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Sambhal News: 101 करोड़ की जमीन के फर्जीवाड़े में पूर्व पालिकाध्यक्ष से ढाई घंटे पूछताछ
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संभल। पालिका क्षेत्र के तख्तगुशाईन में 101 करोड़ रुपये की ग्राम सभा की जमीन पर कब्जा करने के मामले में पुलिस की जांच शुरू हो गई है। बुधवार को पालिका के पूर्व अध्यक्ष कौसर अहमद से पुलिस ने संभल कोतवाली में करीब ढाई घंटे पूछताछ की गई। इस दौरान हाईकोर्ट में दायर याचिका वापस करने को लेकर सवाल रहे।
उनसे पूछा गया कि किन कारणों में यह याचिका वापस ली और इसके पीछे का कारण क्या था। पालिका अपने ही केस से क्यों पीछे हटी। इसी तरह के अलग-अलग सवाल पूछे गए। पुलिस ने सभी सवाल के जवाब को दर्ज किया है। इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कराने वाले लेखपाल स्पर्श गुप्ता के भी बयान पुलिस ने दर्ज किए हैं।
एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई का कहना है कि मामले की जांच पड़ताल गहनता से चल रही है। बयान दर्ज करने के साथ संदिग्धों से पूछताछ चल रही है। इसी क्रम में पालिका के पूर्व अध्यक्ष कौसर अहमद से पूछताछ की गई है। यह पूछताछ आगे भी जारी रहेगी।
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संभल-मुरादाबाद मार्ग पर स्थित 38 बीघा जमीन पर कब्जे का खेल वर्ष 2008 से शुरू हुआ था। जब डीडीसी चकबंदी ने पालिका के खिलाफ आदेश किया और सईदुल रहमान के 12 जुलाई 1967 के फर्जी पट्टा अभिलेख को आधार बनाकर मालिकाना हक दे दिया था। हालांकि इस आदेश के खिलाफ पालिका के तत्कालीन ईओ वीके झा 18 अप्रैल 2008 को हाईकोर्ट चले गए थे। उन्होंने याचिका संख्या बी-341 / 2008 हाईकोर्ट में दायर की। इस मामले में पैरवी प्रभावी नहीं हो सकी। नतीजतन मामला लंबित पड़ा रहा। वर्ष 2011 से पालिका में तैनात हुए ईओ राजकुमार गुप्ता ने वर्ष 2013 में यह याचिका वापस ले ली और मालिकाना हक सईदुल रहमान के पक्ष में चला गया। यहां से जमीन का बंदरबांट किया गया और बिक्री की गई। वर्तमान में ज्यादातर जमीन तो खाली पड़ी है। कुछ जमीन पर व्यवसायिक भवन बना लिए गए हैं। इन भवन स्वामियों को प्रशासन की ओर से नोटिस दिए गए हैं। खाली जमीन पर ग्राम समाज का बोर्ड लगा दिया गया है।
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नियमों को ठेंगा दिखाया और अपनी ही संपत्ति को दूसरों के हवाले कर दिया
पालिका के तत्कालीन ईओ राजकुमार की भूमिका तो वर्ष 2013 में सामने आई। इससे पहले तत्कालीन उपसंचालक चकबंदी खेम सिंह खड़क ने पालिका द्वारा पेश किए गए दस्तावेज को आधार नहीं माना। बल्कि उप संचालक चकबंदी ने सईदुल रहमान द्वारा 12 जुलाई 1967 के फर्जी पट्टा अभिलेख जो दिखाया गया। वह आधार मान लिया। जबकि पालिका का दावा हमेशा से यह रहा कि जो दस्तावेज पट्टे का दिखाया गया है वह फर्जी है। उसका रिकॉर्ड पालिका में नहीं है। इसके बाद भी उप संचालक चकबंदी ने 15 फरवरी 2008 को नामांतरण आदेश पारित कर दिया था। इसके बाद ही पालिका हाईकोर्ट तक पहुंची थी। लेकिन तत्कालीन ईओ राजकुमार गुप्ता ने वापस ले लिया था। इसमें पालिका के तत्कालीन मानचित्रक शाहबुद्दीन और पैरोकार माजिद खान भी भूमिका मिली है।
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अधिकारी करते रहे जांच लेकिन आरोपियों तक नहीं पहुंच रही थी आंच
इस सरकारी जमीन पर कब्जे के मामले में लगातार शिकायतें दर्ज होती रहीं लेकिन कार्रवाई आगे नहीं बढ़ रही थी। आरोपियों तक प्रशासन की जांच ही नहीं पहुंच रही थी। जबकि मामला स्पष्ट था कि सरकारी व्यवस्था के साथ मिलकर जमीन पर कब्जा हुआ है। इसमें करोड़ों रुपये की जमीन का बंदरबांट किया गया है। पालिका के तत्कालीन ईओ रामपाल सिंह और डिप्टी कलेक्टर रमेशबाबू ने भी जांच रिपोर्ट में कहा था कि सरकारी जमीन को कब्जा किया गया है। अब मामला डीएम अंकित खंडेलवाल के सामने पहुंचा तो उन्होंने तत्काल इसकी सुनवाई कराई और निर्णय ग्राम समाज के पक्ष में हो सका है।
