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Siddharthnagar News: मानसून की लेटलतीफी से पिछड़ी धान की रोपाई
Fri, 07 Aug 2026 03:00 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 07 Aug 2026 03:00 AM IST
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खेत में सूख रही फसल। संवाद
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संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। तराई का किसान इन दिनों खेत से ज्यादा आसमान को निहार रहा है। बादल आते हैं, उम्मीद जगाते हैं और बिना बरसे लौट जाते हैं। नतीजा यह है कि जिले में धान की रोपाई लगभग ठप पड़ी है।
सामान्य वर्षों में छह जुलाई तक जहां 80 से 85 प्रतिशत क्षेत्र में रोपाई पूरी हो जाती थी, वहीं इस बार अभी पांच प्रतिशत भी रोपाई नहीं हो पाई है। मानसून की इस बेरुखी केवल रोपाई को प्रभावित नहीं कर रही है बल्कि किसानों की सालभर की मेहनत और आमदनी पर भी बड़ा संकट बढ़ा रही है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि रोपाई में अब तक हुई देरी से संभावित उत्पादन पर 10 से 15 प्रतिशत तक असर पड़ने की आशंका बन चुकी है। यदि बारिश में हर सप्ताह और देरी होती है तो उत्पादन में लगभग पांच प्रतिशत की अतिरिक्त गिरावट आ सकती है।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक धान की फसल समय की बेहद संवेदनशील होती है। रोपाई जितनी देर से होगी, पौधों को बढ़ने का समय उतना ही कम मिलेगा। इसके कारण बालियां पूरी तरह विकसित नहीं हो पाएंगी और दानों में चावल का भराव भी प्रभावित होगा। ऐसे में खेत हरे जरूर दिखेंगे लेकिन उपज किसानों की उम्मीदों के अनुरूप नहीं होगी।
जनपद नेपाल बाॅर्डर से लगा हुआ है और इसकी गिनती प्रदेश के तराई इलाके में की जाती है। यहां की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। 80 प्रतिशत से अधिक आबादी के आमदनी का मुख्य जरिया खेती है। सिंचाई के संसाधन नाकाफी है। किसान पूरी तरह से बारिश पर निर्भर हैलेकिन इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक मानसून बहुत ही कमजोर है। इसलिए जिले में धान की रोपाई जो अबतक समाप्ति की ओर से रहती थी। वह अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। कारण बारिश न होने से किसान मायूस हैं। लगभग 5 प्रतिशत रोपाई हुई है, वह साधन संपन्न किसान ही कर पाएं हैं।
वहीं, माध्यम श्रेणी के किसानों का एक बड़ा तबका आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठा है। उनकी चिंता अब हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती जा रही है। जनपद में मानसून की सुस्त चाल ने खेती का पूरा कैलेंडर बिगाड़ दिया है।
किसानों का दर्द : सिसवा बुजुर्ग गांव निवासी किसान सूर्यप्रकाश, चिन्नू यादव, सिंगिया निवासी छांगुर यादव, पिन्टू पाठक आदि का कहना है कि गांवों में किसान रोज मौसम का पूर्वानुमान देख रहे हैं लेकिन बादल आते हैं और बिना बरसे लौट जाते हैं। कई किसानों ने नर्सरी तैयार कर ली है लेकिन खेतों में पानी नहीं होने से रोपाई शुरू नहीं हो पा रही। जिन किसानों के पास सिंचाई के सीमित साधन हैं, वे डीजल खर्च कर खेत तैयार करने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में लागत बढ़ने और उत्पादन घटने की दोहरी चिंता किसानों को सता रही है।
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सिद्धार्थनगर। तराई का किसान इन दिनों खेत से ज्यादा आसमान को निहार रहा है। बादल आते हैं, उम्मीद जगाते हैं और बिना बरसे लौट जाते हैं। नतीजा यह है कि जिले में धान की रोपाई लगभग ठप पड़ी है।
सामान्य वर्षों में छह जुलाई तक जहां 80 से 85 प्रतिशत क्षेत्र में रोपाई पूरी हो जाती थी, वहीं इस बार अभी पांच प्रतिशत भी रोपाई नहीं हो पाई है। मानसून की इस बेरुखी केवल रोपाई को प्रभावित नहीं कर रही है बल्कि किसानों की सालभर की मेहनत और आमदनी पर भी बड़ा संकट बढ़ा रही है।
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कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि रोपाई में अब तक हुई देरी से संभावित उत्पादन पर 10 से 15 प्रतिशत तक असर पड़ने की आशंका बन चुकी है। यदि बारिश में हर सप्ताह और देरी होती है तो उत्पादन में लगभग पांच प्रतिशत की अतिरिक्त गिरावट आ सकती है।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक धान की फसल समय की बेहद संवेदनशील होती है। रोपाई जितनी देर से होगी, पौधों को बढ़ने का समय उतना ही कम मिलेगा। इसके कारण बालियां पूरी तरह विकसित नहीं हो पाएंगी और दानों में चावल का भराव भी प्रभावित होगा। ऐसे में खेत हरे जरूर दिखेंगे लेकिन उपज किसानों की उम्मीदों के अनुरूप नहीं होगी।
जनपद नेपाल बाॅर्डर से लगा हुआ है और इसकी गिनती प्रदेश के तराई इलाके में की जाती है। यहां की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। 80 प्रतिशत से अधिक आबादी के आमदनी का मुख्य जरिया खेती है। सिंचाई के संसाधन नाकाफी है। किसान पूरी तरह से बारिश पर निर्भर हैलेकिन इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक मानसून बहुत ही कमजोर है। इसलिए जिले में धान की रोपाई जो अबतक समाप्ति की ओर से रहती थी। वह अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। कारण बारिश न होने से किसान मायूस हैं। लगभग 5 प्रतिशत रोपाई हुई है, वह साधन संपन्न किसान ही कर पाएं हैं।
वहीं, माध्यम श्रेणी के किसानों का एक बड़ा तबका आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठा है। उनकी चिंता अब हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती जा रही है। जनपद में मानसून की सुस्त चाल ने खेती का पूरा कैलेंडर बिगाड़ दिया है।
किसानों का दर्द : सिसवा बुजुर्ग गांव निवासी किसान सूर्यप्रकाश, चिन्नू यादव, सिंगिया निवासी छांगुर यादव, पिन्टू पाठक आदि का कहना है कि गांवों में किसान रोज मौसम का पूर्वानुमान देख रहे हैं लेकिन बादल आते हैं और बिना बरसे लौट जाते हैं। कई किसानों ने नर्सरी तैयार कर ली है लेकिन खेतों में पानी नहीं होने से रोपाई शुरू नहीं हो पा रही। जिन किसानों के पास सिंचाई के सीमित साधन हैं, वे डीजल खर्च कर खेत तैयार करने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में लागत बढ़ने और उत्पादन घटने की दोहरी चिंता किसानों को सता रही है।