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सुख-दुख हमारे कर्म से प्राप्त होते हैं : ब्रह्मानंद शास्त्री
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Mon, 23 Feb 2026 02:55 AM IST
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नौगढ़ ब्लॉक क्षेत्र के साहा में श्रीराम कथा सुनाते आचार्य ब्रह्मानंद शास्त्री। स्रोत विज्ञप्ति
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धेंसा। नौगढ़ ब्लॉक क्षेत्र के पंचायत साहा में आयोजित श्रीविष्णु महायज्ञ के तीसरे दिन शनिवार की शाम श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ कार्यक्रम में अयोध्या धाम के कथा वाचक आचार्य ब्रह्मानंद शास्त्री ने कथा सुनाई। नारद मोह और श्रीराम के पूर्व जन्म की मार्मिक संगीतमय कथा सुनाते हुए कहा कि मनुष्य में प्रशंसा की भूख आ जाए तो नारद जैसी गति होती है।
व्यक्ति को मान, सम्मान के पीछे नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि समय का सम्मान होता है, व्यक्ति का नहीं समय अनुकूल होने पर व्यक्ति दुर्गुण में भी स्वीकार होने लगता है। इसी कारण अच्छा समय होने पर ईश्वर को कदापि न भूलें। अनेक जन्मों के भगवत कृपा से ही हमको अच्छा जीवन मिलता है। दुख भी हमारे प्रारब्ध कर्म से प्राप्त होता है। वृंदा के सतीत्व के कारण जालंधर के आतंक से जब तीनों लोक त्रस्त हो गया, तब श्रीहरि विष्णु ने छल से उसके सतीत्व को नष्ट किया। वहीं, जालंधर ने रावण के रूप में जन्म लिया। कलयुग में कर्म की प्रधानता है, हमारे कर्म संचित हो रहें हैं।
कामदेव के कहने पर नारद मुनि को जब अहंकार हो गया। उन्होंने भगवान शिव से कहा कि हमने काम को भी जीत लिया है। जब कोई व्यक्ति अपना परिचय अपने काम से दे तो समझिए उसके मन में अहंकार आ गया है। भगवान भोलेनाथ ने नारद मुनि से कहा कि यह कथा श्रीहरि विष्णु को न सुनाना। हमारे मन में हमेशा यह भाव होना चाहिए कि जो कुछ है वह ईश्वर की कृपा से है। नारद के शाप के कारण भगवान श्रीराम को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। ये सारी जिज्ञासा माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रगट की। कथा के प्रभाव से प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित होना चाहिए। उक्त अवसर पर नारद मोह, विश्व मोहिनी स्वयंवर, श्रीहरि विष्णु द्वारा विश्व मोहिनी से विवाह, मुनि नारद का बंदर स्वरुप, रावण के उत्पति के अनेक कारण और महाराज दशरथ को पुत्र न होने की ग्लानि, श्रीराम जन्मोत्सव आदि प्रंसग का संगीतमय मार्मिक कथा का वर्णन किया तो उपस्थित श्रोता भाव विभोर हो गए। सात दिवसीय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ कार्यक्रम में मुख्य यजमान श्रीकांत शुक्ल, ऋषिदेव ओझा, राजेंद्र शुक्ल, रामकुमार पांडेय, अनंत शुक्ल सहित सैकड़ों श्रद्धालु आदि मौजूद रहे।
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व्यक्ति को मान, सम्मान के पीछे नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि समय का सम्मान होता है, व्यक्ति का नहीं समय अनुकूल होने पर व्यक्ति दुर्गुण में भी स्वीकार होने लगता है। इसी कारण अच्छा समय होने पर ईश्वर को कदापि न भूलें। अनेक जन्मों के भगवत कृपा से ही हमको अच्छा जीवन मिलता है। दुख भी हमारे प्रारब्ध कर्म से प्राप्त होता है। वृंदा के सतीत्व के कारण जालंधर के आतंक से जब तीनों लोक त्रस्त हो गया, तब श्रीहरि विष्णु ने छल से उसके सतीत्व को नष्ट किया। वहीं, जालंधर ने रावण के रूप में जन्म लिया। कलयुग में कर्म की प्रधानता है, हमारे कर्म संचित हो रहें हैं।
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कामदेव के कहने पर नारद मुनि को जब अहंकार हो गया। उन्होंने भगवान शिव से कहा कि हमने काम को भी जीत लिया है। जब कोई व्यक्ति अपना परिचय अपने काम से दे तो समझिए उसके मन में अहंकार आ गया है। भगवान भोलेनाथ ने नारद मुनि से कहा कि यह कथा श्रीहरि विष्णु को न सुनाना। हमारे मन में हमेशा यह भाव होना चाहिए कि जो कुछ है वह ईश्वर की कृपा से है। नारद के शाप के कारण भगवान श्रीराम को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। ये सारी जिज्ञासा माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रगट की। कथा के प्रभाव से प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित होना चाहिए। उक्त अवसर पर नारद मोह, विश्व मोहिनी स्वयंवर, श्रीहरि विष्णु द्वारा विश्व मोहिनी से विवाह, मुनि नारद का बंदर स्वरुप, रावण के उत्पति के अनेक कारण और महाराज दशरथ को पुत्र न होने की ग्लानि, श्रीराम जन्मोत्सव आदि प्रंसग का संगीतमय मार्मिक कथा का वर्णन किया तो उपस्थित श्रोता भाव विभोर हो गए। सात दिवसीय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ कार्यक्रम में मुख्य यजमान श्रीकांत शुक्ल, ऋषिदेव ओझा, राजेंद्र शुक्ल, रामकुमार पांडेय, अनंत शुक्ल सहित सैकड़ों श्रद्धालु आदि मौजूद रहे।