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पुराने वाहन खरीदकर पालिका के 84 लाख रुपये गबन किए गए थे, फिर भी बच गए थे ईओ
पालिका में वर्ष 2012 से 2017 तक पांच वाहन खरीदे गए थे। इनकी कीमत 84 लाख रुपये थी जो पालिका के खजाने से निकाले भी गए। पूर्व सभासद मुकेश शुक्ला ने इस मामले में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद जांच हुई और गबन पकड़ा गया। इस गबन में हैरानी करने वाली बात यह सामने आई थी कि जिन वाहनों को रिकॉर्ड में दिखाया गया था वह व्यक्तिगत नाम पर थे। जबकि नियमानुसार पालिका के नाम दर्ज होने चाहिए थे। इसमें यह भी सामने आया था कि जिस तिथि के वाहन खरीदे हुए थे इसके बाद वाहन खरीदने का प्रस्ताव तैयार हुआ था। इसमें पूर्व अध्यक्ष कौसर अहमद और ईओ पर 42-42 लाख रुपये जमा करने का आदेश हुआ था। पूर्व अध्यक्ष के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई थी। तत्कालीन ईओ रामपाल ने यह रिपोर्ट दर्ज कराई थी लेकिन इसमें खेल यह किया गया था कि ईओ और अन्य कर्मचारी व ठेकेदार आरोपी नहीं बनाए गए थे। जबकि प्रशासन की जांच में ईओ, कर्मचारी व ठेकेदार भी आरोपी थे। पुलिस ने चार्जशीट भी दाखिल की लेकिन आरोपी कोई नहीं बनाया।
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सरकारी जमीन कब्जाने के मामले में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद से ही जांच तेजी से कराई जा रही है। पूछताछ करने के साथ ही बयान भी दर्ज किए जा रहे हैं। विवेचना सीओ संभल को दी गई है। पूछताछ और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़ रही है। इसी क्रम में पालिका के पूर्व अध्यक्ष को भी पूछताछ के लिए कोतवाली बुलाया गया था।
कृष्ण कुमार बिश्नोई, एसपी, संभल
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उनसे पूछा गया कि किन कारणों में यह याचिका वापस ली और इसके पीछे का कारण क्या था। पालिका अपने ही केस से क्यों पीछे हटी। इसी तरह के अलग-अलग सवाल पूछे गए। पुलिस ने सभी सवाल के जवाब को दर्ज किया है। इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कराने वाले लेखपाल स्पर्श गुप्ता के भी बयान पुलिस ने दर्ज किए हैं।
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एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई का कहना है कि मामले की जांच पड़ताल गहनता से चल रही है। बयान दर्ज करने के साथ संदिग्धों से पूछताछ चल रही है। इसी क्रम में पालिका के पूर्व अध्यक्ष कौसर अहमद से पूछताछ की गई है। यह पूछताछ आगे भी जारी रहेगी।
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संभल-मुरादाबाद मार्ग पर स्थित 38 बीघा जमीन पर कब्जे का खेल वर्ष 2008 से शुरू हुआ था। जब डीडीसी चकबंदी ने पालिका के खिलाफ आदेश किया और सईदुल रहमान के 12 जुलाई 1967 के फर्जी पट्टा अभिलेख को आधार बनाकर मालिकाना हक दे दिया था। हालांकि इस आदेश के खिलाफ पालिका के तत्कालीन ईओ वीके झा 18 अप्रैल 2008 को हाईकोर्ट चले गए थे। उन्होंने याचिका संख्या बी-341 / 2008 हाईकोर्ट में दायर की। इस मामले में पैरवी प्रभावी नहीं हो सकी। नतीजतन मामला लंबित पड़ा रहा। वर्ष 2011 से पालिका में तैनात हुए ईओ राजकुमार गुप्ता ने वर्ष 2013 में यह याचिका वापस ले ली और मालिकाना हक सईदुल रहमान के पक्ष में चला गया। यहां से जमीन का बंदरबांट किया गया और बिक्री की गई। वर्तमान में ज्यादातर जमीन तो खाली पड़ी है। कुछ जमीन पर व्यवसायिक भवन बना लिए गए हैं। इन भवन स्वामियों को प्रशासन की ओर से नोटिस दिए गए हैं। खाली जमीन पर ग्राम समाज का बोर्ड लगा दिया गया है।
