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UP: खनन ने बिगाड़ा बांदा का तापमान संतुलन, भूजल रिचार्ज भी प्रभावित, सूखी नदियां और घटते पेड़ों से स्थिति खराब
Sat, 23 May 2026 02:52 PM IST
Sharukh Khan
पुष्पेन्द्र कुमार त्रिपाठी, संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
पुष्पेन्द्र कुमार त्रिपाठी, संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Published by: Sharukh Khan
Updated Sat, 23 May 2026 02:52 PM IST
सार
यूपी के बांदा जिले में रेत के खनन ने बांदा का तापमान संतुलन बिगाड़ दिया है। भूजल रिचार्ज भी प्रभावित हो रहा है। सूखी नदियों और और घटते पेड़ों से स्थिति बिगड़ गई है। रेत के खनन की वजह से जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज भी प्रभावित हो गया है। गर्मियों में केन नदी सूख जाती है। बढ़ते तापमान को लेकर सुर्खियों में आए बांदा में हरियाली के नाम पर कागजी दावा किया जाता है।
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बांदा जिले में रेत का खनन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
बांदा यूं ही भट्ठी नहीं बना हुआ है। वजह एक नहीं कई हैं। हालांकि, बढ़ते तापमान के लिए पठारी क्षेत्र कारण बताकर जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश हमेशा होती रही है। वास्तव में सिकुड़ता वन क्षेत्र और रेत का अवैध खनन इसका सबसे बड़ा कारण है। इस खनन के कारण ही जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज और स्थानीय तापमान संतुलन प्रभावित हुआ है।
दरअसल, बांदा अर्ध शुष्क और पथरीला इलाका है। पत्थर और सूखी मिट्टी दिन में बहुत तेजी से गर्म होते हैं और रात में धीरे-धीरे गर्मी छोड़ते हैं। इसलिए दिन और रात दोनों समय तापमान ज्यादा रहता है। इलाके में पेड़ों की कमी है, नदियां सूख रहीं है और भूजल स्तर गिर गया है। पेड़ और नदियां वाष्पीकरण से तापमान कम करते हैं, लेकिन बांदा में यह प्रभाव कम हो गया है। राजस्थान की तरफ से आने वाली गर्म और शुष्क हवाएं बुंदेलखंड तक पहुंचती हैं। गर्मी में केन नदी के सूख जाने और वन क्षेत्र बहुत कम होने की वजह से वाष्पीकरण न के बराबर होता है। ऐसे में यहां की हवा बहुत सूखी और तीखी होती है।
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दरअसल, बांदा अर्ध शुष्क और पथरीला इलाका है। पत्थर और सूखी मिट्टी दिन में बहुत तेजी से गर्म होते हैं और रात में धीरे-धीरे गर्मी छोड़ते हैं। इसलिए दिन और रात दोनों समय तापमान ज्यादा रहता है। इलाके में पेड़ों की कमी है, नदियां सूख रहीं है और भूजल स्तर गिर गया है। पेड़ और नदियां वाष्पीकरण से तापमान कम करते हैं, लेकिन बांदा में यह प्रभाव कम हो गया है। राजस्थान की तरफ से आने वाली गर्म और शुष्क हवाएं बुंदेलखंड तक पहुंचती हैं। गर्मी में केन नदी के सूख जाने और वन क्षेत्र बहुत कम होने की वजह से वाष्पीकरण न के बराबर होता है। ऐसे में यहां की हवा बहुत सूखी और तीखी होती है।
