैं। हिंदी, अंग्रेजी की जानकारी दी जाती है। शिक्षा-दीक्षा का प्रोजेक्ट 10 महीने का है। पर्याप्त जानकारी मिलने के बाद बच्चों का स्कूलों में एडमिशन कराया जाएगा। अलग-अलग समूह के बच्चों के लिए प्रतिमाह तीन हजार रुपये का बजट निर्धारित किया गया है।
152 बच्चों की नि:शुल्क पढ़ाई
सिंगल पैरेंट चाइल्ड (मां या पिता न हो) से संबंधित 152 बच्चों को कक्षा एक से आठ तक की नि:शुल्क शिक्षा दी जा रही है। जो बच्चे ऐसे हों, वह परमपुरवा स्थित सम्राट अशोक विद्या मंदिर से पढ़ाई कर सकते हैं। गरीब मेधावियों के लिए थ्योरी और प्रैक्टिकल बेस्ड पढ़ाई के विकल्प हैं।
कौन हैं धर्मेंद्र
धर्मेंद्र के पिता समरनाथ सिंह की परमपुरवा में पान की गुमटी थी। वह ठाकुर साहब के नाम से पुकारे जाते थे। इसीलिए धर्मेंद्र का बचपन परमपुरवा में गुजरा। वह 10 साल तक स्कूल नहीं गए। पतंग और कहानी की किताबें भी बेचीं। बाद में पिता ने स्कूल में दाखिला कराया और पढ़कर निकल गए। जॉब भी मिली लेकिन उसमें मन नहीं लगा। जॉब छोड़कर गरीब बच्चों के बीच में काम करने चले आए।
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कानपुर यूनिवर्सिटी से बीएससी बायोटेक और बीएचयू से एमएससी बायोटेक करने के बाद धर्मेंद्र कुमार सिंह ने मलिन बस्ती और गरीब परिवार के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। मई 2001 से काम शुरू किया, जो अब बड़ा रूप ले चुका है। धर्मेंद्र ने बताया कि रोटी बैंक से बच्चों को जोड़ा गया। वे खाने के बहाने आए, फिर संस्कार और शिक्षा की बात की गई। इस प्रोजेक्ट से शहरवासी भी जुड़े हैं। तमाम लोग खाना बनाकर लाते हैं और खुद परोसकर बच्चों को खिलाते हैं। सब कहते हैं कि इससे बड़ा पुण्य नहीं हो सकता है। बहरहाल, बच्चों को खाना मिल जाता है। इसी बहाने उन्हें संस्कार और शिक्षा भी दे दी जाती है। यह सिलसिला रोज चलता है। आगे भी जारी रहेगा। किसी से आर्थिक सहायता नहीं ली जाती है।
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संस्कार
मलिन बस्ती के हर बच्चे को हाथ धुलकर खाना खाने की सीख दी गई। भीख मांगने और चोरी करने के बजाय शिक्षित बनकर रोजगार करने के लिए प्रेरित किया गया। साफ कपड़े पहनकर घर से निकलने और रोज नहाने का गुरुमंत्र भी दिया गया। इसका अनुपालन बच्चे कर रहे हैं। रोजाना प्रार्थना कराई जाती है। बच्चे जय हिंद बोलकर आपस में बात करते हैं।
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शिक्षा
डेरा बस्ती मिलिट्री कैंप, तोतापुरवा, परमपुरवा, जालसा नगर परमपुरवा और गोसाईंपुरवा मलिन बस्ती के बच्चों की विशेष कक्षाएं लगती हैं। हिंदी, अंग्रेजी की जानकारी दी जाती है। शिक्षा-दीक्षा का प्रोजेक्ट 10 महीने का है। पर्याप्त जानकारी मिलने के बाद बच्चों का स्कूलों में एडमिशन कराया जाएगा। अलग-अलग समूह के बच्चों के लिए प्रतिमाह तीन हजार रुपये का बजट निर्धारित किया गया है।
152 बच्चों की नि:शुल्क पढ़ाई
सिंगल पैरेंट चाइल्ड (मां या पिता न हो) से संबंधित 152 बच्चों को कक्षा एक से आठ तक की नि:शुल्क शिक्षा दी जा रही है। जो बच्चे ऐसे हों, वह परमपुरवा स्थित सम्राट अशोक विद्या मंदिर से पढ़ाई कर सकते हैं। गरीब मेधावियों के लिए थ्योरी और प्रैक्टिकल बेस्ड पढ़ाई के विकल्प हैं।
कौन हैं धर्मेंद्र
धर्मेंद्र के पिता समरनाथ सिंह की परमपुरवा में पान की गुमटी थी। वह ठाकुर साहब के नाम से पुकारे जाते थे। इसीलिए धर्मेंद्र का बचपन परमपुरवा में गुजरा। वह 10 साल तक स्कूल नहीं गए। पतंग और कहानी की किताबें भी बेचीं। बाद में पिता ने स्कूल में दाखिला कराया और पढ़कर निकल गए। जॉब भी मिली लेकिन उसमें मन नहीं लगा। जॉब छोड़कर गरीब बच्चों के बीच में काम करने चले आए।