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Sambhal News: जिला अस्पताल में नहीं हो पा रहे मोतियाबिंद के ऑपरेशन
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संभल। जिला अस्पताल में 2023 से नेत्र चिकित्सक होने के बावजूद मोतियाबिंद के ऑपरेशन नहीं हो रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि अनेकों बार पत्राचार के बावजूद संसाधन नहीं मिल रहे हैं। नेत्र चिकित्सक का कहना है कि ओटी के लिए जो कक्ष आवंटित गया है, वह भी पर्याप्त नहीं है।
जिला अस्पताल 100 बेड का है। इसमें सीटी स्कैन से लेकर अल्ट्रासाउंड तक होता है। ब्लड बैंक का संचालन भी है। नेत्र चिकित्सक डॉ. राजेश कुमार सिंह का कहना है कि उपकरण की कमी है और ओटी ऑपरेशन करने की स्थिति में नहीं है। बताया कि उनकी तैनाती नवंबर 2023 में हुई थी। उसके बाद से लगातार ओटी और उपकरण की मांग की है।
मरीजों की बात की जाए तो हर दिन दो से तीन मोतियाबिंद पीड़ित बुजुर्ग पहुंचते हैं। फिलहाल तो दवाई से ही काम चला रहे हैं। जब समस्या बढ़ती है तो निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराना पड़ता है। बताया कि मोतियाबिंद की दिक्कत 50 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों को होती है। शुरुआत में चश्मा आदि से काम चला लिया जाता है लेकिन समस्या बढ़ती है तो ऑपरेशन ही समाधान होता है। संभल जिले में किसी भी सीएचसी में भी ऑपरेशन की व्यवस्था नहीं है।
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फेको मशीन के लिए पत्राचार चल रहा है। मशीन मिलने के बाद मरीजों को बेहतर और आधुनिक उपचार मिल सकेगा। फेको मशीन अल्ट्रासोनिक तरंगों से आंख के खराब लेंस को छोटे टुकड़ों में तोड़कर निकालती है। इसके बाद कृत्रिम लेंस लगाया जाता है। इस प्रक्रिया में चीरा नहीं लगाना पड़ता और मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाता है।
डाॅ. राजेश कुमार सिंह, नेत्र रोग विशेषज्ञ
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जिला अस्पताल 100 बेड का है। इसमें सीटी स्कैन से लेकर अल्ट्रासाउंड तक होता है। ब्लड बैंक का संचालन भी है। नेत्र चिकित्सक डॉ. राजेश कुमार सिंह का कहना है कि उपकरण की कमी है और ओटी ऑपरेशन करने की स्थिति में नहीं है। बताया कि उनकी तैनाती नवंबर 2023 में हुई थी। उसके बाद से लगातार ओटी और उपकरण की मांग की है।
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मरीजों की बात की जाए तो हर दिन दो से तीन मोतियाबिंद पीड़ित बुजुर्ग पहुंचते हैं। फिलहाल तो दवाई से ही काम चला रहे हैं। जब समस्या बढ़ती है तो निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराना पड़ता है। बताया कि मोतियाबिंद की दिक्कत 50 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों को होती है। शुरुआत में चश्मा आदि से काम चला लिया जाता है लेकिन समस्या बढ़ती है तो ऑपरेशन ही समाधान होता है। संभल जिले में किसी भी सीएचसी में भी ऑपरेशन की व्यवस्था नहीं है।
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फेको मशीन के लिए पत्राचार चल रहा है। मशीन मिलने के बाद मरीजों को बेहतर और आधुनिक उपचार मिल सकेगा। फेको मशीन अल्ट्रासोनिक तरंगों से आंख के खराब लेंस को छोटे टुकड़ों में तोड़कर निकालती है। इसके बाद कृत्रिम लेंस लगाया जाता है। इस प्रक्रिया में चीरा नहीं लगाना पड़ता और मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाता है।
डाॅ. राजेश कुमार सिंह, नेत्र रोग विशेषज्ञ