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Kushinagar News: सहालग में मिलावटी पनीर खपाने की तैयारी में धंधेबाज...रहें सावधान
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Mon, 13 Apr 2026 12:27 AM IST
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पनीर के लिए तैयार दूध। संवाद
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पडरौना। सहालग सीजन 15 अप्रैल से शुरू हो रहा है। शादी-विवाह में पनीर की खपत सामान्य दिनों से तीन गुना बढ़ जाती है। हालांकि, दूध के उत्पादन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, बल्कि गर्मी में दूध का उत्पादन कम हो जाता है। ऐसे में धंधेबाजों ने मुनाफाखोरी के लिए मिलावटी पनीर खपाने की तैयारी कर ली है। सूत्र बताते हैं कि मुनाफा कमाने के लालच में मिलावट का धंधा मुफीद साबित होता है। डिमांड की पूर्ति के लिए सिंथेटिक दूध से पनीर तैयार किया जा रहा है। ऐसे पनीर को चिकित्सक सेहत के लिए खतरनाक बता रहे हैं।
बाजार से जुडे लोग बताते हैं कि सामान्य दिनों में 40 से 50 क्विंटल पनीर की खपत थी, वहीं सहालग में यह खपत 200 क्विंटल तक पहुंच जाती है। लोकल दुकानदार 260 रुपये किलो पनीर दे रहे हैं, जिसमें मिलावट है। वहीं दुकानों पर शुद्ध पनीर 400-450 रुपये किलो बिक रहा है।
सहालग को लेकर बाजार में दूध और पनीर की मांग बढ़ गई है। इसका फायदा उठाने के लिए मिलावट करने वाले धंधेबाज सक्रिय हो गए हैं। पाउडर और पैकेट के दूध में अरारोट मिलाकर बने पनीर सस्ते दर पर धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। मिलावट के इस खेल में सेहत को सुरक्षित रख पाना मुश्किल हो गया है। आश्चर्य की बात तो यह है कि रकम खर्च करने के बाद भी दूध और पनीर के अलावा दूध से बने शुद्ध खाद्य पदार्थ नहीं पा रहे हैं। इसकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की ओर से एक साल में लिए गए नमूनों की जांच रिपोर्ट मिलावट की तस्दीक कर रही है।
जानकार बताते हैं कि जिले में रोजाना औसतन दूध का उत्पादन करीब 8.25 लाख लीटर है, जबकि सामान्य दिनों में खपत करीब 12 लाख लीटर की होती है। त्याेहार और सहालग में दूध की खपत दो से तीन गुना बढ़ जाती है। गर्मी के मौसम में दुधारू मवेशी दूध देना कम कर देते हैं। ऐसे में कम पड़े दूध की भरपाई कहां से हो रही है? इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। उत्पादन से अधिक दूध की मांग को पूरा करने के लिए सिंथेटिक दूध का इस्तेमाल बढ़ गया है। यह लोगों की सेहत के साथ जेब पर असर डाल रहा है।
शहर में इन दिनों दर्जन भर से अधिक मिठाई के कारखाने चल रहे हैं। शहर के मिठाई के बड़े दुकानदार अपने-अपने कारखाने चलाते हैं। इसी तरह पनीर की दुकानों पर ऑर्डर के मुताबिक पनीर उपलब्ध हैं। इन दुकानदारों के पास न तो अपना कोई दुग्ध उत्पादन का संसाधन है और न ही इनके कलेक्शन सेंटर, फिर भी इतनी अधिक मात्रा में दूध इनके पास कहां से आता है, यह बड़ा सवाल है।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. अश्विनी सिंह ने बताया कि जिले में गाय की संख्या 51,821 और 51,847 मवेशी (भैंस) हैं। इनसे 8.25 लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है। इसके अलावा गोरखपुर और लखनऊ आदि जनपदों से रोजाना दो लाख लीटर से अधिक दूध की आपूर्ति अलग-अलग डेयरी कंपनियों से होती है। पैकेट दूध का कारोबार करने वाली कंपनियां भी करीब एक लाख लीटर दूध की आपूर्ति कर रही हैं। शेष बचे एक लाख लीटर दूध की आपूर्ति मिलावट से होती है।
