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Kushinagar News: समाज के नायकों को जीवंत रखने का माध्यम हैं लोक परंपराएं
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Mon, 13 Apr 2026 12:49 AM IST
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गोष्टी में बोलते वक्ता। सोशल मीडिया
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फाजिलनगर। लोकरंग महोत्सव में रविवार को “लोकसंस्कृति के नायक बनाम वंचितों की संघर्ष गाथा” विषय पर गोष्ठी हुई। देशभर से आए विद्वानों, साहित्यकारों और शोधार्थियों ने लोकनायकों, वंचित समाज और उनके इतिहास की उपेक्षा पर गहन विमर्श किया।
आयोजन समिति के अध्यक्ष सुभाष चंद्र कुशवाहा ने कहा कि लोक परंपराएं समाज के नायकों को जीवंत रखने का माध्यम हैं। इसी सूत्र वाक्य पर विद्वानों ने गोष्ठी को आगे बढ़ाया। डॉ. रामायण राम ने कहा कि न्याय के अभाव में समाज का एक वर्ग बगावत की राह पकड़ने को विवश हो जाता है। लोक साहित्य इन संघर्षों की सजीव अभिव्यक्ति है, जिसमें वंचितों की पीड़ा, प्रतिरोध और अस्मिता की सच्ची गाथाएं दर्ज हैं।
डॉ. रामनरेश राम ने कहा कि लोक संस्कृति हमेशा जनतांत्रिक नहीं रही है, इसलिए “जनसंस्कृति” की अवधारणा का उभार आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज वंचित समुदायों के भीतर से नए शोधार्थी उभरकर अपने नायकों को नए सिरे से गढ़ रहे हैं। भारत की बहुलतावादी संरचना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां एक नहीं, बल्कि अनेक संस्कृतियां हैं। वंचित वर्गों के भीतर भी बहुस्तरीय सांस्कृतिक परतें मौजूद हैं।
दया शंकर राय ने जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त की कविता के संदर्भ से अपनी बात शुरू की। उन्होंने सवाल उठाया कि भीमराव आंबेडकर को राष्ट्रीय नायक के रूप में व्यापक स्वीकृति क्यों नहीं मिल पाई। उन्होंने कहा कि केवल मूर्तियां स्थापित कर देने से नायकत्व की रक्षा नहीं होती, बल्कि उनके विचारों को समाज में जीवित रखना जरूरी है। योगेंद्र चौबे ने कहा कि यदि समाज अपने संघर्षों का इतिहास दर्ज नहीं करेगा, तो वह बंजर हो जाएगा। उन्होंने यह आरोप लगाया कि अभिजात्य वर्ग ने वंचितों के इतिहास को व्यवस्थित रूप से नष्ट किया है।
मुख्य अतिथि प्रोफेसर सुभाष चंद्र सैनी ने कहा कि लोकनायकों की प्रामाणिकता केवल दस्तावेजों से ही सिद्ध हो सकती है। उन्होंने कहा कि दस्तावेज भी अभिजात्य वर्ग के नियंत्रण में बने उपकरण हैं। वंचित समाज द्वारा अपने नायकों का अतिरंजित वर्णन एक प्रकार का सांकेतिक रूपक होता है, जो उनके सामाजिक सत्य को व्यक्त करता है। उन्होंने लोककथाओं के प्रसिद्ध पात्रों हीर-रांझा और दुल्ला भाटी का उल्लेख करते हुए बताया कि लोक समाज अपने नायकों को प्रेम, प्रतिरोध और न्याय के प्रतीकों के रूप में गढ़ता है, भले ही उन्हें औपचारिक इतिहास में स्थान न मिले। लोकनायक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं, जबकि अभिजात्य वर्ग सत्ता, धन और धर्मान्धता के लिए। लोकगीतों को उन्होंने लोक की ऊर्जा और चेतना का महत्वपूर्ण स्रोत बताया। गोष्ठी में प्रोफेसर दिनेश कुशवाह, डॉ. पूनम सिंह व वीर बहादुर महतो ने भी अपने विचार रखे। गोष्ठी की अध्यक्षता प्रोफेसर अनिल सिंह और संचालन वरिष्ठ साहित्यकार रामजी यादव ने किया।
