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Siddharthnagar News: संकट में बदला ट्रांसपोर्ट का चेहरा... जब ऑटो हुए कम, ई-रिक्शा ने बढ़ाया दम
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 30 Mar 2026 01:11 AM IST
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- कम खर्च और आसान उपलब्धता से यात्रियों की पहली पसंद बने ई-रिक्शा
सिद्धार्थनगर। डीजल-पेट्रोल संकट के बीच जिले में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर बड़ा असर नहीं पड़ा है। ऑटो और अन्य ईंधन आधारित वाहनों की संख्या घटने के बावजूद ई-रिक्शा ने शहर की रफ्तार को थमने नहीं दी। पिछले दिनों डीजल-पेट्रोल न मिलने की वजह से तमाम ऑटो खड़े हो गए थे, मगर ई-रिक्शा लगातार उपलब्ध रहा। हालात यह हैं कि अब ज्यादातर छोटे और मध्यम रूट पर ई-रिक्शा ही लोगों की पहली पसंद बन गए हैं।
जिला मुख्यालय, बांसी, इटवा और डुमरियागंज जैसे कस्बों में बीते कुछ दिनों से पेट्रोल-डीजल की किल्लत के चलते ऑटो की उपलब्धता कम हो गई है। ऐसे में चौराहों और बाजारों तेतरी बाजार, पुराने नौगढ़ रोड और बस स्टैंड पर ई-रिक्शा की संख्या बढ़ती नजर आ रही है। खासकर अंदरूनी मोहल्लों और 2 से 5 किमी के रूट पर ई-रिक्शा ने पूरी तरह पकड़ बना ली है।
तेतरी बाजार के ई-रिक्शा चालक राजू निषाद बताते हैं, पहले दिन में 400-500 रुपये की कमाई होती थी, लेकिन अब 700-800 रुपये तक हो जा रही है। सवारी लगातार मिल रही है और इंतजार कम करना पड़ता है। वहीं, बांसी के चालक फिरोज कहते हैं कि डीजल महंगा होने से कई ऑटो खड़े हैं। लोग अब सीधे ई-रिक्शा ढूंढ़ते हैं, इससे हमारा काम बढ़ा है।
डुमरियागंज की रहने वाली रीना देवी बताती हैं, ऑटो नहीं मिलने से पहले काफी दिक्कत होती थी, लेकिन अब ई-रिक्शा हर जगह मिल जाता है। किराया भी 10-20 रुपये के भीतर रहता है, इसलिए रोजाना आने-जाने में राहत है। इटवा के छात्र सोनू कुमार का कहना है कि कॉलेज जाने के लिए पहले ऑटो का इंतजार करना पड़ता था, अब ई-रिक्शा तुरंत मिल जाता है। समय भी बच रहा है। परिवहन से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह बदलाव स्थायी रूप ले सकता है। यदि चार्जिंग स्टेशन और नियमन बेहतर किया जाए तो ई-रिक्शा शहर की मुख्य परिवहन धुरी बन सकते हैं।
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यातायात पुलिस की बढ़ी जिम्मेदारी
- यातायात प्रभारी उपनिरीक्षक अमरीश कुमार के अनुसार, ईंधन संकट के दौरान ई-रिक्शा ने परिवहन व्यवस्था को संभाला है, लेकिन इनकी संख्या बढ़ने से ट्रैफिक मैनेजमेंट चुनौतीपूर्ण हो गया है। प्रमुख चौराहों पर अतिरिक्त व्यवस्था की जा रही है और चालकों को नियमों का पालन करने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
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जिले में ई-रिक्शा की बढ़ती भूमिका
- जिले में अनुमानित ई-रिक्शा संख्या: 2500-3000
- प्रमुख रूट: तेतरी बाजार-नौगढ़, बांसी-नौगढ़, बांसी-इटवा, डुमरियागंज लोकल रूट
औसत किराया: ₹10 से ₹30 प्रति सवारी
दैनिक कमाई (चालक): ₹500 से ₹800 तक
बैटरी चार्जिंग खर्च: ₹80-₹120 प्रतिदिन
(सभी आंकड़े अनुमानित)
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बढ़ती संख्या से बढ़ी चुनौती
- चौराहों पर ई-रिक्शा की अधिकता से जाम की समस्या
