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'बाबा’ कोड बना ढाल : खाकी के साए में पार होती रही गांजे की खेप
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Fri, 27 Mar 2026 01:55 AM IST
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पडरौना। गांजा तस्करी मामले में चार सिपाहियों के नाम उजागर होने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मचा है। जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं जो न सिर्फ आपराधिक नेटवर्क, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जांच में खुलासा हुआ है कि ‘बाबा’ नाम का कोडवर्ड गांजा तस्करी नेटवर्क का सुरक्षा कवच बना हुआ था। एसपी की सख्ती के बाद आरोपी सिपाहियों को निलंबित कर जेल भिजवाने के साथ ही बर्खास्तगी के लिए डीजीपी को पत्र भेज दिया गया है।
सूत्रों के मुताबिक, ‘बाबा’ शब्द का इस्तेमाल तस्करों के बीच संकेत के रूप में किया जाता था। जैसे ही यह कोड सामने आता, संबंधित खेप को प्रभावशाली संरक्षण प्राप्त मान लिया जाता और जांच-चेकिंग स्वतः ही कमजोर पड़ जाती। यही वजह रही कि असम और ओडिशा से आने वाली गांजे की खेप बिना किसी बड़े अवरोध के अपने गंतव्य तक पहुंचती रही।
दरअसल, ‘बाबा’ कोई काल्पनिक नाम नहीं बल्कि पुलिस विभाग में तैनात सिपाही सूरज गिरी का उपनाम था। तस्करों ने उसके प्रभाव और विभागीय पकड़ का फायदा उठाते हुए इस कोड को ढाल बना लिया। इस नाम के सहारे न केवल पुलिस की नजरों से बचने की रणनीति बनाई गई, बल्कि निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के बीच मनोवैज्ञानिक दबाव भी तैयार किया गया। सूत्र बताते हैं कि खेप के साथ जुड़े लोगों को पहले ही यह संदेश दे दिया जाता था कि “बाबा का माल है।” यह वाक्य कई बार संभावित कार्रवाई को टालने के लिए कारगर साबित हुआ। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ है कि तस्करों ने न केवल अपने नेटवर्क को संगठित किया, बल्कि विभागीय कमजोरियों को भांपकर उसका साजिश के तहत इस्तेमाल किया।
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कार्रवाई के बाद भी सिस्टम में सक्रिय बने रहे सिपाही
मामले का एक पहलू यह भी सामने आया है कि जिन सिपाहियों पर पहले ही विभागीय कार्रवाई हो चुकी थी, वे प्रभावी रूप से सिस्टम में सक्रिय बने रहे। सिपाही सूरज गिरी और विनोद गुप्ता को कुछ माह पूर्व एडीजी स्तर से लाइन हाजिर कर जिला छोड़ने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन दोनों पुलिस लाइन में ही जमे रहे। यह स्थिति विभागीय निगरानी तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर करती है। लो सवाल उठा रहे हैं कि यह महज प्रशासनिक ढिलाई नहीं हो सकती है। इसके पीछे किसी बड़े स्तर पर मिलीभगत हो सकती है। सूत्रों का कहना है कि अब एसपी स्तर पर निगरानी तेज कर दी गई है।
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पूर्वांचल तक फैला नेटवर्क, जांच के दायरे में कई कड़ियां
गांजा तस्करी का यह मामला एक बड़े और संगठित नेटवर्क की ओर इशारा कर रहा है। पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि असम और ओडिशा से आने वाली खेप संगठित तंत्र के जरिए पूर्वांचल के कई जिलों के साथ-साथ बिहार तक पहुंचाई जा रही थी। इस नेटवर्क में परिवहन, भंडारण और वितरण की कई परतें शामिल हैं, जिनमें स्थानीय स्तर के कुछ लोगों की भूमिका भी सामने आ रही है। जांच एजेंसियों के सामने नेटवर्क की सभी कड़ियों को जोड़कर इस धंधे में शामिल लोगों की पहचान करना बड़ी चुनौती है।
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भागे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश
सूत्रों के अनुसार, गांजा तस्करी मामले में चार आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद फरार दो सिपाहियों व छह तस्करों की गिरफ्तारी के लिए संभावित ठिकानों पर दबिश दे जा रही है। गठित टीमें आरोपियों से जुड़े नेटवर्क की छानबीन से उन तक पहुंचने की कोशिश में लगी हैं। लेकिन अभी कोई सफलता नहीं मिल पाई है।