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पर्यावरणविद गुंजन मिश्र कहते हैं कि यह समझना आवश्यक है कि इस बढ़ती गर्मी के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं। वे इसका पहला कारण बड़े पैमाने पर किए जा रहे बालू और पत्थर के अवैध खनन को बताते हैं। वे कहते हैं कि वैसे तो महोबा में अधिक खनन होता है लेकिन वहां मुख्यतः पत्थर का खनन होता है।
बांदा में बड़े पैमाने पर रेत का खनन
बांदा में रेत का खनन बड़े पैमाने पर किया जाता है। इस वजह केन नदी के पानी का वाषपीकरण तेजी से होता है और गर्मी के चरम पर पहुंचने से पहले ही वह सूख जाती है। इससे भूजल रिचार्ज और स्थानीय तापमान संतुलन भी बिगड़ता है।
बांदा में रेत का खनन बड़े पैमाने पर किया जाता है। इस वजह केन नदी के पानी का वाषपीकरण तेजी से होता है और गर्मी के चरम पर पहुंचने से पहले ही वह सूख जाती है। इससे भूजल रिचार्ज और स्थानीय तापमान संतुलन भी बिगड़ता है।
बीएचयू के भू-भौतिकी विभाग के प्रो. ज्ञान प्रकाश सिंह कहते हैं कि इलाके में पेड़ों की कमी है, नदियां सूख रहीं है और भूजल स्तर गिर गया है। पेड़ और पानी वाष्पीकरण से तापमान कम करते हैं लेकिन बांदा में यह प्रभाव कम हो गया है। नमी कम होने से बादल कम बनते हैं और सूर्य की गर्मी सीधे जमीन तक पहुंचती है।
इससे सतही तापन बहुत ज्यादा हो जाता है। केन नदी क्षेत्र में रेत के खनन से वनस्पति और मिट्टी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हुई है। इससे जमीन ज्यादा गर्मी सोखने लगी है। बुंदेलखंड पहले से ही गर्म और सूखा क्षेत्र था, अब जलवायु परिवर्तन इस प्रभाव को और बढ़ा रहा है।
चार साल में लगे एक करोड़ से ज्यादा पौधे, वन क्षेत्र महज 2.31 प्रतिशत
महर्षि वामदेव की तपोभूमि बांदा इन दिनों बेतहाशा बढ़ते तापमान को लेकर देश भर में सुर्खियों में है। यमुना, केन और बाघिन नदी से घिरे पठारी-मैदानी भूभाग वाले इस जिले के जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर रोजाना अंधाधुंध प्रहार हो रहा है।
महर्षि वामदेव की तपोभूमि बांदा इन दिनों बेतहाशा बढ़ते तापमान को लेकर देश भर में सुर्खियों में है। यमुना, केन और बाघिन नदी से घिरे पठारी-मैदानी भूभाग वाले इस जिले के जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर रोजाना अंधाधुंध प्रहार हो रहा है।
वन विभाग का दावा है कि बीते चार साल में एक करोड़ छह लाख 32 हजार 371 पौधे लगाए गए। हालांकि हकीकत यह है कि बांदा का वन क्षेत्र 5193.547 हेक्टेयर है, जो जिले के कुल भूभाग का महज 2.31 प्रतिशत है।
वन विभाग के अनुसार वर्ष 2025-26 में जिले में 25 लाख 60 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य था। इससे काफी ज्यादा 42 लाख 77 हजार 100 पौधे लगाए गए। वर्ष 2024-25 में 25 लाख 51 हजार 500 पौधे लगाने का लक्ष्य था और 25 लाख 54 हजार 625 पौधे लगाए गए। वर्ष 2023-24 में 24 लाख 100 पौधे लगाने का लक्ष्य था और 24 लाख 346 पौधे लगाए गए। वर्ष 2022-23 में 13 लाख 39 हजार 140 पौधे लगाने का लक्ष्य था और 14 लाख 300 पौधे लगाए गए।