- बिना तय स्टैंड के कहीं भी खड़े हो जाते हैं वाहन
- कई चालक बिना रजिस्ट्रेशन/नियमों के संचालन कर रहे
- यातायात पुलिस को नियंत्रण में अतिरिक्त मेहनत
- भविष्य में अलग स्टैंड और रूट तय करने की जरूरत
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सिद्धार्थनगर। डीजल-पेट्रोल संकट के बीच जिले में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर बड़ा असर नहीं पड़ा है। ऑटो और अन्य ईंधन आधारित वाहनों की संख्या घटने के बावजूद ई-रिक्शा ने शहर की रफ्तार को थमने नहीं दी। पिछले दिनों डीजल-पेट्रोल न मिलने की वजह से तमाम ऑटो खड़े हो गए थे, मगर ई-रिक्शा लगातार उपलब्ध रहा। हालात यह हैं कि अब ज्यादातर छोटे और मध्यम रूट पर ई-रिक्शा ही लोगों की पहली पसंद बन गए हैं।
जिला मुख्यालय, बांसी, इटवा और डुमरियागंज जैसे कस्बों में बीते कुछ दिनों से पेट्रोल-डीजल की किल्लत के चलते ऑटो की उपलब्धता कम हो गई है। ऐसे में चौराहों और बाजारों तेतरी बाजार, पुराने नौगढ़ रोड और बस स्टैंड पर ई-रिक्शा की संख्या बढ़ती नजर आ रही है। खासकर अंदरूनी मोहल्लों और 2 से 5 किमी के रूट पर ई-रिक्शा ने पूरी तरह पकड़ बना ली है।
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तेतरी बाजार के ई-रिक्शा चालक राजू निषाद बताते हैं, पहले दिन में 400-500 रुपये की कमाई होती थी, लेकिन अब 700-800 रुपये तक हो जा रही है। सवारी लगातार मिल रही है और इंतजार कम करना पड़ता है। वहीं, बांसी के चालक फिरोज कहते हैं कि डीजल महंगा होने से कई ऑटो खड़े हैं। लोग अब सीधे ई-रिक्शा ढूंढ़ते हैं, इससे हमारा काम बढ़ा है।
डुमरियागंज की रहने वाली रीना देवी बताती हैं, ऑटो नहीं मिलने से पहले काफी दिक्कत होती थी, लेकिन अब ई-रिक्शा हर जगह मिल जाता है। किराया भी 10-20 रुपये के भीतर रहता है, इसलिए रोजाना आने-जाने में राहत है। इटवा के छात्र सोनू कुमार का कहना है कि कॉलेज जाने के लिए पहले ऑटो का इंतजार करना पड़ता था, अब ई-रिक्शा तुरंत मिल जाता है। समय भी बच रहा है। परिवहन से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह बदलाव स्थायी रूप ले सकता है। यदि चार्जिंग स्टेशन और नियमन बेहतर किया जाए तो ई-रिक्शा शहर की मुख्य परिवहन धुरी बन सकते हैं।
यातायात पुलिस की बढ़ी जिम्मेदारी
- यातायात प्रभारी उपनिरीक्षक अमरीश कुमार के अनुसार, ईंधन संकट के दौरान ई-रिक्शा ने परिवहन व्यवस्था को संभाला है, लेकिन इनकी संख्या बढ़ने से ट्रैफिक मैनेजमेंट चुनौतीपूर्ण हो गया है। प्रमुख चौराहों पर अतिरिक्त व्यवस्था की जा रही है और चालकों को नियमों का पालन करने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
जिले में ई-रिक्शा की बढ़ती भूमिका
- जिले में अनुमानित ई-रिक्शा संख्या: 2500-3000
- प्रमुख रूट: तेतरी बाजार-नौगढ़, बांसी-नौगढ़, बांसी-इटवा, डुमरियागंज लोकल रूट
औसत किराया: ₹10 से ₹30 प्रति सवारी
दैनिक कमाई (चालक): ₹500 से ₹800 तक
बैटरी चार्जिंग खर्च: ₹80-₹120 प्रतिदिन
(सभी आंकड़े अनुमानित)
बढ़ती संख्या से बढ़ी चुनौती
- चौराहों पर ई-रिक्शा की अधिकता से जाम की समस्या
- बिना तय स्टैंड के कहीं भी खड़े हो जाते हैं वाहन
- कई चालक बिना रजिस्ट्रेशन/नियमों के संचालन कर रहे
- यातायात पुलिस को नियंत्रण में अतिरिक्त मेहनत
- भविष्य में अलग स्टैंड और रूट तय करने की जरूरत