{"_id":"5b9cf066867a557ff129c5e1","slug":"know-about-the-history-of-ganesh-chaturthi-festival","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"99 बरस पुराना है गणेशोत्सव का इतिहास, अब हर गली-मोहल्लों में सजने लगे पंडाल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
99 बरस पुराना है गणेशोत्सव का इतिहास, अब हर गली-मोहल्लों में सजने लगे पंडाल
शैली भल्ला, अमर उजाला, कानपुर
Updated Sat, 15 Sep 2018 05:32 PM IST
सार
-शहर में 1919 से मनाया जा रहा गणेश महोत्सव
-महाराष्ट्रियन परिवारों ने घरों में की थी स्थापना पूजा
-पुणे से मंगवाई जाती थी मूर्तियां, युवाओं को दिया मंच
विज्ञापन
गणेशोत्सव
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आपको यह जानकर हैरत होगी कि यूपी के कानपुर शहर में गणेश महोत्सव का इतिहास 99 बरस पुराना है। कानपुर में इसकी शुरूआत का श्रेय महाराष्ट्र मंडल को जाता है। सन् 1919 में चंद मराठी परिवारों ने गणेश स्थापना से इसकी शुरूआत की थी। वक्त के साथ-साथ गणेश उत्सव के रंग और अंदाज बदलते चले गए। कभी पालकी से विदा होने वाले गणपति बप्पा की प्रतिमाएं अब हाईटेक रथ पर विराजमान होकर विसर्जन को जाती हैं।
20-25 मराठी परिवारों ने की थी शुरूआत
गणेशोत्सव
- फोटो : अमर उजाला
महाराष्ट्र मंडल के पूर्व अध्यक्ष हरिभाऊ खांडेकर ने बताया कि मराठी समुदाय में गणपति स्थापना का इतिहास काफी पुराना है। सन् 1892 में पुणे से पं बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणेश महोत्सव की घोषणा की थी। कानपुर में उस समय कुछ ही मराठी परिवार रहते थे। बिठूर के गणेश मंदिर में गणेश उत्सव मनाया जाता था, लेकिन उसका विस्तार नहीं था। 1919 में करीब 20-25 मराठी परिवार के लोगों ने गणेश उत्सव समिति की स्थापना की और घरों में ही गणेश स्थापना की।
कुछ साल बाद टेक्सटाइल इंस्टीट्यूट के कुछ मराठी शिक्षक और छात्र भी इस समिति से जुड़े और उत्सव को वृहद स्तर पर मनाने में जुट गए। युवाओं की प्रतिभाओं को मंच देने के लिए 11 दिनों तक इस महोत्सव में कई सांस्कृतिक, रंगारंग, व्याख्यान आदि कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- सन् 1924 में हुआ महाराष्ट्र मंडल का गठन...
कुछ साल बाद टेक्सटाइल इंस्टीट्यूट के कुछ मराठी शिक्षक और छात्र भी इस समिति से जुड़े और उत्सव को वृहद स्तर पर मनाने में जुट गए। युवाओं की प्रतिभाओं को मंच देने के लिए 11 दिनों तक इस महोत्सव में कई सांस्कृतिक, रंगारंग, व्याख्यान आदि कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- सन् 1924 में हुआ महाराष्ट्र मंडल का गठन...
सन् 1924 में हुआ महाराष्ट्र मंडल का गठन
गणेशोत्सव
- फोटो : अमर उजाला
सन् 1924 में गणेश उत्सव समिति का नाम बदल कर महाराष्ट्र मंडल कर दिया गया। इसकी स्थापना तिलक हाल के पास की गई। सन् 1939 में महाराष्ट्र मंडल खलासी लाइन में स्थापित किया गया। डॉ. खांडेकर ने बताया कि चूंकि महाराष्ट्र में साक्षरता का प्रतिशत ज्यादा था।
इस वजह से कई बड़े मराठी अधिकारी, अफसर शिक्षा, चिकित्सा, प्रशासनिक, उद्यमी आगे आए। चकेरी एयरफोर्स, आईआईटी, बिठूर, अनवरगंज, खलासी लाइन, कोपरगंज क्षेत्रों में मराठी परिवारों की संख्या बढ़ी। मंडल से कई लोग जुड़े। धीरे-धीरे गणेशोत्सव का विस्तार होने लगा।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- 1921 में हुई सुतरखाना मंदिर की स्थापना...
