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Sambhal News: अंग्रेजी हुकूमत की गोली भी न दबा सकी गुन्नौर के वीरों की आवाज

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Sat, 15 Aug 2026 01:43 AM IST
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Even the bullets of British rule could not silence the voices of the heroes of Gunnaur.
जुनावई। अंग्रेजी शासनकाल के जुल्मों के खिलाफ जब पूरा देश उबल रहा था, तब गुन्नौर तहसील परगना असदपुर क्षेत्र के जगन्नाथपुर गांव में स्वतंत्रता संग्राम का आज से 96 वर्ष पहले बड़ा केंद्र बन गया था। नदरौली गांव के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद किशन लाल सिंह के पौत्र धर्मेंद्र कुमार यादव ने क्षेत्र के गौरवशाली और संघर्षपूर्ण इतिहास के पन्ने पलटते हुए भारत की आजादी की लड़ाई की एक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना की यादें साझा की हैं।
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नदरौली गांव के धर्मेंद्र कुमार यादव ने बताया कि 30 जनवरी 1931 को उनके दादा किशन लाल सिंह सैकड़ों लोगों के साथ तत्कालीन बदायूं जनपद जो कि अब संभल जनपद के गुन्नौर तहसील क्षेत्र के जगन्नाथपुर की सबसे बड़ी साप्ताहिक बाजार में आंदोलन कारियों के साथ पहुंच गये और देशवासियों में आजादी की अलख जगाने के लिए वे एक विशाल शीशम के पेड़ पर चढ़ गए। भारतीयों को अंग्रेजों के खिलाफ जागरूक करने लगे।
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इसी दौरान वहां बंदूकधारियों और अंग्रेजी सिपाहियों का दस्ता आ धमका। सिपाहियों ने किशन लाल सिंह को भाषण देने से रोका और बदतमीजी की लेकिन निडर क्रांतिकारी किशन लाल ने अंग्रेजी हुकूमत को ललकारते हुए सिपाहियों को वहां से भाग जाने को कहा। सिपाहियों की गुस्ताखी से आक्रोशित होकर वे पेड़ से नीचे उतरे और एक अंग्रेजी सिपाही के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
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थप्पड़ से बौखलाए अंग्रेजी सिपाही ने दादा किशन लाल पर 31 जनवरी 1931 को गोली चला दी, जिससे साप्ताहिक बाजार परिसर में ही वे देश के लिए शहीद हो गए। किशन लाल सिंह की शहादत की खबर आग की तरह फैली और मौके पर मौजूद क्रांतिकारी व ग्रामीण भड़क उठे।
दादा किशन लाल को गोली लगते ही क्षेत्र के विभिन्न गांवों के दर्जनों वीर सपूत अंग्रेजों से भिड़ गए। आक्रोशित सैकड़ों आंदोलनकारी अंग्रेजी फौज पर टूट पड़े। क्रांतिकारियों के रोद्र रूप को देखकर अंग्रेजी सिपाही जान बचाकर मौके से भाग खड़े हुए। आंदोलनकारियों ने पूरे बाजार में भगदड़ मचा दी। दुकानदार अपना सामान छोड़ कर भाग निकले और क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई। अंग्रेजी प्रशासन ने बाद में क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने के काफी प्रयास किए, लेकिन वीर सेनानी इधर-उधर छिपकर अपनी रणनीति बनाते रहे।
वहीं शहीद किशनलाल की मौत के बाद पुत्र यदुनाथ एवं रघुनाथ दोनों भाइयों ने सन् 1932 में कमान को संभालते हुए पिता किशनलाल की लड़ाई को पूरा करने के लिए आजादी मुहिम छेड़ दी। वहीं कमान संभालते के उपरांत आंदोलन कारियों को साथ लेकर जगह जगह आजादी की अलख जगाने के लगे। तभी कुछ दिन बाद दोनों भाइयों को अंग्रेजी पुलिस के द्वारा गिरफ्तार कर लिया।
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भगदड़ मचने से उखड़ गया था जगन्नाथपुर की बाजार
जुनावई। आज से 96 वर्ष पूर्व घटी इस ऐतिहासिक घटना के बाद जगन्नाथपुर की तत्कालीन सबसे बड़ी साप्ताहिक बाजार पूरी तरह उखड़ गया। इसके बाद जुनावई गांव के रहने वाले कृष्ण स्वरूप माथुर एवं भगवत स्वरूप माथुर ने स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान और क्षेत्र की सहूलियत के लिए अपनी निजी भूमि पर बाजार लगवाना शुरू किया। तभी से जगन्नाथपुर की ऐतिहासिक बाजार जुनावई में स्थानांतरित हो गई, जहां पशु, किराना और हरी सब्जियों की साप्ताहिक बाजार लगने लगा।
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आज अंतरप्रांतीय व्यापार का केंद्र बनी जुनावई बाजार
वर्तमान में जुनावई की इस ऐतिहासिक बाजार का संचालन पूर्व मंत्री अजीत कुमार यादव की देखभाल में होता है। समय के साथ यह बाजार एक विशाल व्यावसायिक केंद्र बन चुका है। यहां हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई जिलों से किसान व पशु व्यापारी बड़े पैमाने पर पशुओं की खरीद-फरोख्त करने आते हैं। वहीं, क्षेत्रीय नागरिक अपने घरों के लिए हफ्ते भर की सब्जी व राशन सामग्री इसी ऐतिहासिक बाजार से ले जाते हैं। शहीद किशन लाल सिंह की शहादत की गाथा आज भी जुनावई बाजार की मिट्टी में रची-बसी है।
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आंदोलन में इन क्रांतिकारियों का रहा सहयोग
शहीद किशनलाल की अंग्रेजी पुलिस द्वारा गोली मारने के बाद क्रांतिकारी गांव चबूतरा के डोरीलाल सिंह।
बैरपुर महराजी: रतनलाल सिंह, उल्फत सिंह, डोरी लाल सिंह, मणिकावली के मुरारीलाल सिंह, सिंघौला पुख्ता के बाबूराम सिंह, खेड़ामानी के जसराम सिंह, काशीपुर के जोखीराम, रामफल सिंह, नंदलाल, जय नारायण, हर नारायण, उदयप्रकाश, गंगा सहाय, शोभाराम, टीकमसिंह, रामनगर टप्पा वैश के बलवंत सिंह, करिया के होती लाल, एहरोला नवाजी से रघुराज सिंह, बालकिशन।
नगला अजमेरी से छन्नू सिंह, गंगासहाय, रघुवीर सिंह, सैफुल्लाह खां, विक्रम सिंह, लतीफपुर टोड़ी से राम प्रसाद, रनसिंह, धनीपुर से रामलाल, होती लाल, दीपा नगला से साधू सिंह, लहरा नगला श्याम से सीताराम, झम्मन सिंह, रजवाना से ज्वाली सिंह, श्याम लाल।

सिकरोरा खादर से मंगल देव, लालसिंह, तोताराम, प्यारेलाल, श्यामलाल, मुंशी सिंह, बिलासपुर से उमराव सिंह, पित्तारी लाल।
पतरिया से मंगली सिंह, देवर कंचन से रामस्वरूप, रिबाड़ा से राम सिंह, जुनावई से मवानी सिंह, रघुवीर सिंह, बंशीधर सिंह, दबथरा से रामचंद्र, नदरौली से रघुनाथ सिंह, यदुनाथ सिंह।
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