दूध के 44 नमूनों में मिले 28 अधोमानक
उत्पादन कम और खपत अधिक होने का ही लाभ धंधेबाज उठाते हैं। वे गाय-भैंस के 10 लीटर दूध के साथ उतनी ही मात्रा में पाउडर वाला दूध मिला देते हैं। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की ओर से एक साल में दूध के करीब 50 से अधिक नमूने लिए थे। इनमें करीब 44 की रिपोर्ट आई, जिसमें 28 अधोमानक मिले। यानी दूध में मानक के अनुसार तत्व नहीं मिले। सहालग के दौरान दूध की मांग बढ़ने पर धंधेबाज पानी तो मिलाते ही हैं, अब पाउडर से बना दूध भी बाजार में बेच दे रहे हैं। पशुपालन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक जिले में उत्पादन से ज्यादा दूध की खपत है। ऐसे में शुद्धता की गारंटी संभव नहीं है। यही हाल पनीर और दूध से बने खाद्य पदार्थों का भी है।
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सहालग के दौरान लोगों के शुद्ध खाद्य एवं पेय पदार्थ उपलब्ध कराने के लिए खाद्य विभाग गंभीर है। मिलावटी पनीर, मिठाई समेत अन्य खाद्य पदार्थों की बिक्री रोकने के लिए जांच टीम गठित कर दी गई है। यदि कहीं मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री मिलने की आशंका हो तो विभाग को सूचित करे। सूचना मिलते ही टीम भेजकर जांच कराई जाएगी। जांच में मिलावट की पुष्टि होने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। -प्रदीप कुमार राय, सहायक आयुक्त खाद्य- द्वितीय, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग, कुशीनगर।
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मिलावटी पनीर में यूरिया, डिटर्जेंट, फॉर्मेलिन और खराब क्वालिटी के तेल का उपयोग किया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए ''धीमा जहर'' है। इसके सेवन से फूड प्वाइजनिंग, गंभीर दस्त, उल्टी, पेट में ऐंठन, लिवर और किडनी डैमेज जैसी बीमारियां हो सकती हैं। लंबे समय तक इसका सेवन कैंसर और हार्मोनल असंतुलन का कारण बन सकता है। इसलिए पनीर समेत अन्य खाद्य पदार्थों की खरीदारी पूरी तरह जांच परखकर कर करनी चाहिए। -डॉ. प्रवीण कुमार राव, डीएम गैस्ट्रो।
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बाजार से जुडे लोग बताते हैं कि सामान्य दिनों में 40 से 50 क्विंटल पनीर की खपत थी, वहीं सहालग में यह खपत 200 क्विंटल तक पहुंच जाती है। लोकल दुकानदार 260 रुपये किलो पनीर दे रहे हैं, जिसमें मिलावट है। वहीं दुकानों पर शुद्ध पनीर 400-450 रुपये किलो बिक रहा है।
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सहालग को लेकर बाजार में दूध और पनीर की मांग बढ़ गई है। इसका फायदा उठाने के लिए मिलावट करने वाले धंधेबाज सक्रिय हो गए हैं। पाउडर और पैकेट के दूध में अरारोट मिलाकर बने पनीर सस्ते दर पर धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। मिलावट के इस खेल में सेहत को सुरक्षित रख पाना मुश्किल हो गया है। आश्चर्य की बात तो यह है कि रकम खर्च करने के बाद भी दूध और पनीर के अलावा दूध से बने शुद्ध खाद्य पदार्थ नहीं पा रहे हैं। इसकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की ओर से एक साल में लिए गए नमूनों की जांच रिपोर्ट मिलावट की तस्दीक कर रही है।