इस वजह से कई बड़े मराठी अधिकारी, अफसर शिक्षा, चिकित्सा, प्रशासनिक, उद्यमी आगे आए। चकेरी एयरफोर्स, आईआईटी, बिठूर, अनवरगंज, खलासी लाइन, कोपरगंज क्षेत्रों में मराठी परिवारों की संख्या बढ़ी। मंडल से कई लोग जुड़े। धीरे-धीरे गणेशोत्सव का विस्तार होने लगा।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- 1921 में हुई सुतरखाना मंदिर की स्थापना...
विज्ञापन
विज्ञापन
1921 में हुई सुतरखाना मंदिर की स्थापना
गणेशोत्सव
- फोटो : अमर उजाला
गणेश मंदिर के दर्शन करने के लिए मराठी परिवार के लोगों को ट्रेन से बिठूर जाना पड़ता था। इसे लेकर परिवारों और समिति के लोगों ने सुतरखाना में गणपति की स्थापना की मांग की।
सुतरखाना के पास पहले नहर बहती थी जो जाकर गंगा में मिलती थी जिस वजह से इसी जगह को मंदिर के लिए उपर्युक्त माना गया। खांडेकर कहते हैै सुतरखाना मंदिर के अगल-बगल घर हुआ करते थे और मंदिर जाने के लिए पतली सी सीढ़ियां हुआ करती थी। इसके बाद मंदिर का विस्तार हुआ।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- पहले पुणे से आती थी मूर्तियां...
सुतरखाना के पास पहले नहर बहती थी जो जाकर गंगा में मिलती थी जिस वजह से इसी जगह को मंदिर के लिए उपर्युक्त माना गया। खांडेकर कहते हैै सुतरखाना मंदिर के अगल-बगल घर हुआ करते थे और मंदिर जाने के लिए पतली सी सीढ़ियां हुआ करती थी। इसके बाद मंदिर का विस्तार हुआ।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- पहले पुणे से आती थी मूर्तियां...
विज्ञापन
पहले पुणे से आती थी मूर्तियां
गणेशोत्सव
- फोटो : अमर उजाला
महाराष्ट्र मंडल के गणेश महोत्सव में पहले पुणे से गणपति की दो मूर्तियां आती थी। तत्कालीन यूपी सेल्स में चीफ एक्जीक्यूटिव गोपाल राव पटवर्धन इन मूर्तियों को मंगवाते थे। इसमें एक शोभामूर्ति होती थी और एक पूजन के लिए। स्थापना के बाद मूर्ति का विसर्जन पालकी से होता था। शोभायात्रा निकाली जाती थी। जहां-जहां से शोभायात्रा निकलती वहां पर लोग आरती उतारते थे। रंग-अबीर उड़ाने का कल्चर नहीं था।
महिलाएं डांडिया करती थीं और कुराड़ी (एक प्रकार का खेल) खेलते हुए जातीं थीं। अब समय बदल गया है। लाइट-साउंड के साथ सबकुछ हाईटेक हो गया है। पंडाल से लेकर मूर्तियां और सजावट आदि सब हाईटेक हो गया है।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- अब हर गली-मोहल्ले में पंडाल...
महिलाएं डांडिया करती थीं और कुराड़ी (एक प्रकार का खेल) खेलते हुए जातीं थीं। अब समय बदल गया है। लाइट-साउंड के साथ सबकुछ हाईटेक हो गया है। पंडाल से लेकर मूर्तियां और सजावट आदि सब हाईटेक हो गया है।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- अब हर गली-मोहल्ले में पंडाल...