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Siddharthnagar News: जानलेवा हुई डंठल की आग... खेत-खलिहान से राह तक खतरा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Thu, 23 Apr 2026 02:39 AM IST
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सिद्धार्थनगर। गेहूं कटाई के बाद डंठल जलाने की प्रथा अब सीधे मौत का कारण बन रही है। देवरिया में पैना गांव निवासी श्रीकिशुन निषाद की झोपड़ी में आग लगने से उसकी पत्नी बचिया देवी (40) पैर से दिव्यांग होने के कारण भाग नहीं सकीं और झोपड़ी में ही झुलसकर उसकी माैत हो गई।
वहीं, देवरिया में ही खेत से उठी आग सड़क तक पहुंची, धुएं के घने गुबार ने पलभर में दृश्यता खत्म कर दी और दो बाइक आपस में भिड़ गईं, जिसमें एक युवक जिंदा जल गया। इसके साथ ही 12 अप्रैल को बर्फ विक्रेता आग की लपटों की चपेट में आकर गंभीर रूप से झुलसा था, जिसका अब भी इलाज चल रहा है। यह हादसा सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि उस खतरनाक हकीकत का संकेत है जो पूरे पूर्वांचल में तेजी से फैल रही है।
सिद्धार्थनगर में हालात गंभीर हैं। कटाई के दौरान ही सैकड़ों बीघे फसल डंठल की आग में जल चुकी है। अब भी रोज कहीं न कहीं आग भड़क रही है। खेतों से उठती लपटें हवा के साथ गांवों, बस्तियों और सड़कों तक पहुंच रही हैं। यानी अब यह समस्या खेत तक सीमित नहीं बल्कि यह जनसुरक्षा का सीधा खतरा बन चुकी है।
स्थानीय किसानों की मजबूरी भी कम नहीं है। बांसी और इटवा क्षेत्र के कई किसानों का कहना है कि मजदूर नहीं मिलती, मशीनें महंगी हैं, और अगली फसल की जल्दी रहती है। ऐसे में डंठल जलाना ही सबसे आसान रास्ता बचता है। एक बड़े किसान ने साफ कहा कि हैप्पी सीडर या मल्चर किराये पर भी लें तो खर्च इतना बढ़ जाता है कि मुनाफा खत्म हो जाता है।
जलाने में न समय लगता है और न ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। हालांकि किसान यह भी मानते हैं कि खतरा बढ़ गया है। पहले इतना नुकसान नहीं होता था, अब हवा तेज है, सूखा ज्यादा है, आग काबू से बाहर हो जाती है।
कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञ डॉ. मारकंडेय सिंह के मुताबिक, डंठल जलाने से मिट्टी की ऊपरी परत का तापमान अचानक बढ़ जाता है, जिससे उसमें मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और केंचुए मर जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और अगले सीजन में उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि एक एकड़ डंठल जलाने से मिट्टी के हजारों रुपये के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें बाद में खाद और उर्वरक डालकर पूरा करना पड़ता है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर असर भी गहरा है। डंठल जलाने से निकलने वाला धुआं वायु में सूक्ष्म कण (पीएम 2.5) बढ़ाता है। जो फेफड़ों में जाकर गंभीर बीमारियां पैदा करता है।
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वहीं, देवरिया में ही खेत से उठी आग सड़क तक पहुंची, धुएं के घने गुबार ने पलभर में दृश्यता खत्म कर दी और दो बाइक आपस में भिड़ गईं, जिसमें एक युवक जिंदा जल गया। इसके साथ ही 12 अप्रैल को बर्फ विक्रेता आग की लपटों की चपेट में आकर गंभीर रूप से झुलसा था, जिसका अब भी इलाज चल रहा है। यह हादसा सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि उस खतरनाक हकीकत का संकेत है जो पूरे पूर्वांचल में तेजी से फैल रही है।
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सिद्धार्थनगर में हालात गंभीर हैं। कटाई के दौरान ही सैकड़ों बीघे फसल डंठल की आग में जल चुकी है। अब भी रोज कहीं न कहीं आग भड़क रही है। खेतों से उठती लपटें हवा के साथ गांवों, बस्तियों और सड़कों तक पहुंच रही हैं। यानी अब यह समस्या खेत तक सीमित नहीं बल्कि यह जनसुरक्षा का सीधा खतरा बन चुकी है।
स्थानीय किसानों की मजबूरी भी कम नहीं है। बांसी और इटवा क्षेत्र के कई किसानों का कहना है कि मजदूर नहीं मिलती, मशीनें महंगी हैं, और अगली फसल की जल्दी रहती है। ऐसे में डंठल जलाना ही सबसे आसान रास्ता बचता है। एक बड़े किसान ने साफ कहा कि हैप्पी सीडर या मल्चर किराये पर भी लें तो खर्च इतना बढ़ जाता है कि मुनाफा खत्म हो जाता है।
जलाने में न समय लगता है और न ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। हालांकि किसान यह भी मानते हैं कि खतरा बढ़ गया है। पहले इतना नुकसान नहीं होता था, अब हवा तेज है, सूखा ज्यादा है, आग काबू से बाहर हो जाती है।
कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञ डॉ. मारकंडेय सिंह के मुताबिक, डंठल जलाने से मिट्टी की ऊपरी परत का तापमान अचानक बढ़ जाता है, जिससे उसमें मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और केंचुए मर जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और अगले सीजन में उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि एक एकड़ डंठल जलाने से मिट्टी के हजारों रुपये के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें बाद में खाद और उर्वरक डालकर पूरा करना पड़ता है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर असर भी गहरा है। डंठल जलाने से निकलने वाला धुआं वायु में सूक्ष्म कण (पीएम 2.5) बढ़ाता है। जो फेफड़ों में जाकर गंभीर बीमारियां पैदा करता है।

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