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संयम और साधना से निखरता है जीवन : भाव भूषण
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कैलाश पर्वत मंदिर पर चल रहे भक्तांबर विधान पाठ में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु स्रोत संवाद
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- कैलाश पर्वत दिगंबर जैन मंदिर में 48 दिवसीय भक्तामर विधान पाठ का 43वां दिन
संवाद न्यूज एजेंसी
हस्तिनापुर। कस्बे के कैलाश पर्वत दिगंबर जैन मंदिर में 48 दिवसीय भक्तामर विधान पाठ के 43वें दिन का आयोजन हुआ। विधानाचार्य सौरभ शास्त्री ने मांगलिक मंत्रों से क्रियाओं का शुभारंभ किया। यह विधान विश्व की सुख-शांति-समृद्धि के लिए आयोजित किया गया।
गुरुवर भाव भूषण महाराज ने अपने प्रवचन में तप को आत्मा की शुद्धि का सर्वोत्तम साधन बताया। उन्होंने समझाया कि शरीर को कष्ट दिए बिना मन और आत्मा का वास्तविक जागरण संभव नहीं है। मुनिराज ने कहा कि तप केवल बाहरी क्रिया नहीं बल्कि आत्म अनुशासन और आंतरिक साधना का माध्यम है। तप से मनुष्य अपने भीतर छिपे विकारों और कषायों को नियंत्रित कर सकता है। सच्चा तप इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करना है। उपवास केवल भोजन त्यागना नहीं बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का अभ्यास है। तप करते समय क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
बाल ब्रह्मचारी सुनीता दीदी ने सभी जीवों के सुखी रहने की मंगल भावना के साथ शांतिधारा का उच्चारण किया। आदिनाथ भगवान की पूजा के बाद सभी तीर्थंकरों को अर्घ्य चढ़ाए गए। विधान में 101 परिवारों की ओर से आयोजन हुआ। धर्मप्रेमी बंधुओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए 48 अर्घ्य चढ़ाए गए। विधान का विसर्जन आकांक्षा जैन, सुयश जैन सहित अन्य श्रद्धालुओं ने किया।
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हस्तिनापुर। कस्बे के कैलाश पर्वत दिगंबर जैन मंदिर में 48 दिवसीय भक्तामर विधान पाठ के 43वें दिन का आयोजन हुआ। विधानाचार्य सौरभ शास्त्री ने मांगलिक मंत्रों से क्रियाओं का शुभारंभ किया। यह विधान विश्व की सुख-शांति-समृद्धि के लिए आयोजित किया गया।
गुरुवर भाव भूषण महाराज ने अपने प्रवचन में तप को आत्मा की शुद्धि का सर्वोत्तम साधन बताया। उन्होंने समझाया कि शरीर को कष्ट दिए बिना मन और आत्मा का वास्तविक जागरण संभव नहीं है। मुनिराज ने कहा कि तप केवल बाहरी क्रिया नहीं बल्कि आत्म अनुशासन और आंतरिक साधना का माध्यम है। तप से मनुष्य अपने भीतर छिपे विकारों और कषायों को नियंत्रित कर सकता है। सच्चा तप इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करना है। उपवास केवल भोजन त्यागना नहीं बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का अभ्यास है। तप करते समय क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
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बाल ब्रह्मचारी सुनीता दीदी ने सभी जीवों के सुखी रहने की मंगल भावना के साथ शांतिधारा का उच्चारण किया। आदिनाथ भगवान की पूजा के बाद सभी तीर्थंकरों को अर्घ्य चढ़ाए गए। विधान में 101 परिवारों की ओर से आयोजन हुआ। धर्मप्रेमी बंधुओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए 48 अर्घ्य चढ़ाए गए। विधान का विसर्जन आकांक्षा जैन, सुयश जैन सहित अन्य श्रद्धालुओं ने किया।