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Muzaffarnagar News: फैसले के 52 पेजों में जज ने लिखा...और मरकर भी वकील की आवाज इंसाफ ही रचती है, सुनाई मृत्युदंड की सजा
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अदालत से सजा के बाद अभियुक्तों को ले जाती पुलिस : वीडियोग्रेब
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मुजफ्फरनगर। लद्दावाला के समीर सैफी (28) की हत्या के मामले में 52 पेजों का फैसला लिखा है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-तीन के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने रिश्तों में हत्या, मानवीय पहलू, अधिवक्ताओं के अधिकार और विवेचना की स्थिति पर टिप्पणी की। एक कविता भी लिखी है। उन्होंने कहा लिखा है कि और मरकर भी वकील की आवाज इंसाफ ही रचती है।
अदालत ने अपने फैसले में लिखा कि अधिवक्ता बंधुओं पर हमला केवल अधिवक्ताओं पर ही हमला नहीं है, बल्कि यह एक संस्था पर हमले के समान है। उस संस्था अर्थात् एडवोकेट बार को सीधे चुनौती देने जैसा है।
अधिवक्ता समाज में न्याय, लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, इसलिए अधिवक्ताओं को न्याय का प्रहरी भी कहा जाता है।
अधिवक्ता समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वास्तव में शांति-व्यवस्था की समाप्ति पर समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
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सामान्य सुविधाएं नहीं...हत्या देती है निराशा का संदेश
कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि ज्यादातर जिलों में अधिवक्ता बंधुओं के बैठने के लिए चैंबर आदि की मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं। जनपद न्यायालयों में ज्यादातर अधिवक्ताओं के लिए चैंबर, लाईब्रेरी, वाई-फाई और बैठने की उचित व्यवस्था नहीं है। पार्किंग जैसी छोटी-छोटी सुविधाएं भी अधिवक्ताओं के पास नहीं हैं। इस कारण से अधिवक्ता बंधुओं को काफी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं। अधिवक्ता की हत्या निराशा का संदेश देती है।
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दोस्त की हत्या...भरोसे की नींव को खत्म करने वाला
सिंगोल अल्वी (मुख्य अभियुक्त) को गवाह नंबर एक ने मृतक एडवोकेट समीर का दोस्त, विश्वासपात्र एवं व्यवसायिक साथी बताया है। प्रकरण में एक दोस्त की सुनियोजित साजिश के तहत लालच में निर्मम हत्या की गई है। दोस्त की हत्या करना सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह मानवीय संबंधों के टूटने का सबसे निचला स्तर है। दोस्ती को सबसे पवित्र और चुने हुए रिश्ते के रूप में देखा जाता है। जब कोई दोस्त अपने दोस्त को मारता है, तो वह केवल शरीर को नष्ट नहीं करता है बल्कि भरोसे की नींव को खत्म कर देता है। दोस्त की हत्या यह सिद्ध करती है कि मानव स्वभाव में प्रेम व विश्वास के साथ-साथ अत्यंत अंधेरा और हिंसक पक्ष भी हो सकता है।
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फैसले में इस तरह लिखी कविता
कचहरी की सीढ़ियों पर,
आज सन्नाटा कुछ बोल रहा है,
जहां दलीलों की गूंज थी कल,
वहां खामोशी डोल रही है,
काला कोट जो ढाल बना था,
सच की हर एक लड़ाई में,
वो गिर पड़ा आज जमीन पर,
झूठ की गहरी साजिश में,
कल तक जो कानून था जिंदा,
हर जुर्म को आईना दिखाता था,
आज उसी के रखवाले को,
किसी ने बेरहमी से सुला डाला,
पर ये खून बेकार नहीं जाएगा,
हर बूंद गवाही बन जाएगी,
जो सच दबाने निकले थे,
उनकी साजिश जल जाएगी,
क्योंकि हर वकील की सांसों में,
एक अदालत बसती है,
और मरकर भी वकील की आवाज,
इंसाफ ही रचती है।
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अदालत ने लिखा....मृत्यु दंड दिया जाना एकमात्र उपाय
