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Mau News: ताने-बाने की नगरी में उलझ रहा बुनकरों का भविष्य, पांच साल में पांच हजार ने छोड़ा परंपरागत काम
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नगर के बुनकर कालोनी में लूम पर साड़ी की बुनाई करता बुनकर।संवाद
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जिले की पहचान ताना-बाना नगरी के रूप में है। यहां 50 हजार से अधिक बुनकर आज भी साड़ी उद्योग से जुड़े हैं, लेकिन बीते कई सालों से आधुनिकता के इस युग में उन्हें इसे अपनाने में कठिनाई होने के कारण हर साल बुनकरों की संख्या घटती जा रही है।
बुनकर नेता जमाल अर्पण और शफीक डायमंड के अनुसार, नगर में करीब 50 हजार और पूरे जिले में लगभग पांच लाख परिवार बुनकर लघु उद्योग से जुड़े हैं। पांच वर्ष पहले जिले में करीब दो लाख लूम चलते थे, जो अब लगभग आधे रह गए हैं।
बीते पांच साल में करीब 5 हजार बुनकरों ने यह काम छोड़कर महानगरों की ओर रुख किया है। इस बीच कारोबार भी लगभग 40 फीसदी घट चुका है।
जिले में बीते पांच साल से बुनकर व्यापार का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है। बुनकरों का तर्क है कि लागत बढ़ने और सूरत की ऑटोमेटिक लूम मशीनों के कारण यह कमी आई है।
एक लूम पर औसतन एक दिन में केवल एक साड़ी की बुनाई हो पा रही है। मजदूरी 100 से 300 रुपये तक मिल रही है। जनपद में पावरलूम पर साड़ियों और लुंगियों की बुनाई करने वालों की संख्या काफी है।
मऊ शहर, घोसी और मुहम्मदाबाद गोहना तहसील में हैं बुनकर
बुनकर वर्ग के बारे में कहें तो मऊ शहर के साथ घोसी तहसील, कोपागंज, मुहम्मदाबाद, गोहना, अदरी, सिपाह और इब्राहिमाबाद, वलीदपुर में बुनाई बड़े पैमाने पर होती है। यहां बनी साड़ियों की मांग मुंबई, कोलकाता, झारखंड और असम में है। लेकिन बीते पांच सालों में बाहर से ऑर्डर न मिलने के कारण सेठों ने साड़ियों की बुनाई कम कर दी है। पावरलूम पर साड़ियों पर काम करने वाले बुनकरों की संख्या लगभग चार लाख है। इन बुनकरों का परिवार उनकी मेहनत से मिलने वाली मजदूरी पर निर्भर है।
तीन प्रकार के बुनकरों की संख्या
जिले में बुनकरों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। केवल मजदूर बुनकर, जो दूसरों के लूम पर मजदूरी पर बुनाई करते हैं। घरों में लूम लगे बुनकर, जो स्वयं मजदूरी करते हैं। मास्टर वीवर, जो कई बुनकरों को काम पर रखकर मजदूरी देते हैं। इनमें मजदूर बुनकरों की संख्या सबसे अधिक है। बुनकर नेता और नपाध्यक्ष अरशद जमाल के अनुसार जिले के बुनकर अभी भी पुरानी डिजाइन पर काम कर रहे हैं, जबकि गुजरात और अन्य जगहों पर अत्याधुनिक मशीनों का उपयोग व्यापारियों द्वारा किया जा रहा है। पुरानी डिजाइन के कारण बुनकर सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं और कई बुनकर अब अपने परंपरागत काम को छोड़कर महानगरों की ओर रुख कर रहे हैं।
अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी है जो बुनकर का काम कर रही है। पर्याप्त बिजली मिलने पर वह एक दिन में 14 घंटे में डेढ़ साड़ी बुनते हैं। प्रत्येक साड़ी पर 200 रुपये और डेढ़ साड़ी पर 300 रुपये मिलते हैं। - मोहम्मद इब्राहिम, बुनकर कॉलोनी
