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Siddharthnagar News: बाढ़ में नहीं भरा कटान का जख्म... फिर बढ़ने की सताने लगी चिंता
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Tue, 21 Apr 2026 02:35 AM IST
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भनवापुर ब्लॉक क्षेत्र के कोहलचक रमवापुर गांव के लोगों को हर साल झेलनी पड़ती है प्रकृति की दोहरी मार
सड़क बनाई गई न पुल पर भरी गई मिट्टी, दो माह बाद फिर वही हालत गांव का कट जाएगा
भनवापुर। भनवापुर ब्लॉक क्षेत्र के रमवापुर उर्फ नेबुआ के राजस्व गांव कोहलचक, रमवापुर और बड़हरा राप्ती नदी के मुहाने पर है। यहां हर साल बाढ़ सबकुछ छीन लेती है। कई दिनों टापू बने इस गांव के लोग बाढ़ के पानी खिसकने के दिन गिनते हैं। जब बाढ़ का पानी हट जाता है तो कई निशान छोड़ जाता है, ग्रामीण और उसे क्षेत्र से होकर गुजरने वालों के लिए जख्म जैसा हो जाता है।
बीते वर्ष राप्ती की तबाही में गांव को जोड़ने वाले पुल की जमीन ही खिसक गई, केवल जैसे-तैसे पड़ा है। सड़क कटकर बड़ा हिस्सा खत्म हो गया है, जहां से केवल बाइक और साइकिल से गुजर सकते हैं। अब मानसून आने में दो माह बचे हैं, लेकिन अब तक न सड़क पर मिट्टी डाली गई और न ही पुल को सही किया गया। अब न सिर्फ गांव की आबादी बल्कि उधर से गुजरने वालों में बाढ़ का डर और दहशत दिखने लगी है।
क्षेत्र का बड़हरा गांव डुमरियागंज नगर पंचायत से सटे विशाल तालाब और राप्ती नदी के बीच बसा है। गांव दूर से एक टापू की तरह लगता है। 50 घरों की करीब 400 आबादी वाले इस छोटे गांव के लोगों का गुजर-बसर दिहाड़ी की मजदूरी करके होता है। गांव की बुजुर्ग महिला डोपा ने बताया कि वर्ष 2025 में राप्ती नदी में जलस्तर बढ़ने से उसके गांव के लोगों के आने-जाने का एकमात्र रास्ता बंद हो गया था। इतना ही नहीं रास्ते में बना पुल भी टूट गया था। गांव के लोगों को यह दुर्दशा हर साल बाढ़ के सीजन में झेलनी पड़ती है। गांव के लोगों को इस समस्या से निजात दिलाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किए गए हैं। यहां न तो सड़क बनी है और न ही पुल ही सही किया गया है। अब बारिश में गांव के लोग निकल भी नहीं पाएंगे।
इसके अलावा यहां पहुंचने का कोई साधन नहीं है, जिसकी वजह से आग लगी की घटना में मदद भी नहीं पहुंच पाती है, जिससे बड़ा नुकसान होता है। इस 400 आबादी के अलावा भी आसपास गांव के लोग इसी मार्ग से गुजरते हैं। गांव निवासी राजाराम ने बताया कि बाढ़ का सीजन समाप्त होने के बाद गेहूं की कटाई होने पर आसपास के गांव के लोग जब पराली जला देते हैं तो उससे उठने वाली चिंगारी से उनके गांव में हर साल किसी न किसी तरफ आग लगती है। इससे लोगों का काफी नुकसान होता है। बीते 13 अप्रैल को बड़हरा गांव में पराली की आग से मूसे के घर आग लग गई थी, जिससे घर में रखा कपड़ा, अनाज व अन्य सामान जलकर राख हो गए थे।
