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Lakhimpur Kheri News: शारदा की लहरों में बहा गांव का वजूद, 450 घरों से सिर्फ 21 बचे
Tue, 18 Aug 2026 11:24 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Tue, 18 Aug 2026 11:24 PM IST
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ओझापुरवा के रास्तों पर भरा बाढ़ का पानी। संवाद
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निघासन। पहाड़ों और मैदानी इलाकों में हो रही बारिश के बीच बनबसा बैराज से पानी छोड़े जाने के बाद शारदा का जलस्तर बढ़ गया है। वहीं, ग्रंट नंबर-12 में कटान ने फिर रफ्तार पकड़ ली है। कभी करीब 450 घरों और 4500 की आबादी वाले इस गांव में अब महज 21 घर ही बचे हैं। सैकड़ों घर और खेत शारदा की धारा में समा चुके हैं।
गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली सड़क नदी में कट चुकी है। उच्च प्राथमिक विद्यालय भी कटान की जद में आ गया है। जल जीवन मिशन के तहत बनी पानी की टंकी पर भी खतरा मंडरा रहा है। तीन साल से पुनर्वास की आस लगाए ग्रामीण अब गांव का अस्तित्व बचाने की गुहार लगा रहे हैं।
मंगलवार को ग्रंट नंबर-12 में कटान से उजड़ने की तस्वीर साफ दिखाई दी। ग्रामीण तेज बहादुर ने बताया कि गांव पहले से ही डूब क्षेत्र घोषित है। पुनर्वास की मांग को लेकर कई बार धरना-प्रदर्शन किए गए, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि कभी गांव में करीब 450 घर थे। शारदा की धार में एक-एक कर घर समाते गए और अब सिर्फ 21 घर बचे हैं।
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ग्रामीण राजेश गौतम ने बताया कि समय रहते प्रभावी बचाव कार्य किए जाते तो खेत और घर बचाए जा सकते थे। बरसात में गांव का संपर्क और भी मुश्किल हो जाता है। निघासन तहसील मुख्यालय करीब 70 किलोमीटर दूर है, जबकि जिला मुख्यालय करीब 18 किलोमीटर दूर है। बारिश और बाढ़ के दौरान गांव का वैकल्पिक रास्ता भी बंद हो जाता है।
12.926 हेक्टेयर भूमि और पांच घर कटे
तहसील प्रशासन के अनुसार इस वर्ष अब तक करीब 42 ग्रामीणों की 12.926 हेक्टेयर भूमि शारदा नदी में कट चुकी है। इसके अलावा पांच घर भी नदी में समा गए हैं। इनमें सरजू पुत्र सुकई, राममूर्ति पुत्र रामदुलारे, विश्राम पुत्र छोटन्न, गजराज पुत्र बलराम और सचिन पुत्र जगदंबा के घर शामिल हैं। सरकारी स्कूल का रसोईघर, उच्च प्राथमिक विद्यालय का एक बरामदा और एक कमरा भी नदी में कट चुका है। वहीं, मंगलवार सुबह करीब आठ बजे बनबसा बैराज से 1,17,912 क्यूसेक पानी छोड़े जाने की जानकारी मिली। लगातार बारिश और नदी की तेज धार से ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है। इस दौरान प्रशासन ने करीब 150 लोगों को बाढ़ राहत सामग्री भी वितरित की।
कई मजरे और महादेव मुड़िया भी हो चुके हैं खत्म
शारदा का कहर केवल वर्तमान ग्रंट नंबर-12 तक सीमित नहीं है। नदी के कटान में गांव के बैजनाथ पुरवा, पारस पुरवा, मंझरी और हड़ही पुरवा पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। करीब 15 वर्ष पहले इसी गांव का मजरा महादेव मुड़िया भी शारदा की तेज धार में समा गया था। वर्ष 2025 में भी कटान से 150 से अधिक घर नदी में समा गए थे। गांव का रास्ता और मंदिर भी नदी की भेंट चढ़ चुके हैं। कटान पीड़ितों में कई परिवार आज भी तटबंध पर खुले आसमान के नीचे जीवन गुजार रहे हैं।
अब मगरमच्छ का भी खतरा
