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Mau News: दिल्ली बम धमाके में सिम के प्रयोग की बात कह चार दिन डिजिटल अरेस्ट कर 21 लाख की ठगी
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एक एलआईसी सर्वेयर से ठगों ने दिल्ली बम ब्लास्ट में सिम के प्रयोग होने की बात कहकर चार दिन तक डिजिटल अरेस्ट कर 21 लाख रुपये की ठगी कर ली। पुलिस की जांच में पता चला कि ठगों ने महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के बैंक खातों में रुपये ट्रांसफर कराए।
वर्ष 2026 में अब तक यहां डिजिटल अरेस्ट के चार मामले दर्ज हो चुके हैं। साइबर थाने में दर्ज शिकायत के अनुसार, घोसी कोतवाली क्षेत्र निवासी पीड़ित एलआईसी में सर्वेयर का काम करता है।
उसने बताया कि 20 फरवरी की शाम उसे एक कॉल आया, जिसमें कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली से एनआईए का सब इंस्पेक्टर अरुण कुमार बताया।
उसने कहा कि उनके (पीड़ित) के आधार कार्ड से लिया गया सिम दिल्ली ब्लास्ट में इस्तेमाल हुआ है। इसके बाद पीड़ित को व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर लिया गया, जहां ठग पुलिस की वर्दी में नजर आए।
पीड़ित को डिजिटल अरेस्ट कर कैमरे के सामने घंटों बैठाए रखा गया। केस खत्म करने और बेल बॉन्ड के नाम पर ठगों ने 23 फरवरी तक चार दिन तक उसे डिजिटल अरेस्ट रखा। 20 तारीख को साढ़े नौ लाख और 23 तारीख को 11.40 लाख दो किस्त में कुल 21 लाख रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर करा लिए।
पीड़ित जब बैंक में गया तो वहां डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगों से बचने की जानकारी चस्पा थी। इसके बाद पीड़ित को ठगी का अहसास हुआ और पीड़ित ने अपने एक करीबी को घटना की जानकारी दी। इसके बाद मामले की सूचना साइबर थाने में दी गई।
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पॉलिटेक्निक छात्र को दो घंटे तक डिजिटल अरेस्ट रख 10 हजार ठगे
दूसरा मामला 5 मार्च का है, जिसमें पॉलिटेक्निक के एक छात्र ने बताया कि उसे फोन कर गूगल क्रोम पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखने का आरोप लगाया गया। वीडियो कॉल करने वाले ने खुद को उपनिरीक्षक बताया। इसके बाद छात्र को दो घंटे तक डिजिटल अरेस्ट रखा गया और उससे 10 हजार रुपये एक खाते में ट्रांसफर कराए गए। साइबर थाने के प्रधान आरक्षी शैलेंद्र कनौजिया ने बताया कि अब भी कई लोग लोकलाज के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते हैं। उन्होंने बताया कि अधिकांश पीड़ित छात्र और बेरोजगार युवा हैं, जिन्हें पोर्नोग्राफी के नाम पर डिजिटल अरेस्ट कर ठगी की जाती है। इससे पहले ठग कोटा, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में पढ़ाई करने गए छात्रों के अभिभावकों को भी निशाना बना चुके हैं।
सिग्नल एप डाउनलोड कराकर करते थे बात
साइबर सेल प्रभारी शैलेश सिंह ने बताया कि ठगो ने डिजिटल अरेस्ट के मामले में पीड़ित को इतना धमका दिया था कि वह अगले चार दिन के लिए सोसायटी से बिल्कुल कट गया था। ठगों ने पहले वाट्सएप विडियो कॉल की लेकिन उसके बाद उसने पीड़ित को सिग्नल एप डाउनलोड कराया। जिसके बाद सुबह दस बजे से दोपहर दो बजे तक और उसके बाद शाम या रात में बात करते थे। सिग्नल एप एक निःशुल्क, अत्यधिक सुरक्षित और एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म है। जिसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। यह व्हाट्सएप की तरह काम करता है, लेकिन प्राइवेसी पर ज्यादा ध्यान देता है, जिसमें मैसेज, कॉल और फाइलें केवल आप और प्राप्तकर्ता ही पढ़ या सुन सकते हैं।
कोई सुरक्षा एजेंसी डिजिटल अरेस्ट नहीं करती : एसपी
एसपी इलामारन ने बताया कि घोसी प्रकरण में एक टीम गठित कर जांच की जा रही है। साइबर अपराधी खुद को पुलिस, एटीएस, सीबीआई या एनसीआरबी का अधिकारी बताकर डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाते हैं। कोई भी जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी, पूछताछ या धन ट्रांसफर नहीं कराती।
अनजाने लिंक पर क्लिक करने और रिमोट एप इंस्टॉल करने से बचें
एसपी ने बताया कि आधार, बैंक विवरण, ओटीपी या अन्य निजी जानकारी कभी साझा न करें। अज्ञात लिंक, स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एप इंस्टॉल करने से बचें। जागरूकता ही बचाव का सबसे बड़ा तरीका है। संदिग्ध कॉल या संदेश मिलने पर तुरंत कॉल काट दें और आधिकारिक नंबर पर पुलिस या संबंधित एजेंसी से संपर्क करें। कॉलर आईडी पर भरोसा न करें, क्योंकि ठग नकली नंबर दिखा सकते हैं। ऐसे कॉल आने पर तुरंत फोन काटें और 1930 हेल्पलाइन, साइबर क्राइम पोर्टल या थाने में शिकायत दर्ज कराएं।