मूसे ने बताया कि करीब तीन साल पहले 2023 में भी उसके घर इसी तरह आग लगी थी। उस समय भी उसे भारी नुकसान हुआ था। श्याम दुलारी ने बताया कि पूरे गांव के लोगों को साल भर हमेशा पानी और आग से खतरा बना रहता है। बाढ़ के दिनों में तो गांव के लोगों को रात जाग कर बितानी पड़ती है। नदी अपने विकराल रूप को धारण कर गांव के कुछ हिस्से को बहा ले जाती है, जिससे उनके बाप के पेड़ और बांस की कोठी भी बह जाती है। वर्ष 2025 में भी गांव के किनारे पर अली की आग जलते हुए पहुंच गई थी। इससे गांव में कुछ नुकसान हुआ था। गांव के लोगों की जागरूकता के कारण आग पर काबू पाया जा सका था।
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बड़हरा को बसाने का हुआ था प्रस्ताव
रमवापुर, कोहलचक, बड़हरा गांव को उसके ग्राम पंचायत रामापुर उर्फ नेबुआ में स्थित सरकारी जमीन में बसने का प्रस्ताव करीब 10 साल पहले हुआ था। मगर उस समय गांव के लोगों ने वहां बसने के बजाए डुमरियागंज नगर पंचायत में अस्थाई रूप से बनाए गए पीपुल्स इंटर कॉलेज के रैन बसेरे में रहना मुनासिब समझा था। हर साल बाढ़ की मार झेलने वाले ग्रामीण मानसून की आहट के साथ ही बेचैन हो जाते हैं। अगर अन्यत्र बस जाएं तो लोगों ग्रामीणों का संकट हमेशा के लिए दूर हो जाएगा।
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बोले जिम्मेदार
क्षेत्र के बड़हरा गांव राप्ती नदी और तालाब के बीच में स्थित है। राप्ती नदी का जलस्तर बढ़ने से तालाब में पानी आने लगता है। इससे उनका रास्ता डूब जाता है। गांव के लोगों काे आने-जाने के लिए नाव का प्रबंध करवाया जाता है। साथ ही हर संभव मदद भी की जाती है। गांव में आग से कुछ नुकसान होता है तो पीड़ितों को आर्थिक सहायता दिलवाई जाती है। सड़क और पुल पर काम कराए जाने के लिए दिशा- निर्देश दिए जाएंगे।
- राजेश कुमार, एसडीएम, डुमरियागंज
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सड़क बनाई गई न पुल पर भरी गई मिट्टी, दो माह बाद फिर वही हालत गांव का कट जाएगा
भनवापुर। भनवापुर ब्लॉक क्षेत्र के रमवापुर उर्फ नेबुआ के राजस्व गांव कोहलचक, रमवापुर और बड़हरा राप्ती नदी के मुहाने पर है। यहां हर साल बाढ़ सबकुछ छीन लेती है। कई दिनों टापू बने इस गांव के लोग बाढ़ के पानी खिसकने के दिन गिनते हैं। जब बाढ़ का पानी हट जाता है तो कई निशान छोड़ जाता है, ग्रामीण और उसे क्षेत्र से होकर गुजरने वालों के लिए जख्म जैसा हो जाता है।
बीते वर्ष राप्ती की तबाही में गांव को जोड़ने वाले पुल की जमीन ही खिसक गई, केवल जैसे-तैसे पड़ा है। सड़क कटकर बड़ा हिस्सा खत्म हो गया है, जहां से केवल बाइक और साइकिल से गुजर सकते हैं। अब मानसून आने में दो माह बचे हैं, लेकिन अब तक न सड़क पर मिट्टी डाली गई और न ही पुल को सही किया गया। अब न सिर्फ गांव की आबादी बल्कि उधर से गुजरने वालों में बाढ़ का डर और दहशत दिखने लगी है।
