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Siddharthnagar News: 10 साल बाद भी सर्वे अधूरा, खो रही सरहद की पहचान
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 15 Jun 2026 12:50 AM IST
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वक्त के साथ मिटती पहचान: बर्दिया के राजापुर-शंकरपुर स्थित दशगजा क्षेत्र में नेपाल-भारत सीमा का
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सिद्धार्थनगर। भारत-नेपाल सीमा के स्तंभों की सटीक पहचान और सीमांकन को लेकर वर्ष 2016 में ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) आधारित मैपिंग की योजना को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है।
दशकों पुरानी सीमांकन व्यवस्था को आधुनिक तकनीक से जोड़ने और भविष्य में किसी तरह की भ्रम की स्थिति न रहे, इस उद्देश्य से की गई पहल अब भी ठंडे बस्ते में है। 10 वर्ष बाद भी हालात ऐसे हैं कि नेपाल के आधिकारिक आंकड़ों में एक हजार से ज्यादा सीमा स्तंभ गायब और क्षतिग्रस्त हो गए हैं।
ऐसे में नेपाल सरहद पर भारतीय सीमा की पहचान खोने लगी है। आधुनिक मैपिंग की कवायद का असर जमीन पर क्यों नहीं दिखा? यह सवाल उठना लाजमी है।
भारत-नेपाल के बीच करीब 1,880 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। इस पूरी सीमा पर 8,553 स्तंभ स्थापित हैं, जिनके आधार पर दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमा निर्धारित होती है। वर्ष 2016 में दोनों देशों ने सीमा स्तंभों की जीएनएसएस आधारित मैपिंग और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने का निर्णय लिया था ताकि हर पिलर की सटीक लोकेशन दर्ज हो सके और भविष्य में किसी विवाद या भ्रम की स्थिति से बचा जा सके।
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जानकारों का कहना है कि इसके बावजूद तराई क्षेत्र में नदियों के कटाव, बाढ़, बदलते भूगोल और मानवीय दबाव के कारण सीमा स्तंभों की स्थिति लगातार प्रभावित होती रही। कई स्थानों पर पिलर क्षतिग्रस्त हुए, कुछ पूरी तरह गायब हो गए और कई जगह सीमा की पहचान भी धुंधली पड़ने लगी। सिद्धार्थनगर से सटे कपिलवस्तु क्षेत्र सहित पूरी तराई पट्टी में यह समस्या समय-समय पर सामने आती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल डिजिटल मैपिंग पर्याप्त नहीं होती। सीमा स्तंभों का नियमित सत्यापन, रख-रखाव और फील्ड स्तर पर निगरानी भी उतनी ही जरूरी है। यही वजह है कि जीएनएसएस रिकॉर्ड मौजूद होने के बावजूद सीमा पर कई स्थानों पर फिर से सर्वे और सत्यापन की जरूरत पड़ रही है। इसी पृष्ठभूमि में 16 जून को सिद्धार्थनगर में भारत और नेपाल के अधिकारियों की बैठक होने जा रही है।
हाल के दिनों में नेपाल सरकार की ओर से भी सीमा प्रबंधन को लेकर सक्रियता बढ़ी है। नेपाल के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से बताया है कि सीमा स्तंभों की पहचान, मरम्मत और पुनर्स्थापना के लिए चार संयुक्त फील्ड सर्वे टीमें काम कर रही हैं। साथ ही अगस्त 2026 में सीमा प्रबंधन पर संयुक्त कार्य समूह की बैठक भी प्रस्तावित है। संवादघ
दशकों पुरानी सीमांकन व्यवस्था को आधुनिक तकनीक से जोड़ने और भविष्य में किसी तरह की भ्रम की स्थिति न रहे, इस उद्देश्य से की गई पहल अब भी ठंडे बस्ते में है। 10 वर्ष बाद भी हालात ऐसे हैं कि नेपाल के आधिकारिक आंकड़ों में एक हजार से ज्यादा सीमा स्तंभ गायब और क्षतिग्रस्त हो गए हैं।
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ऐसे में नेपाल सरहद पर भारतीय सीमा की पहचान खोने लगी है। आधुनिक मैपिंग की कवायद का असर जमीन पर क्यों नहीं दिखा? यह सवाल उठना लाजमी है।
भारत-नेपाल के बीच करीब 1,880 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। इस पूरी सीमा पर 8,553 स्तंभ स्थापित हैं, जिनके आधार पर दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमा निर्धारित होती है। वर्ष 2016 में दोनों देशों ने सीमा स्तंभों की जीएनएसएस आधारित मैपिंग और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने का निर्णय लिया था ताकि हर पिलर की सटीक लोकेशन दर्ज हो सके और भविष्य में किसी विवाद या भ्रम की स्थिति से बचा जा सके।
जानकारों का कहना है कि इसके बावजूद तराई क्षेत्र में नदियों के कटाव, बाढ़, बदलते भूगोल और मानवीय दबाव के कारण सीमा स्तंभों की स्थिति लगातार प्रभावित होती रही। कई स्थानों पर पिलर क्षतिग्रस्त हुए, कुछ पूरी तरह गायब हो गए और कई जगह सीमा की पहचान भी धुंधली पड़ने लगी। सिद्धार्थनगर से सटे कपिलवस्तु क्षेत्र सहित पूरी तराई पट्टी में यह समस्या समय-समय पर सामने आती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल डिजिटल मैपिंग पर्याप्त नहीं होती। सीमा स्तंभों का नियमित सत्यापन, रख-रखाव और फील्ड स्तर पर निगरानी भी उतनी ही जरूरी है। यही वजह है कि जीएनएसएस रिकॉर्ड मौजूद होने के बावजूद सीमा पर कई स्थानों पर फिर से सर्वे और सत्यापन की जरूरत पड़ रही है। इसी पृष्ठभूमि में 16 जून को सिद्धार्थनगर में भारत और नेपाल के अधिकारियों की बैठक होने जा रही है।
हाल के दिनों में नेपाल सरकार की ओर से भी सीमा प्रबंधन को लेकर सक्रियता बढ़ी है। नेपाल के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से बताया है कि सीमा स्तंभों की पहचान, मरम्मत और पुनर्स्थापना के लिए चार संयुक्त फील्ड सर्वे टीमें काम कर रही हैं। साथ ही अगस्त 2026 में सीमा प्रबंधन पर संयुक्त कार्य समूह की बैठक भी प्रस्तावित है। संवादघ