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Kushinagar News: दुर्गा सप्तशती में कुलकुला देवी का जिक्र, अज्ञातवास में पांडवों ने बिताया था समय
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Mon, 23 Mar 2026 01:05 AM IST
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कुलकुला देवी मंदिर में दर्शन करते श्रद्धालु । संवाद
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पडरौना। कसया तहसील से करीब 12 किलोमीटर दूर कुड़वा दिलीप नगर गांव मेंं मां कुलकुला देवी का अति प्राचीन मंदिर है। किंवदंती है कि अपने भक्त रहसू गुरु के आह्वान पर जब मां काली खन्हवार आईं, तो इसी स्थान पर कुछ समय विश्राम कर वैष्णो देवी के लिए प्रस्थान की थीं। चारों तरफ फैले बेंत के इस जंगल में पांडवों ने भी अज्ञातवास के दौरान यहां कुछ समय बिताया था। यहां बनी दो पिंडी के इतिहास का वर्णन दुर्गा सप्तशती में भी है। इस मंदिर का जिक्र मार्कंडेय पुराण में भी है, जिसके अनुसार सतयुग में राजा सुरत और समाधि वैश्य ने मेघा ऋषि से देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) सुनकर इस जंगल में तपस्या की थी।
कुकुत्था, सोनरा व हिरण्यवती नदी से घिरे जंगल में बने मंदिर में माता की दो पिंडी है। दक्षिण स्थित पिंडी मां कुलकुला देवी का और उत्तर की पिंडी दुर्गा सप्तशती के रचयिता मेधा ऋषि की समाधि है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मन्नत मांगने वाले भक्त की इच्छा पूरी हो जाती है। यहां चैत्र व शारदीय नवरात्र में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है।
विजयपुर दक्षिण पट्टी निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित राजकिशोर मिश्र ने बताया कि मार्कंडेय पुराण के अनुसार यहां सतयुग में राजा सुरत और समाधि वैश्य ने मेघा ऋषि से देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) सुनकर तप किया था। मां के आशीर्वाद से राजा सुरत सूर्य के वंश में सावर्णि नामक मनु हुए। उन्होंने बताया कि महाकवि कालीदास रचित महाकाव्य रघुवंश में जिक्र है कि भगवान श्रीराम भी राजा सुरत सूर्य के वंशज है। कुश जब कुशावती के राजा हुए, तब कुलदेवी के रूप में मां कुलकुला की आराधना की। अयोध्या लौटते समय अपने पुरोहितों के वंशजों को यहां का राज-पाट दे दिया। कुश के पुरोहितों का वंश ही आगे चलकर कुडवां इस्टेट के रूप में विख्यात हुआ।
नदवाविशुनपुर के गीता प्रेस के तत्कालीन संपादक स्वर्गीय पंडित रामनारायण दत्त शास्त्री ''राम'' ने भी दुर्गा सप्तशती में इस स्थान का वर्णन किया है।
बिना छत वाली मां के नाम से भी प्रसिद्ध इस देवी स्थान की महिमा का वर्णन पौराणिक धर्मग्रंथों में भी मिलता है। नदवा विशुनपुर के व्याकरणाचार्य पंडित सुधाकर पांडेय ने बताया कि पुराणों में वर्णित है कि पांडवों ने भी वनवास के दौरान यहां समय बिताया था। अज्ञातवास के दौरान कुंती पुत्र अर्जुन ने मां कुलकुला देवी की आराधना की थी। मां ने प्रसन्न होकर उन्हें विजयी भव: का आशीर्वाद दिया था। संवाद
तंत्र साधकों के लिए इस स्थान का खास महत्व
यह स्थान तंत्र साधकों के लिए खास महत्व रखता है। दूर-दराज से अवघड़, साधु-संत मंत्र सिद्धि के लिए यहां आते हैं। कुडवां नरेश दिलीप नारायण सिंह और उनके पूर्वजों ने कई बार यहां छत बनवाने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो पाए। अंत में माता ने उनको स्वप्न दिया कि ''मैं खुले में रहना चाहती हूँ''। इसके बाद छत बनवाने का काम रोक दिया गया। यह स्थान चारों तरफ से नदियों से घिरा है। पौराणिक मान्यता भी है कि यहां बिना पैर धोये माता का दर्शन नहीं होता। यहीं पर घांघी-हिरण्यावती-खनुआ नदी का संगम भी है। संवाद