जानकार बताते हैं कि जिले में रोजाना औसतन दूध का उत्पादन करीब 8.25 लाख लीटर है, जबकि सामान्य दिनों में खपत करीब 12 लाख लीटर की होती है। त्याेहार और सहालग में दूध की खपत दो से तीन गुना बढ़ जाती है। गर्मी के मौसम में दुधारू मवेशी दूध देना कम कर देते हैं। ऐसे में कम पड़े दूध की भरपाई कहां से हो रही है? इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। उत्पादन से अधिक दूध की मांग को पूरा करने के लिए सिंथेटिक दूध का इस्तेमाल बढ़ गया है। यह लोगों की सेहत के साथ जेब पर असर डाल रहा है।
शहर में इन दिनों दर्जन भर से अधिक मिठाई के कारखाने चल रहे हैं। शहर के मिठाई के बड़े दुकानदार अपने-अपने कारखाने चलाते हैं। इसी तरह पनीर की दुकानों पर ऑर्डर के मुताबिक पनीर उपलब्ध हैं। इन दुकानदारों के पास न तो अपना कोई दुग्ध उत्पादन का संसाधन है और न ही इनके कलेक्शन सेंटर, फिर भी इतनी अधिक मात्रा में दूध इनके पास कहां से आता है, यह बड़ा सवाल है।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. अश्विनी सिंह ने बताया कि जिले में गाय की संख्या 51,821 और 51,847 मवेशी (भैंस) हैं। इनसे 8.25 लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है। इसके अलावा गोरखपुर और लखनऊ आदि जनपदों से रोजाना दो लाख लीटर से अधिक दूध की आपूर्ति अलग-अलग डेयरी कंपनियों से होती है। पैकेट दूध का कारोबार करने वाली कंपनियां भी करीब एक लाख लीटर दूध की आपूर्ति कर रही हैं। शेष बचे एक लाख लीटर दूध की आपूर्ति मिलावट से होती है।
दूध के 44 नमूनों में मिले 28 अधोमानक
उत्पादन कम और खपत अधिक होने का ही लाभ धंधेबाज उठाते हैं। वे गाय-भैंस के 10 लीटर दूध के साथ उतनी ही मात्रा में पाउडर वाला दूध मिला देते हैं। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की ओर से एक साल में दूध के करीब 50 से अधिक नमूने लिए थे। इनमें करीब 44 की रिपोर्ट आई, जिसमें 28 अधोमानक मिले। यानी दूध में मानक के अनुसार तत्व नहीं मिले। सहालग के दौरान दूध की मांग बढ़ने पर धंधेबाज पानी तो मिलाते ही हैं, अब पाउडर से बना दूध भी बाजार में बेच दे रहे हैं। पशुपालन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक जिले में उत्पादन से ज्यादा दूध की खपत है। ऐसे में शुद्धता की गारंटी संभव नहीं है। यही हाल पनीर और दूध से बने खाद्य पदार्थों का भी है।
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सहालग के दौरान लोगों के शुद्ध खाद्य एवं पेय पदार्थ उपलब्ध कराने के लिए खाद्य विभाग गंभीर है। मिलावटी पनीर, मिठाई समेत अन्य खाद्य पदार्थों की बिक्री रोकने के लिए जांच टीम गठित कर दी गई है। यदि कहीं मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री मिलने की आशंका हो तो विभाग को सूचित करे। सूचना मिलते ही टीम भेजकर जांच कराई जाएगी। जांच में मिलावट की पुष्टि होने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। -प्रदीप कुमार राय, सहायक आयुक्त खाद्य- द्वितीय, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग, कुशीनगर।
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मिलावटी पनीर में यूरिया, डिटर्जेंट, फॉर्मेलिन और खराब क्वालिटी के तेल का उपयोग किया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए ''धीमा जहर'' है। इसके सेवन से फूड प्वाइजनिंग, गंभीर दस्त, उल्टी, पेट में ऐंठन, लिवर और किडनी डैमेज जैसी बीमारियां हो सकती हैं। लंबे समय तक इसका सेवन कैंसर और हार्मोनल असंतुलन का कारण बन सकता है। इसलिए पनीर समेत अन्य खाद्य पदार्थों की खरीदारी पूरी तरह जांच परखकर कर करनी चाहिए। -डॉ. प्रवीण कुमार राव, डीएम गैस्ट्रो।

पनीर के लिए तैयार दूध। संवाद