चार साल में लगाए गए एक करोड़ से ज्यादा पौधे आखिर कहां गए और उनकी हरियाली का असर जिले में क्यों नहीं दिख रहा? इस बारे में पूछने पर वन विभाग के अधिकारी ठोस जवाब नहीं देते हैं। उनका कहना है कि वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है।
वहीं, डीएफओ अरविंद कुमार ने कहा कि वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए बबूल के पेड़ काटने पर रोक लगाने की मांग शासन से की गई है। हमें पौधे लगाने का बजट मिलता है, लेकिन उनके संरक्षण के लिए पैसा नहीं मिलता है। इसी वजह से लगाए गए पौधों की कायदे से देखभाल नहीं हो पाती है।
30 साल पहले भी ज्यादा रहता था तापमान
आईआईटी कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी के डीन प्रो. सच्चिदानंद त्रिपाठी ने कहा कि बांदा 30 साल पहले भी मानसून के पहले बहुत गर्म रहता रहा है। उत्तर प्रदेश बांदा और उससे सटे मध्य प्रदेश के सात जिले ऐसे हैं जो सूखाग्रस्त और पठारी इलाके हैं। इन इलाकों का तापमान में अन्य स्थानों से दो से चार डिग्री सेल्सियस अधिक ही रहता है।
आईआईटी कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी के डीन प्रो. सच्चिदानंद त्रिपाठी ने कहा कि बांदा 30 साल पहले भी मानसून के पहले बहुत गर्म रहता रहा है। उत्तर प्रदेश बांदा और उससे सटे मध्य प्रदेश के सात जिले ऐसे हैं जो सूखाग्रस्त और पठारी इलाके हैं। इन इलाकों का तापमान में अन्य स्थानों से दो से चार डिग्री सेल्सियस अधिक ही रहता है।
भौगोलिक स्थिति, ऊंचाई और पथरीली भूमि तीनों मिलाकर बांदा को गर्म करते हैं। जहां तक रेत के खनन और पहाड़ों को तोड़े जाने की बात है तो उनका असर पारिस्थितिकी तंत्र पर जरूर पड़ता है, लेकिन उससे तापमान भी प्रभावित होता है, यह कह पाना मुश्किल है।
एसी-कूलर में रहने वालों की सहनशक्ति कम हो गई है
बरेहटा गांव के 85 वर्षीय परसन निषाद ने कहा कि अब एसी-कूलर में रहने वालों की सहनशक्ति कम हो गई है। हमने अपने बचपन और जवानी के दिनों में अब से ज्यादा गर्मी देखी है। ऐसी भीषण गर्मी पड़ती थी कि लोगों की मौत हो जाती थी। बरेहटा गांव के ही कमल सिंह ने कहा कि पेड़-पौधों से दूर भागेंगे और खाद से पैदा हुआ सब कुछ खाएंगे तो भला क्या होगा? हम तो गांव में रहते हैं और जैसे पहले गर्मी पड़ती थी वैसे ही अब भी पड़ रही है।
बरेहटा गांव के 85 वर्षीय परसन निषाद ने कहा कि अब एसी-कूलर में रहने वालों की सहनशक्ति कम हो गई है। हमने अपने बचपन और जवानी के दिनों में अब से ज्यादा गर्मी देखी है। ऐसी भीषण गर्मी पड़ती थी कि लोगों की मौत हो जाती थी। बरेहटा गांव के ही कमल सिंह ने कहा कि पेड़-पौधों से दूर भागेंगे और खाद से पैदा हुआ सब कुछ खाएंगे तो भला क्या होगा? हम तो गांव में रहते हैं और जैसे पहले गर्मी पड़ती थी वैसे ही अब भी पड़ रही है।
भगवती नगर के 90 वर्षीय माशूक हुसैन ने कहा कि पहले पेड़-पौधे थे तो दोपहर उनकी छांव में गुजर जाती थी और समय बीत जाता था। अब दोपहर सीमेंट-गिट्टी और बालू के मकान में गुजरती है तो गर्मी तो लगनी ही है। सिकंदरपुर के 80 वर्षीय रामजियावन ने कहा कि पहले मिट्टी वाले खपरैल के मकान में गर्मी और लू का पता नहीं चलता था। अब शहर में बड़ी मुश्किल से पेड़ दिखते हैं तो भीषण गर्मी लाजिमी है।