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इस रास्ते जाएं मंदिर
कसया तहसील से लगभग 12 किमी दूर कुड़वा दिलीप नगर के घने जंगल में स्थित मां कुलकुला (कुलकुल) देवी मंदिर पहुंचने के लिए कसया से एनएच होते कुड़वा या दिलीप नगर जाया जा सकता है। वहीं, फाजिलनगर की तरफ से आने वाली मधुरिया पुलिस चौकी से रहसू बाजार होते हुए मंदिर तक आसानी से पहुंच सकते हैं। यहां तक पहुंचने के लिए टैक्सी या निजी वाहन का इस्तेमाल करें। मंदिर तक जाने के लिए कोई नियमित वाहन नहीं चलता है।
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विजयपुर दक्षिण पट्टी निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित राजकिशोर मिश्र ने बताया कि मार्कंडेय पुराण के अनुसार यहां सतयुग में राजा सुरत और समाधि वैश्य ने मेघा ऋषि से देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) सुनकर तप किया था। मां के आशीर्वाद से राजा सुरत सूर्य के वंश में सावर्णि नामक मनु हुए। उन्होंने बताया कि महाकवि कालीदास रचित महाकाव्य रघुवंश में जिक्र है कि भगवान श्रीराम भी राजा सुरत सूर्य के वंशज है। कुश जब कुशावती के राजा हुए, तब कुलदेवी के रूप में मां कुलकुला की आराधना की। अयोध्या लौटते समय अपने पुरोहितों के वंशजों को यहां का राज-पाट दे दिया। कुश के पुरोहितों का वंश ही आगे चलकर कुडवां इस्टेट के रूप में विख्यात हुआ।
नदवाविशुनपुर के गीता प्रेस के तत्कालीन संपादक स्वर्गीय पंडित रामनारायण दत्त शास्त्री ''राम'' ने भी दुर्गा सप्तशती में इस स्थान का वर्णन किया है।
बिना छत वाली मां के नाम से भी प्रसिद्ध इस देवी स्थान की महिमा का वर्णन पौराणिक धर्मग्रंथों में भी मिलता है। नदवा विशुनपुर के व्याकरणाचार्य पंडित सुधाकर पांडेय ने बताया कि पुराणों में वर्णित है कि पांडवों ने भी वनवास के दौरान यहां समय बिताया था। अज्ञातवास के दौरान कुंती पुत्र अर्जुन ने मां कुलकुला देवी की आराधना की थी। मां ने प्रसन्न होकर उन्हें विजयी भव: का आशीर्वाद दिया था। संवाद
तंत्र साधकों के लिए इस स्थान का खास महत्व
यह स्थान तंत्र साधकों के लिए खास महत्व रखता है। दूर-दराज से अवघड़, साधु-संत मंत्र सिद्धि के लिए यहां आते हैं। कुडवां नरेश दिलीप नारायण सिंह और उनके पूर्वजों ने कई बार यहां छत बनवाने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो पाए। अंत में माता ने उनको स्वप्न दिया कि ''मैं खुले में रहना चाहती हूँ''। इसके बाद छत बनवाने का काम रोक दिया गया। यह स्थान चारों तरफ से नदियों से घिरा है। पौराणिक मान्यता भी है कि यहां बिना पैर धोये माता का दर्शन नहीं होता। यहीं पर घांघी-हिरण्यावती-खनुआ नदी का संगम भी है। संवाद
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इस रास्ते जाएं मंदिर
कसया तहसील से लगभग 12 किमी दूर कुड़वा दिलीप नगर के घने जंगल में स्थित मां कुलकुला (कुलकुल) देवी मंदिर पहुंचने के लिए कसया से एनएच होते कुड़वा या दिलीप नगर जाया जा सकता है। वहीं, फाजिलनगर की तरफ से आने वाली मधुरिया पुलिस चौकी से रहसू बाजार होते हुए मंदिर तक आसानी से पहुंच सकते हैं। यहां तक पहुंचने के लिए टैक्सी या निजी वाहन का इस्तेमाल करें। मंदिर तक जाने के लिए कोई नियमित वाहन नहीं चलता है।