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मिशन-2027: पश्चिमी यूपी में दलित वोट बैंक पर सपा की सेंधमारी, कांशीराम जयंती से बदली सियासत
अरीश रिज़वी, अमर उजाला, मेरठ
Published by: Dimple Sirohi
Updated Wed, 18 Mar 2026 07:48 PM IST
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सार
Mission 2027: मेरठ सहित पश्चिमी यूपी में सपा दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति पर काम कर रही है। कांशीराम जयंती के जरिए नए सियासी समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
मिशन-2027 को लेकर दलित वोट बैंक में सपा की सेंधमारी से पश्चिमी यूपी में गर्मी से पहले सियासी पारा चढ़ सकता है। दलितों को साधने के लिए सपा ने पहली बार बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती मनाकर बहन मायावती की पेशानी पर बल डाल दिया है। रणनीतिकारों का मानना है कि इससे सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को नई ताकत मिल सकती है।
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साल 2022 के चुनाव परिणामों को देखें तो भाजपा और सपा-रालोद गठबंधन के बीच सीधी टक्कर थी। बसपा तीसरे नंबर पर खिसक गई थी, लेकिन उसके वोट अब भी सपा के लिए उम्मीद की किरण हैं। खासकर हस्तिनापुर और मेरठ दक्षिण जैसी सीटों पर हार-जीत का अंतर बसपा को मिले वोटों से कम रहा जो यह बताता है कि यहां बसपा का वोट बैंक कितना निर्णायक है।
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सपाइयों का मानना है कि बसपा के कमजोर होने से दलित वोटर विकल्प तलाश रहा है और कांशीराम की विरासत को अपनाकर वे इस खाली जगह को भरना चाहते हैं। यही वजह है कि इस बार जयंती पर सपा ने कांशीराम के प्रति आस्था दिखाई है। ताकि, दलित वोट बैंक में सेंध लगाकर आगामी विस चुनाव में इन सीटों पर मामूली अंतर को भरा जा सके।
मेरठ की सातों सीटों पर अगर दलित मतदाता पीडीए फॉर्मूले के तहत सपा की ओर शिफ्ट होता है तो मेरठ की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। सपा की रणनीति इसी मार्जिन गेम को साधने की है। ऐसे में भाजपा और बसपा भी सपा के इस दलित प्रेम पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
मेरठ की सातों सीटों पर अगर दलित मतदाता पीडीए फॉर्मूले के तहत सपा की ओर शिफ्ट होता है तो मेरठ की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। सपा की रणनीति इसी मार्जिन गेम को साधने की है। ऐसे में भाजपा और बसपा भी सपा के इस दलित प्रेम पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
सातों सीटों का समीकरण: दलित मतदाता हैं किंगमेकर
मेरठ की सातों विधानसभा सीटों पर दलित मतदाताओं की संख्या हार-जीत का अंतर तय करती है। विधानसभा सीटों के आंकड़ों पर नजर डालें तो हस्तिनापुर में लगभग 1.15 लाख दलित वोटर हैं। मेरठ दक्षिण में करीब 85 हजार और कैंट क्षेत्र में 70 हजार के करीब दलित मतदाता हैं। सरधना में करीब 55 और किठौर में करीब 60 हजार मतदाता हैं जो मुस्लिम समीकरण के साथ मिलकर बाजी पलट देते हैं।सिवालखास और मेरठ शहर सीट पर भी दलित मतदाताओं की संख्या 40 से 50 हजार के बीच है।
मेरठ की सातों विधानसभा सीटों पर दलित मतदाताओं की संख्या हार-जीत का अंतर तय करती है। विधानसभा सीटों के आंकड़ों पर नजर डालें तो हस्तिनापुर में लगभग 1.15 लाख दलित वोटर हैं। मेरठ दक्षिण में करीब 85 हजार और कैंट क्षेत्र में 70 हजार के करीब दलित मतदाता हैं। सरधना में करीब 55 और किठौर में करीब 60 हजार मतदाता हैं जो मुस्लिम समीकरण के साथ मिलकर बाजी पलट देते हैं।सिवालखास और मेरठ शहर सीट पर भी दलित मतदाताओं की संख्या 40 से 50 हजार के बीच है।
| विधानसभा | विजेता प्रत्याशी (पार्टी) | उपविजेता (पार्टी) | जीत का अंतर | बसपा प्रत्याशी को मिले वोट |
| किठौर | शाहिद मंजूर (सपा) | सत्यवीर त्यागी (भाजपा) | 2,180 | कुशलपाल मावी 31,213 |
| मेरठ कैंट | अमित अग्रवाल (भाजपा) | मनीषा अहलावत (रालोद) | 1,18,072 | अमित शर्मा 28,519 |
| मेरठ शहर | , रफीक अंसारी (सपा), | कमल दत्त शर्मा (भाजपा), | 26,065 | दिलशाद शौकत 4939 |
| मेरठ दक्षिण, | सोमेंद्र तोमर (भाजपा) | , मो. आदिल (सपा) | 7,942 | कुंवर दिलशाद अली 39,857 |
| सिवालखास, | गुलाम मोहम्मद (रालोद), | मनिंदर पाल (भाजपा), | 9,182 | मुकर्रम अली 29,958 |
| सरधना, | अतुल प्रधान (सपा) | संगीत सोम (भाजपा) | 18,200 | संजीव धामा 18,140 |
| हस्तिनापुर, | दिनेश खटीक (भाजपा) | योगेश वर्मा (सपा) | 7,312 | संजीव कुमार 14,240 |