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बाढ़ का कहर : जल्दी नहीं मिटेंगे तबाही के निशान

Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 26 Oct 2021 01:37 AM IST
शारदा तटबंध पर टाट पट्टी बांधकर रह रहे बाढ़ पीड़ित।
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काफी संख्या में बाढ़ पीड़ितों तक नहीं पहुंच सकी राहत सामग्री, खुले आसमान के नीचे रहने को लोग विवश

लखीमपुर खीरी। नदियों का जलस्तर भले ही घट रहा हो लेकिन बाढ़ पीड़ितों की मुसीबतें कम नहीं हो पा रही हैं। अब तक 50 से अधिक गांवों में पानी भरा हुआ है। यहां के बाशिंदे सड़कों के किनारे, स्कूलों में या तटबंधों पर खुले आसमान के नीचे दिन काटने को मजबूर हैं। इस बार आई भीषण बाढ़ अब तक 14 लोगों की जान ले चुकी है तो कई लोग लापता हैं। हजारों हेक्टेयर तैयार फसल भी बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी है।
इस बार की बाढ़ में प्रशासन की बदइंतजामी खुल कर सामने आई। बाढ़ पीड़ितों को अब तक सरकारी मदद के नाम पर सिर्फ खाने के पैकेट ही मिल पाए है। इनमें कई स्थान ऐसे हैं जहां खाने के पैकेट भी नहीं पहुंचाए जा सके। ऐेसे में पानी से घिरे लोग परेशान हैं।


निघासन : बाढ़ पीड़ितों ने कहा-मदद नाकाफी
निघासन। बाढ़ पीड़ितों को प्रशासन की तरफ से अब तक जरूरी मदद मुहैया नहीं हो पाई है। बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि, सरकारी इमदाद ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है। उधर, तहसील क्षेत्र में पानी में डूबने से चार लोगों की मौत के बाद उनके परिवारों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई है। तहसीलदार विपिन द्विवेदी ने बताया कि पूरा तहसील क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है। अभी तक 40 हजार लंच पैकेट, 150 तिरपाल बांटे गए हैं। बताया कि, 12 हजार राशन किटों का मंगलवार से वितरण होगा। बाढ़ से नुकसान हुई फसलों के मुआवजे का आकलन किया जा रहा है। संवाद

चिलचिलाती धूप और दुर्गंध में रहने को विवश है बाढ़ पीड़ित
निघासन। यहां बाढ़ पीड़ित खुले आसमान और चिलचिलाती धूप और दुर्गंध के बीच में रहने को मजबूर हैं। जगदीश, सुरेश, महताब ने बताया कि घरों में पानी तो कम हुआ है, लेकिन कीचड़ के कारण समस्या हो रही है। मच्छर आदि होने से बीमारियों का डर बना हुआ है। प्रशासन ने अब तक तिरपाल तक की व्यवस्था नहीं कराई है। पुरैना, लालबोझी, मदनापुर, झौआ पुरवा आदि के बाढ़ पीड़ितों ने बताया कि बाढ़ आने के दूसरे दिन लंच पैकेट बंटवाए गए था। उसके बाद एक भी लंच पैकेट नहीं दिया गया। तिरपाल आदि न मिलने से धूप में रहने को विवश है।

बाढ़ पीड़ितों तक नहीं पहुंची राहत सामग्री
बिजुआ। तहसील पलिया के बाढ़ सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित गांवों में मझौरा मटेहिया बोझवा दौलतापुर कचनारा जंगल नंबर सात, जगन्नाथ टांडा, प्रतापटांडा, राऊटांडा, नया देशराज टांडा, छंगाटांडा, शाहपुर, नयापुरवा, ढखिया खुर्द, ढखिया कलां, पलिया पुरवा, टापरपुरवा, नरायनपुरवा, कुंअरपुर खुर्द, कुंअरपुर कलां, खैरा आदि में अब तक राहत सामग्री नहीं पहुंच पाई है। बेघर हुए लोग खुले आसमान के नीचे मैदान में पडे़ हुए हैं तथा खाने की बात छोड़िए उनके पास रात मे रोशनी के लिए मोमबत्ती तक नहीं है। पलिया तहसीलदार आशीष कुमार सिंह ने बताया कि बाढ़ से रोड कट जाने से राहत सामग्री नहीं पहुंच पाई है लेखपालों को सभी प्रभावित जगहों पर खाना बनवाकर खिलाने के आदेश दिए गए हैं। बाढ़ प्रभावित गांवों में टैंकर पहुंच नहीं पा रहे हैं लोगों से पानी उबालकर पीने को कहा गया है। गोला एसडीएम अखिलेश यादव ने बताया कि तहसील गोला के बाढ़ प्रभावित गांवों में राहत सामग्री का वितरण हो रहा है। रविवार को 500पैकेट बंटवाए गए थे।

सरकारी इमदाद के नाम पर मिले सिर्फ लंच पैकेट
महेवागंज/सुंदरवल। फूलबेहड़ इलाके में बाढ़ का पानी ज्यों ज्यों उतर रहा है पीछे तबाही के निशान छोड़ता जा रहा है। अधिकतर कच्चे घर धराशाई हो गए है। फसलें चौपट हो गई हैं। बाढ़ पीड़ित तटबंध पर त्रिपाल डालकर ख़ानाबदोश जिंदगी जी रहे है। लोगों का कहना है कि सरकारी मदद के नाम पर दो दिन लंच पैकेट दिया गया। कुछ के हाथ वह भी नही लगे। मीलपुरवा के पास सड़क पर अभी पानी चल रहा है। ऊंचे स्थान पर बसे लोग अब घरों को लौटने लगे हैं। हालांकि प्रशासन ने मिलपुरवा, श्रीनगर, खगईपुरवा, खमरिया, करसौर और मुड़िया गांवों के पास नाव और स्टीमर लगा दिए है, जिससे बाढ़ पीड़ितों को आवागमन में बाधा न पड़े। कानूनगो अंकित अवस्थी ने बताया पानी तेजी से घट रहा है। रास्ते खुलते ही गांव में हुए नुकसान का सर्वे कराया जाएगा।

क्या कहते हैं बाढ़ पीड़ित
मेहंदी गांव निवासी सड्डू खां ने बताया कि भयंकर बाढ़ के बीच कोई सरकारी मुलाजिम गांव में झांकने तक नही आया। फसले चौपट हो गई हैं।
खांभी निवासी कौशल कुमार ने बताया कि कभी ऐसी बाढ़ नही देखी। प्रधान की ओर से नाव और खाने की व्यवस्था कराई थी। बाढ़ से कई कच्चे घर गिर गए है।
खांभी गांव के रहने वाले तौले राम कहते हैं कि इस भीषण बाढ़ के दौर में सरकारी स्तर से सिर्फ खाना ही बाढ़ पीड़ितों को मिल पाया है। वह भी कहीं पहुंचा तो कहीं वह भी नहीं पहुंच पाया।
 

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