कोट:-
फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस दबिश दे रही है। तस्करी में शामिल आरोपी सिपाहियों की भूमिका की जांच कराई जा रही है। इस नेटवर्क में शामिल बाकी लोगों को ट्रेस किया जा रहा है। आरोपी सिपाहियों को निलंबित कर बर्खास्तगी के लिए डीजीपी को पत्र भेजा गया है। -केशव कुमार, एसपी कुशीनगर
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सूत्रों के मुताबिक, ‘बाबा’ शब्द का इस्तेमाल तस्करों के बीच संकेत के रूप में किया जाता था। जैसे ही यह कोड सामने आता, संबंधित खेप को प्रभावशाली संरक्षण प्राप्त मान लिया जाता और जांच-चेकिंग स्वतः ही कमजोर पड़ जाती। यही वजह रही कि असम और ओडिशा से आने वाली गांजे की खेप बिना किसी बड़े अवरोध के अपने गंतव्य तक पहुंचती रही।
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दरअसल, ‘बाबा’ कोई काल्पनिक नाम नहीं बल्कि पुलिस विभाग में तैनात सिपाही सूरज गिरी का उपनाम था। तस्करों ने उसके प्रभाव और विभागीय पकड़ का फायदा उठाते हुए इस कोड को ढाल बना लिया। इस नाम के सहारे न केवल पुलिस की नजरों से बचने की रणनीति बनाई गई, बल्कि निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के बीच मनोवैज्ञानिक दबाव भी तैयार किया गया। सूत्र बताते हैं कि खेप के साथ जुड़े लोगों को पहले ही यह संदेश दे दिया जाता था कि “बाबा का माल है।” यह वाक्य कई बार संभावित कार्रवाई को टालने के लिए कारगर साबित हुआ। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ है कि तस्करों ने न केवल अपने नेटवर्क को संगठित किया, बल्कि विभागीय कमजोरियों को भांपकर उसका साजिश के तहत इस्तेमाल किया।
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कार्रवाई के बाद भी सिस्टम में सक्रिय बने रहे सिपाही
मामले का एक पहलू यह भी सामने आया है कि जिन सिपाहियों पर पहले ही विभागीय कार्रवाई हो चुकी थी, वे प्रभावी रूप से सिस्टम में सक्रिय बने रहे। सिपाही सूरज गिरी और विनोद गुप्ता को कुछ माह पूर्व एडीजी स्तर से लाइन हाजिर कर जिला छोड़ने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन दोनों पुलिस लाइन में ही जमे रहे। यह स्थिति विभागीय निगरानी तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर करती है। लो सवाल उठा रहे हैं कि यह महज प्रशासनिक ढिलाई नहीं हो सकती है। इसके पीछे किसी बड़े स्तर पर मिलीभगत हो सकती है। सूत्रों का कहना है कि अब एसपी स्तर पर निगरानी तेज कर दी गई है।
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पूर्वांचल तक फैला नेटवर्क, जांच के दायरे में कई कड़ियां
गांजा तस्करी का यह मामला एक बड़े और संगठित नेटवर्क की ओर इशारा कर रहा है। पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि असम और ओडिशा से आने वाली खेप संगठित तंत्र के जरिए पूर्वांचल के कई जिलों के साथ-साथ बिहार तक पहुंचाई जा रही थी। इस नेटवर्क में परिवहन, भंडारण और वितरण की कई परतें शामिल हैं, जिनमें स्थानीय स्तर के कुछ लोगों की भूमिका भी सामने आ रही है। जांच एजेंसियों के सामने नेटवर्क की सभी कड़ियों को जोड़कर इस धंधे में शामिल लोगों की पहचान करना बड़ी चुनौती है।
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भागे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश
सूत्रों के अनुसार, गांजा तस्करी मामले में चार आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद फरार दो सिपाहियों व छह तस्करों की गिरफ्तारी के लिए संभावित ठिकानों पर दबिश दे जा रही है। गठित टीमें आरोपियों से जुड़े नेटवर्क की छानबीन से उन तक पहुंचने की कोशिश में लगी हैं। लेकिन अभी कोई सफलता नहीं मिल पाई है।
कोट:-
फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस दबिश दे रही है। तस्करी में शामिल आरोपी सिपाहियों की भूमिका की जांच कराई जा रही है। इस नेटवर्क में शामिल बाकी लोगों को ट्रेस किया जा रहा है। आरोपी सिपाहियों को निलंबित कर बर्खास्तगी के लिए डीजीपी को पत्र भेजा गया है। -केशव कुमार, एसपी कुशीनगर