बीते 20 साल से बुनकर का काम कर रहे हैं। प्रतिदिन 12 से 14 घंटे साड़ियों की बुनाई करते हैं। साड़ी बनाने के बाद उसे कम कीमत मिलने के कारण बाहर बेचने का काम भी करना पड़ता है। - खुरशीद अहमद, बुनकर
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बुनकर नेता जमाल अर्पण और शफीक डायमंड के अनुसार, नगर में करीब 50 हजार और पूरे जिले में लगभग पांच लाख परिवार बुनकर लघु उद्योग से जुड़े हैं। पांच वर्ष पहले जिले में करीब दो लाख लूम चलते थे, जो अब लगभग आधे रह गए हैं।
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बीते पांच साल में करीब 5 हजार बुनकरों ने यह काम छोड़कर महानगरों की ओर रुख किया है। इस बीच कारोबार भी लगभग 40 फीसदी घट चुका है।
जिले में बीते पांच साल से बुनकर व्यापार का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है। बुनकरों का तर्क है कि लागत बढ़ने और सूरत की ऑटोमेटिक लूम मशीनों के कारण यह कमी आई है।
एक लूम पर औसतन एक दिन में केवल एक साड़ी की बुनाई हो पा रही है। मजदूरी 100 से 300 रुपये तक मिल रही है। जनपद में पावरलूम पर साड़ियों और लुंगियों की बुनाई करने वालों की संख्या काफी है।
मऊ शहर, घोसी और मुहम्मदाबाद गोहना तहसील में हैं बुनकर
बुनकर वर्ग के बारे में कहें तो मऊ शहर के साथ घोसी तहसील, कोपागंज, मुहम्मदाबाद, गोहना, अदरी, सिपाह और इब्राहिमाबाद, वलीदपुर में बुनाई बड़े पैमाने पर होती है। यहां बनी साड़ियों की मांग मुंबई, कोलकाता, झारखंड और असम में है। लेकिन बीते पांच सालों में बाहर से ऑर्डर न मिलने के कारण सेठों ने साड़ियों की बुनाई कम कर दी है। पावरलूम पर साड़ियों पर काम करने वाले बुनकरों की संख्या लगभग चार लाख है। इन बुनकरों का परिवार उनकी मेहनत से मिलने वाली मजदूरी पर निर्भर है।
तीन प्रकार के बुनकरों की संख्या
जिले में बुनकरों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। केवल मजदूर बुनकर, जो दूसरों के लूम पर मजदूरी पर बुनाई करते हैं। घरों में लूम लगे बुनकर, जो स्वयं मजदूरी करते हैं। मास्टर वीवर, जो कई बुनकरों को काम पर रखकर मजदूरी देते हैं। इनमें मजदूर बुनकरों की संख्या सबसे अधिक है। बुनकर नेता और नपाध्यक्ष अरशद जमाल के अनुसार जिले के बुनकर अभी भी पुरानी डिजाइन पर काम कर रहे हैं, जबकि गुजरात और अन्य जगहों पर अत्याधुनिक मशीनों का उपयोग व्यापारियों द्वारा किया जा रहा है। पुरानी डिजाइन के कारण बुनकर सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं और कई बुनकर अब अपने परंपरागत काम को छोड़कर महानगरों की ओर रुख कर रहे हैं।
अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी है जो बुनकर का काम कर रही है। पर्याप्त बिजली मिलने पर वह एक दिन में 14 घंटे में डेढ़ साड़ी बुनते हैं। प्रत्येक साड़ी पर 200 रुपये और डेढ़ साड़ी पर 300 रुपये मिलते हैं। - मोहम्मद इब्राहिम, बुनकर कॉलोनी
बीते 20 साल से बुनकर का काम कर रहे हैं। प्रतिदिन 12 से 14 घंटे साड़ियों की बुनाई करते हैं। साड़ी बनाने के बाद उसे कम कीमत मिलने के कारण बाहर बेचने का काम भी करना पड़ता है। - खुरशीद अहमद, बुनकर
