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कारगिल विजय दिवस: युद्ध में एक पैर गंवाया पर बच्चों की खातिर नहीं छोड़ी नौकरी, जांघ में लगी थी गोली
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कन्नौज
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Fri, 26 Jul 2019 03:09 AM IST
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कारगिल विजय दिवस
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कन्नौज के छिबरामऊ तहसील के गांव ब्राहिमपुर निवासी कैप्टन रवींद्र कुमार ने 22 जुलाई 1999 को पाकिस्तानी दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए बटालिक सेक्टर में अपना एक पैर गंवा दिया था। गोली जांघ में लगी थी। 86 घंटे तक मदद न मिल पाने की वजह से पूरे पैर में इंफेक्शन फैल गया था।
पैर गंवाने के बाद कई बार नौकरी छोड़ने का विचार आया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। दोबारा एक पैर से ही मोर्चा संभाला। रविंद्र इन दिनों कानपुर के कल्यानपुर एरिया में गुबा गार्डेन के पास रहते हैं। वे बताते हैं कि 1999 में बेटा आठ और बेटी मात्र चार साल की थी। इनकी परवरिश और फिर भविष्य की चिंता हो रही थी।
एक पैर गंवाने के बाद अंदर से काफी टूट चुके थे। तब पत्नी कविता, मां विद्या देवी और सेना से रिटायर पिता शिवनाथ ने हिम्मत बंधाई थी। वे एक पैर से ही दोबारा नौकरी में पहुंचे तो उन्हें ट्रेनिंग कैं पों की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपना काम पूरा किया। आज बेटा राहुल नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लखनऊ में असिस्टेंट मैनेजर है।
बेटी शालिनी कानपुर आईआईटी से इंवायरमेंट केमेस्ट्री से पीएचडी कर रही है। बच्चों का भविष्य बनाकर उन्होंने जिंदगी की भी जंग जीती है। 2013 में सेवानिवृत्त होने के बाद सैनिक कल्याण बोर्ड के सदस्य हैं। 26 जनवरी, वर्ष 2000 को राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने वीरता पुरस्कार सेना पदक देकर सम्मानित किया था।
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पैर गंवाने के बाद कई बार नौकरी छोड़ने का विचार आया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। दोबारा एक पैर से ही मोर्चा संभाला। रविंद्र इन दिनों कानपुर के कल्यानपुर एरिया में गुबा गार्डेन के पास रहते हैं। वे बताते हैं कि 1999 में बेटा आठ और बेटी मात्र चार साल की थी। इनकी परवरिश और फिर भविष्य की चिंता हो रही थी।
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एक पैर गंवाने के बाद अंदर से काफी टूट चुके थे। तब पत्नी कविता, मां विद्या देवी और सेना से रिटायर पिता शिवनाथ ने हिम्मत बंधाई थी। वे एक पैर से ही दोबारा नौकरी में पहुंचे तो उन्हें ट्रेनिंग कैं पों की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपना काम पूरा किया। आज बेटा राहुल नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लखनऊ में असिस्टेंट मैनेजर है।
बेटी शालिनी कानपुर आईआईटी से इंवायरमेंट केमेस्ट्री से पीएचडी कर रही है। बच्चों का भविष्य बनाकर उन्होंने जिंदगी की भी जंग जीती है। 2013 में सेवानिवृत्त होने के बाद सैनिक कल्याण बोर्ड के सदस्य हैं। 26 जनवरी, वर्ष 2000 को राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने वीरता पुरस्कार सेना पदक देकर सम्मानित किया था।