बाढ़ और कटान से जूझ रहे ग्रामीणों के सामने अब जलीयजीवों का खतरा भी बढ़ गया है। ग्रामीणों के मुताबिक, शारदा नदी के किनारे मगरमच्छ दिखाई देने लगे हैं। वन विभाग ने ग्रामीणों को सतर्क करने के लिए जगह-जगह चेतावनी बोर्ड लगाए हैं और नदी के आसपास सावधानी बरतने की अपील की है।
तीन साल से पुनर्वास का इंतजार
ग्रामीणों का कहना है कि जब गांव को डूब क्षेत्र घोषित किया जा चुका है तो यहां रहने वाले परिवारों के स्थायी पुनर्वास की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। ग्रामीण यह सवाल भी उठा रहे हैं कि डूब क्षेत्र की जमीन पर करोड़ों रुपये की सरकारी योजनाओं और निर्माण कार्यों को अनुमति कैसे मिली। नदी हर साल गांव का नक्शा बदल रही है, लेकिन पुनर्वास की प्रक्रिया अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी है।
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वह स्वयं गांव में मौजूद रहकर स्थिति पर नजर रख रहे हैं। ग्रंट नंबर-12 के बाढ़ और कटान पीड़ितों के पुनर्वास की तैयारी की जा रही है। उन्होंने बताया कि प्रभावित परिवारों को निघासन तहसील क्षेत्र के लुधौरी गांव में बसाने की तैयारी है। - यदुवीर सिंह, निघासन, एसडीएम
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दुश्वारियां अभी बरकरार, रास्तों में भरा पानी
फोटो-45
संवाद न्यूज एजेंसी
धौरहरा। पहाड़ों से लेकर मैदानी इलाकों में पिछले दिनों हुई बारिश के बाद उफनाई घाघरा नदी ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ाई हुई है। गांवों और मजरों के आसपास खेतों व रास्तों में पानी भरा हुआ है।
ईसानगर विकास खंड के गांव चकदहा और ओझापुरवा के कई मजरों में बाढ़ का पानी घरों तक पहुंच गया था। जलस्तर में कमी आने से ग्रामीणों को कुछ राहत मिली है, लेकिन खेतों और संपर्क मार्गों पर जलभराव के कारण आवागमन प्रभावित है। कई रास्तों पर घुटनों से लेकर कमर तक पानी भरा होने से ग्रामीणों को आने-जाने में परेशानी हो रही है।
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घाघरा नदी का जलस्तर कुछ कम होने से बाढ़ प्रभावित गांवों में भी पानी घट रहा है, खेतों और रास्तों में अधिक पानी होने से ग्रामीणों को सतर्क रहने को कहा गया है, राजस्व टीम निगरानी कर रही है।
आदित्य विशाल, तहसीलदार धौरहरा।
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गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली सड़क नदी में कट चुकी है। उच्च प्राथमिक विद्यालय भी कटान की जद में आ गया है। जल जीवन मिशन के तहत बनी पानी की टंकी पर भी खतरा मंडरा रहा है। तीन साल से पुनर्वास की आस लगाए ग्रामीण अब गांव का अस्तित्व बचाने की गुहार लगा रहे हैं।
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मंगलवार को ग्रंट नंबर-12 में कटान से उजड़ने की तस्वीर साफ दिखाई दी। ग्रामीण तेज बहादुर ने बताया कि गांव पहले से ही डूब क्षेत्र घोषित है। पुनर्वास की मांग को लेकर कई बार धरना-प्रदर्शन किए गए, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि कभी गांव में करीब 450 घर थे। शारदा की धार में एक-एक कर घर समाते गए और अब सिर्फ 21 घर बचे हैं।
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ग्रामीण राजेश गौतम ने बताया कि समय रहते प्रभावी बचाव कार्य किए जाते तो खेत और घर बचाए जा सकते थे। बरसात में गांव का संपर्क और भी मुश्किल हो जाता है। निघासन तहसील मुख्यालय करीब 70 किलोमीटर दूर है, जबकि जिला मुख्यालय करीब 18 किलोमीटर दूर है। बारिश और बाढ़ के दौरान गांव का वैकल्पिक रास्ता भी बंद हो जाता है।
12.926 हेक्टेयर भूमि और पांच घर कटे
