UP: वारिसों के पैसों से सेनानियों का सम्मान, नगर निगम ले रहा है श्रेय, परिजन बोले- एक रुपये की मदद नहीं मिली
Kanpur Freedom Fighters Honor: कानपुर नगर निगम ने गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान में शिलालेख लगाने के लिए 25 लाख रुपये का बजट पास किया था, लेकिन चार साल बाद भी सरकारी उपेक्षा के चलते अधिकांश काम ठप है। अब सेनानियों के परिजन खुद अपनी जेब से खर्च करके पूर्वजों की स्मृतियों को संजोने को मजबूर हैं।
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देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत सरकारी उपेक्षा और व्यवस्था के बीच फंसी नजर आ रही है। जिन नामों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी उन्हें सम्मान दिलाने की जिम्मेदारी अब उनके परिजनों के कंधों पर टिकी है। महानगर में गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर लगने वाले शिलापटों की स्थिति कुछ यही कह रही है।
जिनके पास पैसा है वह स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले अपने पूर्वज के नाम का शिलापट लगवा रहे हैं। जो इस मामले में आर्थिक रूप से कमजोर हैं उनके घर के स्वतंत्रता सेनानी आज भी गुमनाम हैं। नगर निगम सदन ने 20 दिसंबर 2021 को मेयर प्रमिला पांडेय की अध्यक्षता में प्रस्ताव पारित किया था कि महानगर के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम के शिलालेख लगाए जाएंगे।
25 लाख रुपये का किया गया था प्रावधान
इसके लिए पुनरीक्षित बजट में 25 लाख रुपये का प्रावधान किया गया था। यह भी तय हुआ था कि आने वाले वित्तीय वर्षों में भी इस मद में बजट की व्यवस्था की जाएगी। प्रस्ताव के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के आवास के आसपास की सड़कों और पार्कों का नामकरण भी उनके नाम पर किए जाने की बात कही गई थी। इसके बाद शहर में 130 से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों को चिह्नित किया गया था।
परिवारों ने अपनी जेब से उठाया खर्चा
वहीं हकीकत में करीब साढ़े चार साल बाद भी अब तक केवल 12 से 15 सेनानियों के नाम के ही शिलापट लगाए जा सके हैं। इन सभी जगह मेयर लोकार्पण करने और फीता काटने पहुंचीं। हालांकि इनका खर्च नगर निगम ने नहीं बल्कि संबंधित परिवारों ने अपनी जेब से उठाया। ऐसे में सवाल यह है कि जब नगर निगम ने स्वयं यह जिम्मेदारी लेने का प्रस्ताव पारित किया था, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ...?
भेदभाव के बगैर देश के लिए संघर्ष किया
आजादी की लड़ाई में किसी सेनानी ने यह नहीं पूछा था कि भविष्य में उसका परिवार अमीर होगा या गरीब...। उन्होंने किसी भेदभाव के बगैर देश के लिए संघर्ष किया था। फिर आज उनके सम्मान का पैमाना परिवार की आर्थिक क्षमता क्यों बन गया...? क्या स्वतंत्रता सेनानियों को याद रखना भी अब सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि परिवारों की निजी व्यवस्था रह गई है...?
नगर निगम की ओर से प्रस्ताव पारित किए जाने पर हमें बहुत खुशी हुई थी। हम मेयर से मिले और नगर निगम से व्यवस्था कराने को कहा तो उन्होंने कहा कि क्या अपने पिताजी के नाम पर 5-10 हजार रुपये भी नहीं खर्च कर सकते? क्यों सरकारी चक्कर में पड़े हो? हमें अपने पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व को शहर की भावी पीढ़ी से रूबरू कराना था। इसलिए हमने शिलापट बनवाया और फिर मेयर लोकार्पण करने आईं। हालांकि यह दुखद है कि स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान भी सरकार नहीं कर पा रही है। -सत्येंद्र कुमार सिन्हा, अध्यक्ष, अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी संयुक्त संगठन
पिता के पुण्य प्रताप से इतने सामर्थ्यवान हैं कि उनकी स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए सब कुछ कर सकते हैं। हालांकि कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी परिवार भी हैं जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं और अपने पूर्वज के नाम का शिलापट नहीं लगवा सकते। ऐसे गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के लिए नगर निगम प्रशासन को आगे आकर सम्मान दिलाना चाहिए। -डॉ. आरके निगम
शिलापट के लिए नगर निगम की ओर से एक रुपये भी नहीं मिला था। हमारे पिता ने देश की आजादी में योगदान दिया था और हम उनके पुत्र हैं इसलिए उनसे जुड़ी स्मृतियों को संजोने के लिए जो बन सका हमने किया। नगर निगम की पहल अच्छी थी लेकिन इसका क्रियान्वयन भी उसी स्तर पर किया जाता तो नई पीढ़ी के बीच इसका संदेश और बेहतर जाता। -मृगांक शेखरानंद आनंद
स्वतंत्रता सेनानी रहे पिता के नाम का शिलापट हमने खुद लगवाया। लोगों ने समझाया था कि नगर निगम के चक्कर में पड़ोगे तो काम अटक सकता है। पिता के सक्षम पुत्र हो तो खुद ही सब कुछ कर लो। सुझाव सही लगा और अपने स्तर से शिलापट बनवाया। बाद में लोकार्पण के लिए मेयर सहित अन्य लोगों को आमंत्रित किया। -अरविंद शुक्ला
स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार के उत्तराधिकारियों ने हमसे कहा था कि शिलापट वह लगवा लेंगे। इसलिए नगर निगम की ओर से धन की व्यवस्था नहीं की गई। जो लोग शिलापट नहीं लगवा पा रहे हैं वह हमसे संपर्क करें। उनके लिए व्यवस्था कराई जाएगी। -प्रमिला पांडेय, मेयर