फैसले में अदालत ने लिखा कि मानवीय जीवन भगवान के द्वारा प्रदत्त बहुत ही सुंदर जीवन है, इसीलिए सभी व्यक्तियों को जीवित रहने का समान अधिकार है। जीवन ईश्वर देता है, तो जीवन केवल ईश्वर ही ले सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की जान ले लेता है, तो ऐसे व्यक्ति को भी कोई जीने का अधिकार नहीं रह जाता है। समाज में ऐसा व्यक्ति दया का पात्र नहीं रह जाता है और चाहे वह कोई भी क्यों न हो, यह न्यायसंगत भी है कि उसे अपनी करनी का वैसा ही फल मिलना ही चाहिए। प्रश्नगत मामले में सिद्धदोषों के द्वारा रुपयों के लालच में पाश्विक तरीके से हत्या की गई है। समाज में किसी अधिवक्ता बंधु की हत्या न हो, इसलिए भी उन्हें मृत्यु दंड दिया जाना एकमात्र उपाय है। अदालत ने अपराध को माना विरल से विरलतम माना है।
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अदालत ने अपने फैसले में लिखा कि अधिवक्ता बंधुओं पर हमला केवल अधिवक्ताओं पर ही हमला नहीं है, बल्कि यह एक संस्था पर हमले के समान है। उस संस्था अर्थात् एडवोकेट बार को सीधे चुनौती देने जैसा है।
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अधिवक्ता समाज में न्याय, लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, इसलिए अधिवक्ताओं को न्याय का प्रहरी भी कहा जाता है।
अधिवक्ता समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वास्तव में शांति-व्यवस्था की समाप्ति पर समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
सामान्य सुविधाएं नहीं...हत्या देती है निराशा का संदेश
कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि ज्यादातर जिलों में अधिवक्ता बंधुओं के बैठने के लिए चैंबर आदि की मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं। जनपद न्यायालयों में ज्यादातर अधिवक्ताओं के लिए चैंबर, लाईब्रेरी, वाई-फाई और बैठने की उचित व्यवस्था नहीं है। पार्किंग जैसी छोटी-छोटी सुविधाएं भी अधिवक्ताओं के पास नहीं हैं। इस कारण से अधिवक्ता बंधुओं को काफी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं। अधिवक्ता की हत्या निराशा का संदेश देती है।
दोस्त की हत्या...भरोसे की नींव को खत्म करने वाला
सिंगोल अल्वी (मुख्य अभियुक्त) को गवाह नंबर एक ने मृतक एडवोकेट समीर का दोस्त, विश्वासपात्र एवं व्यवसायिक साथी बताया है। प्रकरण में एक दोस्त की सुनियोजित साजिश के तहत लालच में निर्मम हत्या की गई है। दोस्त की हत्या करना सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह मानवीय संबंधों के टूटने का सबसे निचला स्तर है। दोस्ती को सबसे पवित्र और चुने हुए रिश्ते के रूप में देखा जाता है। जब कोई दोस्त अपने दोस्त को मारता है, तो वह केवल शरीर को नष्ट नहीं करता है बल्कि भरोसे की नींव को खत्म कर देता है। दोस्त की हत्या यह सिद्ध करती है कि मानव स्वभाव में प्रेम व विश्वास के साथ-साथ अत्यंत अंधेरा और हिंसक पक्ष भी हो सकता है।
फैसले में इस तरह लिखी कविता
कचहरी की सीढ़ियों पर,
आज सन्नाटा कुछ बोल रहा है,
जहां दलीलों की गूंज थी कल,
वहां खामोशी डोल रही है,
काला कोट जो ढाल बना था,
सच की हर एक लड़ाई में,
वो गिर पड़ा आज जमीन पर,
झूठ की गहरी साजिश में,
कल तक जो कानून था जिंदा,
हर जुर्म को आईना दिखाता था,
आज उसी के रखवाले को,
किसी ने बेरहमी से सुला डाला,
पर ये खून बेकार नहीं जाएगा,
हर बूंद गवाही बन जाएगी,
जो सच दबाने निकले थे,
उनकी साजिश जल जाएगी,
क्योंकि हर वकील की सांसों में,
एक अदालत बसती है,
और मरकर भी वकील की आवाज,
इंसाफ ही रचती है।
अदालत ने लिखा....मृत्यु दंड दिया जाना एकमात्र उपाय
फैसले में अदालत ने लिखा कि मानवीय जीवन भगवान के द्वारा प्रदत्त बहुत ही सुंदर जीवन है, इसीलिए सभी व्यक्तियों को जीवित रहने का समान अधिकार है। जीवन ईश्वर देता है, तो जीवन केवल ईश्वर ही ले सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की जान ले लेता है, तो ऐसे व्यक्ति को भी कोई जीने का अधिकार नहीं रह जाता है। समाज में ऐसा व्यक्ति दया का पात्र नहीं रह जाता है और चाहे वह कोई भी क्यों न हो, यह न्यायसंगत भी है कि उसे अपनी करनी का वैसा ही फल मिलना ही चाहिए। प्रश्नगत मामले में सिद्धदोषों के द्वारा रुपयों के लालच में पाश्विक तरीके से हत्या की गई है। समाज में किसी अधिवक्ता बंधु की हत्या न हो, इसलिए भी उन्हें मृत्यु दंड दिया जाना एकमात्र उपाय है। अदालत ने अपराध को माना विरल से विरलतम माना है।

अदालत से सजा के बाद अभियुक्तों को ले जाती पुलिस : वीडियोग्रेब