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वर्ष 2026 में अब तक यहां डिजिटल अरेस्ट के चार मामले दर्ज हो चुके हैं। साइबर थाने में दर्ज शिकायत के अनुसार, घोसी कोतवाली क्षेत्र निवासी पीड़ित एलआईसी में सर्वेयर का काम करता है।
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उसने बताया कि 20 फरवरी की शाम उसे एक कॉल आया, जिसमें कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली से एनआईए का सब इंस्पेक्टर अरुण कुमार बताया।
उसने कहा कि उनके (पीड़ित) के आधार कार्ड से लिया गया सिम दिल्ली ब्लास्ट में इस्तेमाल हुआ है। इसके बाद पीड़ित को व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर लिया गया, जहां ठग पुलिस की वर्दी में नजर आए।
पीड़ित को डिजिटल अरेस्ट कर कैमरे के सामने घंटों बैठाए रखा गया। केस खत्म करने और बेल बॉन्ड के नाम पर ठगों ने 23 फरवरी तक चार दिन तक उसे डिजिटल अरेस्ट रखा। 20 तारीख को साढ़े नौ लाख और 23 तारीख को 11.40 लाख दो किस्त में कुल 21 लाख रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर करा लिए।
पीड़ित जब बैंक में गया तो वहां डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगों से बचने की जानकारी चस्पा थी। इसके बाद पीड़ित को ठगी का अहसास हुआ और पीड़ित ने अपने एक करीबी को घटना की जानकारी दी। इसके बाद मामले की सूचना साइबर थाने में दी गई।
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पॉलिटेक्निक छात्र को दो घंटे तक डिजिटल अरेस्ट रख 10 हजार ठगे
दूसरा मामला 5 मार्च का है, जिसमें पॉलिटेक्निक के एक छात्र ने बताया कि उसे फोन कर गूगल क्रोम पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखने का आरोप लगाया गया। वीडियो कॉल करने वाले ने खुद को उपनिरीक्षक बताया। इसके बाद छात्र को दो घंटे तक डिजिटल अरेस्ट रखा गया और उससे 10 हजार रुपये एक खाते में ट्रांसफर कराए गए। साइबर थाने के प्रधान आरक्षी शैलेंद्र कनौजिया ने बताया कि अब भी कई लोग लोकलाज के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते हैं। उन्होंने बताया कि अधिकांश पीड़ित छात्र और बेरोजगार युवा हैं, जिन्हें पोर्नोग्राफी के नाम पर डिजिटल अरेस्ट कर ठगी की जाती है। इससे पहले ठग कोटा, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में पढ़ाई करने गए छात्रों के अभिभावकों को भी निशाना बना चुके हैं।
सिग्नल एप डाउनलोड कराकर करते थे बात
साइबर सेल प्रभारी शैलेश सिंह ने बताया कि ठगो ने डिजिटल अरेस्ट के मामले में पीड़ित को इतना धमका दिया था कि वह अगले चार दिन के लिए सोसायटी से बिल्कुल कट गया था। ठगों ने पहले वाट्सएप विडियो कॉल की लेकिन उसके बाद उसने पीड़ित को सिग्नल एप डाउनलोड कराया। जिसके बाद सुबह दस बजे से दोपहर दो बजे तक और उसके बाद शाम या रात में बात करते थे। सिग्नल एप एक निःशुल्क, अत्यधिक सुरक्षित और एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म है। जिसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। यह व्हाट्सएप की तरह काम करता है, लेकिन प्राइवेसी पर ज्यादा ध्यान देता है, जिसमें मैसेज, कॉल और फाइलें केवल आप और प्राप्तकर्ता ही पढ़ या सुन सकते हैं।
कोई सुरक्षा एजेंसी डिजिटल अरेस्ट नहीं करती : एसपी
एसपी इलामारन ने बताया कि घोसी प्रकरण में एक टीम गठित कर जांच की जा रही है। साइबर अपराधी खुद को पुलिस, एटीएस, सीबीआई या एनसीआरबी का अधिकारी बताकर डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाते हैं। कोई भी जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी, पूछताछ या धन ट्रांसफर नहीं कराती।
अनजाने लिंक पर क्लिक करने और रिमोट एप इंस्टॉल करने से बचें
एसपी ने बताया कि आधार, बैंक विवरण, ओटीपी या अन्य निजी जानकारी कभी साझा न करें। अज्ञात लिंक, स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एप इंस्टॉल करने से बचें। जागरूकता ही बचाव का सबसे बड़ा तरीका है। संदिग्ध कॉल या संदेश मिलने पर तुरंत कॉल काट दें और आधिकारिक नंबर पर पुलिस या संबंधित एजेंसी से संपर्क करें। कॉलर आईडी पर भरोसा न करें, क्योंकि ठग नकली नंबर दिखा सकते हैं। ऐसे कॉल आने पर तुरंत फोन काटें और 1930 हेल्पलाइन, साइबर क्राइम पोर्टल या थाने में शिकायत दर्ज कराएं।