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आयोजन समिति के अध्यक्ष सुभाष चंद्र कुशवाहा ने कहा कि लोक परंपराएं समाज के नायकों को जीवंत रखने का माध्यम हैं। इसी सूत्र वाक्य पर विद्वानों ने गोष्ठी को आगे बढ़ाया। डॉ. रामायण राम ने कहा कि न्याय के अभाव में समाज का एक वर्ग बगावत की राह पकड़ने को विवश हो जाता है। लोक साहित्य इन संघर्षों की सजीव अभिव्यक्ति है, जिसमें वंचितों की पीड़ा, प्रतिरोध और अस्मिता की सच्ची गाथाएं दर्ज हैं।
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डॉ. रामनरेश राम ने कहा कि लोक संस्कृति हमेशा जनतांत्रिक नहीं रही है, इसलिए “जनसंस्कृति” की अवधारणा का उभार आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज वंचित समुदायों के भीतर से नए शोधार्थी उभरकर अपने नायकों को नए सिरे से गढ़ रहे हैं। भारत की बहुलतावादी संरचना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां एक नहीं, बल्कि अनेक संस्कृतियां हैं। वंचित वर्गों के भीतर भी बहुस्तरीय सांस्कृतिक परतें मौजूद हैं।
दया शंकर राय ने जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त की कविता के संदर्भ से अपनी बात शुरू की। उन्होंने सवाल उठाया कि भीमराव आंबेडकर को राष्ट्रीय नायक के रूप में व्यापक स्वीकृति क्यों नहीं मिल पाई। उन्होंने कहा कि केवल मूर्तियां स्थापित कर देने से नायकत्व की रक्षा नहीं होती, बल्कि उनके विचारों को समाज में जीवित रखना जरूरी है। योगेंद्र चौबे ने कहा कि यदि समाज अपने संघर्षों का इतिहास दर्ज नहीं करेगा, तो वह बंजर हो जाएगा। उन्होंने यह आरोप लगाया कि अभिजात्य वर्ग ने वंचितों के इतिहास को व्यवस्थित रूप से नष्ट किया है।
मुख्य अतिथि प्रोफेसर सुभाष चंद्र सैनी ने कहा कि लोकनायकों की प्रामाणिकता केवल दस्तावेजों से ही सिद्ध हो सकती है। उन्होंने कहा कि दस्तावेज भी अभिजात्य वर्ग के नियंत्रण में बने उपकरण हैं। वंचित समाज द्वारा अपने नायकों का अतिरंजित वर्णन एक प्रकार का सांकेतिक रूपक होता है, जो उनके सामाजिक सत्य को व्यक्त करता है। उन्होंने लोककथाओं के प्रसिद्ध पात्रों हीर-रांझा और दुल्ला भाटी का उल्लेख करते हुए बताया कि लोक समाज अपने नायकों को प्रेम, प्रतिरोध और न्याय के प्रतीकों के रूप में गढ़ता है, भले ही उन्हें औपचारिक इतिहास में स्थान न मिले। लोकनायक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं, जबकि अभिजात्य वर्ग सत्ता, धन और धर्मान्धता के लिए। लोकगीतों को उन्होंने लोक की ऊर्जा और चेतना का महत्वपूर्ण स्रोत बताया। गोष्ठी में प्रोफेसर दिनेश कुशवाह, डॉ. पूनम सिंह व वीर बहादुर महतो ने भी अपने विचार रखे। गोष्ठी की अध्यक्षता प्रोफेसर अनिल सिंह और संचालन वरिष्ठ साहित्यकार रामजी यादव ने किया।

गोष्टी में बोलते वक्ता। सोशल मीडिया