तहसील प्रशासन के अनुसार इस वर्ष अब तक करीब 42 ग्रामीणों की 12.926 हेक्टेयर भूमि शारदा नदी में कट चुकी है। इसके अलावा पांच घर भी नदी में समा गए हैं। इनमें सरजू पुत्र सुकई, राममूर्ति पुत्र रामदुलारे, विश्राम पुत्र छोटन्न, गजराज पुत्र बलराम और सचिन पुत्र जगदंबा के घर शामिल हैं। सरकारी स्कूल का रसोईघर, उच्च प्राथमिक विद्यालय का एक बरामदा और एक कमरा भी नदी में कट चुका है। वहीं, मंगलवार सुबह करीब आठ बजे बनबसा बैराज से 1,17,912 क्यूसेक पानी छोड़े जाने की जानकारी मिली। लगातार बारिश और नदी की तेज धार से ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है। इस दौरान प्रशासन ने करीब 150 लोगों को बाढ़ राहत सामग्री भी वितरित की।
कई मजरे और महादेव मुड़िया भी हो चुके हैं खत्म
शारदा का कहर केवल वर्तमान ग्रंट नंबर-12 तक सीमित नहीं है। नदी के कटान में गांव के बैजनाथ पुरवा, पारस पुरवा, मंझरी और हड़ही पुरवा पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। करीब 15 वर्ष पहले इसी गांव का मजरा महादेव मुड़िया भी शारदा की तेज धार में समा गया था। वर्ष 2025 में भी कटान से 150 से अधिक घर नदी में समा गए थे। गांव का रास्ता और मंदिर भी नदी की भेंट चढ़ चुके हैं। कटान पीड़ितों में कई परिवार आज भी तटबंध पर खुले आसमान के नीचे जीवन गुजार रहे हैं।
अब मगरमच्छ का भी खतरा
बाढ़ और कटान से जूझ रहे ग्रामीणों के सामने अब जलीयजीवों का खतरा भी बढ़ गया है। ग्रामीणों के मुताबिक, शारदा नदी के किनारे मगरमच्छ दिखाई देने लगे हैं। वन विभाग ने ग्रामीणों को सतर्क करने के लिए जगह-जगह चेतावनी बोर्ड लगाए हैं और नदी के आसपास सावधानी बरतने की अपील की है।
तीन साल से पुनर्वास का इंतजार
ग्रामीणों का कहना है कि जब गांव को डूब क्षेत्र घोषित किया जा चुका है तो यहां रहने वाले परिवारों के स्थायी पुनर्वास की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। ग्रामीण यह सवाल भी उठा रहे हैं कि डूब क्षेत्र की जमीन पर करोड़ों रुपये की सरकारी योजनाओं और निर्माण कार्यों को अनुमति कैसे मिली। नदी हर साल गांव का नक्शा बदल रही है, लेकिन पुनर्वास की प्रक्रिया अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी है।
वह स्वयं गांव में मौजूद रहकर स्थिति पर नजर रख रहे हैं। ग्रंट नंबर-12 के बाढ़ और कटान पीड़ितों के पुनर्वास की तैयारी की जा रही है। उन्होंने बताया कि प्रभावित परिवारों को निघासन तहसील क्षेत्र के लुधौरी गांव में बसाने की तैयारी है। - यदुवीर सिंह, निघासन, एसडीएम
दुश्वारियां अभी बरकरार, रास्तों में भरा पानी
फोटो-45
संवाद न्यूज एजेंसी
धौरहरा। पहाड़ों से लेकर मैदानी इलाकों में पिछले दिनों हुई बारिश के बाद उफनाई घाघरा नदी ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ाई हुई है। गांवों और मजरों के आसपास खेतों व रास्तों में पानी भरा हुआ है।
ईसानगर विकास खंड के गांव चकदहा और ओझापुरवा के कई मजरों में बाढ़ का पानी घरों तक पहुंच गया था। जलस्तर में कमी आने से ग्रामीणों को कुछ राहत मिली है, लेकिन खेतों और संपर्क मार्गों पर जलभराव के कारण आवागमन प्रभावित है। कई रास्तों पर घुटनों से लेकर कमर तक पानी भरा होने से ग्रामीणों को आने-जाने में परेशानी हो रही है।
घाघरा नदी का जलस्तर कुछ कम होने से बाढ़ प्रभावित गांवों में भी पानी घट रहा है, खेतों और रास्तों में अधिक पानी होने से ग्रामीणों को सतर्क रहने को कहा गया है, राजस्व टीम निगरानी कर रही है।
आदित्य विशाल, तहसीलदार धौरहरा।

ओझापुरवा के रास्तों पर भरा बाढ़ का पानी। संवाद