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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sambhal News ›   The divine meeting of Nimai and Nitai in the pastimes of Chaitanya Mahaprabhu.

Sambhal News: चैतन्य महाप्रभु की लीला में हुआ दिव्य निमाई-निताई मिलन

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Tue, 28 Jul 2026 02:40 AM IST
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The divine meeting of Nimai and Nitai in the pastimes of Chaitanya Mahaprabhu.
गवां। क्षेत्र के श्री हरिबाबा बांध धाम चल रहे सात दिवसीय गुरु पूजा महोत्सव में सोमवार को पांचवें दिन चैतन्य महाप्रभु की लीला मंचन में निताई-निमाई मिलन लीला का मंचन किया गया। मंच से लीला के व्यास मुरारी महाराज ने लीला के दौरान कहा प्रेम ही भक्ति है और भक्ति ही जीवन।
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सुबह 9 बजे से 12 बजे तक आयोजित लीला प्रसंग में सबसे हृदयस्पर्शी दृश्य तब सामने आया, जब निमाई और निताई का ऐतिहासिक मिलन दिखाया गया। अलौकिक मिलन को देखकर पंडाल में उपस्थित सैकड़ों भक्तों की आंखें नम हो गईं और पूरा वातावरण निताई-गौर हरि बोल के जयकारों से गूंज उठा।
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लीला के अनुसार, यह मिलन केवल दो संतों का मिलन नहीं था, बल्कि दो युगों की करुणा का संगम था। एक ओर नवद्वीप के चांद, विश्वंभर मिश्र यानी निमाई पंडित थे, जिनके भीतर कृष्ण प्रेम की अगाध ज्वाला धधक रही थी। दूसरी ओर, अवधूत वेशधारी, करुणा के सागर नित्यानंद प्रभु थे, जो निमाई की खोज में दर-दर भटक रहे थे।
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लीला में दिखाया गया कि नित्यानंद प्रभु नवद्वीप पहुंचते हैं और नंदन आचार्य के घर ठहरते हैं। उन्हें सपने में भगवान का आदेश मिलता है कि उनका प्रिय साथी आ चुका है। उधर, निमाई पंडित को भी अंतर प्रेरणा होती है कि कोई महापुरुष उनके घर आया है। वे अपने भक्तों के साथ नंदन आचार्य के घर पहुंचते हैं।
मंच पर जैसे ही निमाई ने निताई को देखा, दोनों एक-दूसरे को देखकर अचंभित रह गए। पहले दर्शन में ही दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया। निमाई ने संस्कृत के एक श्लोक का पाठ किया। श्लोक को सुनते ही नित्यानंद प्रभु समझ गए कि निमाई स्वयं भगवान हैं और मूर्छित हो गए। इसके बाद निमाई ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया।
लीला का मंचन कर रहे वृंदावन गौरांग कृष्ण लीला मंडल के कलाकारों ने इस भाव को बड़ी ही जीवंतता से प्रस्तुत किया। निमाई की भूमिका निभा रहे कलाकार की आंखों से अश्रुधारा और निताई बने कलाकार का दंडवत प्रणाम देखकर हर किसी की आंख नम हो गई।


मुक्ति की प्यास का नाम मुमुक्षा
गवां। क्षेत्र के श्री हरिबाबा बांध धाम पर चल रहे गुरु पूर्णिमा महोत्सव में सोमवार को पांचवें दिन की श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य दिनेश चंद्र शास्त्री ने प्रवचन करते हुए बताया कि मुक्ति की प्यास का नाम मुमुक्षा है। भगवान की प्राप्ति की लालसा का नाम भक्ति है और जानने की प्यास को जिज्ञासा कहते हैं। उन्होंने बताया जिज्ञासु और मुमुक्षु दोनों ही साधक की श्रेणी में आते हैं। सत्य की खोज में लगे रहते हैं, जबकि भक्त स्वयं सिद्ध होता है। भक्त को किसी अन्य साधना की आवश्यकता नहीं। उसकी भक्ति ही उसे सिद्धावस्था तक ले जाती है। संवाद
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