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नियमों को ठेंगा दिखाया और अपनी ही संपत्ति को दूसरों के हवाले कर दिया
पालिका के तत्कालीन ईओ राजकुमार की भूमिका तो वर्ष 2013 में सामने आई। इससे पहले तत्कालीन उपसंचालक चकबंदी खेम सिंह खड़क ने पालिका द्वारा पेश किए गए दस्तावेज को आधार नहीं माना। बल्कि उप संचालक चकबंदी ने सईदुल रहमान द्वारा 12 जुलाई 1967 के फर्जी पट्टा अभिलेख जो दिखाया गया। वह आधार मान लिया। जबकि पालिका का दावा हमेशा से यह रहा कि जो दस्तावेज पट्टे का दिखाया गया है वह फर्जी है। उसका रिकॉर्ड पालिका में नहीं है। इसके बाद भी उप संचालक चकबंदी ने 15 फरवरी 2008 को नामांतरण आदेश पारित कर दिया था। इसके बाद ही पालिका हाईकोर्ट तक पहुंची थी। लेकिन तत्कालीन ईओ राजकुमार गुप्ता ने वापस ले लिया था। इसमें पालिका के तत्कालीन मानचित्रक शाहबुद्दीन और पैरोकार माजिद खान भी भूमिका मिली है।
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अधिकारी करते रहे जांच लेकिन आरोपियों तक नहीं पहुंच रही थी आंच
इस सरकारी जमीन पर कब्जे के मामले में लगातार शिकायतें दर्ज होती रहीं लेकिन कार्रवाई आगे नहीं बढ़ रही थी। आरोपियों तक प्रशासन की जांच ही नहीं पहुंच रही थी। जबकि मामला स्पष्ट था कि सरकारी व्यवस्था के साथ मिलकर जमीन पर कब्जा हुआ है। इसमें करोड़ों रुपये की जमीन का बंदरबांट किया गया है। पालिका के तत्कालीन ईओ रामपाल सिंह और डिप्टी कलेक्टर रमेशबाबू ने भी जांच रिपोर्ट में कहा था कि सरकारी जमीन को कब्जा किया गया है। अब मामला डीएम अंकित खंडेलवाल के सामने पहुंचा तो उन्होंने तत्काल इसकी सुनवाई कराई और निर्णय ग्राम समाज के पक्ष में हो सका है।
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पुराने वाहन खरीदकर पालिका के 84 लाख रुपये गबन किए गए थे, फिर भी बच गए थे ईओ
पालिका में वर्ष 2012 से 2017 तक पांच वाहन खरीदे गए थे। इनकी कीमत 84 लाख रुपये थी जो पालिका के खजाने से निकाले भी गए। पूर्व सभासद मुकेश शुक्ला ने इस मामले में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद जांच हुई और गबन पकड़ा गया। इस गबन में हैरानी करने वाली बात यह सामने आई थी कि जिन वाहनों को रिकॉर्ड में दिखाया गया था वह व्यक्तिगत नाम पर थे। जबकि नियमानुसार पालिका के नाम दर्ज होने चाहिए थे। इसमें यह भी सामने आया था कि जिस तिथि के वाहन खरीदे हुए थे इसके बाद वाहन खरीदने का प्रस्ताव तैयार हुआ था। इसमें पूर्व अध्यक्ष कौसर अहमद और ईओ पर 42-42 लाख रुपये जमा करने का आदेश हुआ था। पूर्व अध्यक्ष के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई थी। तत्कालीन ईओ रामपाल ने यह रिपोर्ट दर्ज कराई थी लेकिन इसमें खेल यह किया गया था कि ईओ और अन्य कर्मचारी व ठेकेदार आरोपी नहीं बनाए गए थे। जबकि प्रशासन की जांच में ईओ, कर्मचारी व ठेकेदार भी आरोपी थे। पुलिस ने चार्जशीट भी दाखिल की लेकिन आरोपी कोई नहीं बनाया।
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सरकारी जमीन कब्जाने के मामले में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद से ही जांच तेजी से कराई जा रही है। पूछताछ करने के साथ ही बयान भी दर्ज किए जा रहे हैं। विवेचना सीओ संभल को दी गई है। पूछताछ और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़ रही है। इसी क्रम में पालिका के पूर्व अध्यक्ष को भी पूछताछ के लिए कोतवाली बुलाया गया था।
कृष्ण कुमार बिश्नोई, एसपी, संभल