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क्षेत्र का बड़हरा गांव डुमरियागंज नगर पंचायत से सटे विशाल तालाब और राप्ती नदी के बीच बसा है। गांव दूर से एक टापू की तरह लगता है। 50 घरों की करीब 400 आबादी वाले इस छोटे गांव के लोगों का गुजर-बसर दिहाड़ी की मजदूरी करके होता है। गांव की बुजुर्ग महिला डोपा ने बताया कि वर्ष 2025 में राप्ती नदी में जलस्तर बढ़ने से उसके गांव के लोगों के आने-जाने का एकमात्र रास्ता बंद हो गया था। इतना ही नहीं रास्ते में बना पुल भी टूट गया था। गांव के लोगों को यह दुर्दशा हर साल बाढ़ के सीजन में झेलनी पड़ती है। गांव के लोगों को इस समस्या से निजात दिलाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किए गए हैं। यहां न तो सड़क बनी है और न ही पुल ही सही किया गया है। अब बारिश में गांव के लोग निकल भी नहीं पाएंगे।
इसके अलावा यहां पहुंचने का कोई साधन नहीं है, जिसकी वजह से आग लगी की घटना में मदद भी नहीं पहुंच पाती है, जिससे बड़ा नुकसान होता है। इस 400 आबादी के अलावा भी आसपास गांव के लोग इसी मार्ग से गुजरते हैं। गांव निवासी राजाराम ने बताया कि बाढ़ का सीजन समाप्त होने के बाद गेहूं की कटाई होने पर आसपास के गांव के लोग जब पराली जला देते हैं तो उससे उठने वाली चिंगारी से उनके गांव में हर साल किसी न किसी तरफ आग लगती है। इससे लोगों का काफी नुकसान होता है। बीते 13 अप्रैल को बड़हरा गांव में पराली की आग से मूसे के घर आग लग गई थी, जिससे घर में रखा कपड़ा, अनाज व अन्य सामान जलकर राख हो गए थे।
मूसे ने बताया कि करीब तीन साल पहले 2023 में भी उसके घर इसी तरह आग लगी थी। उस समय भी उसे भारी नुकसान हुआ था। श्याम दुलारी ने बताया कि पूरे गांव के लोगों को साल भर हमेशा पानी और आग से खतरा बना रहता है। बाढ़ के दिनों में तो गांव के लोगों को रात जाग कर बितानी पड़ती है। नदी अपने विकराल रूप को धारण कर गांव के कुछ हिस्से को बहा ले जाती है, जिससे उनके बाप के पेड़ और बांस की कोठी भी बह जाती है। वर्ष 2025 में भी गांव के किनारे पर अली की आग जलते हुए पहुंच गई थी। इससे गांव में कुछ नुकसान हुआ था। गांव के लोगों की जागरूकता के कारण आग पर काबू पाया जा सका था।
बड़हरा को बसाने का हुआ था प्रस्ताव
रमवापुर, कोहलचक, बड़हरा गांव को उसके ग्राम पंचायत रामापुर उर्फ नेबुआ में स्थित सरकारी जमीन में बसने का प्रस्ताव करीब 10 साल पहले हुआ था। मगर उस समय गांव के लोगों ने वहां बसने के बजाए डुमरियागंज नगर पंचायत में अस्थाई रूप से बनाए गए पीपुल्स इंटर कॉलेज के रैन बसेरे में रहना मुनासिब समझा था। हर साल बाढ़ की मार झेलने वाले ग्रामीण मानसून की आहट के साथ ही बेचैन हो जाते हैं। अगर अन्यत्र बस जाएं तो लोगों ग्रामीणों का संकट हमेशा के लिए दूर हो जाएगा।
बोले जिम्मेदार
क्षेत्र के बड़हरा गांव राप्ती नदी और तालाब के बीच में स्थित है। राप्ती नदी का जलस्तर बढ़ने से तालाब में पानी आने लगता है। इससे उनका रास्ता डूब जाता है। गांव के लोगों काे आने-जाने के लिए नाव का प्रबंध करवाया जाता है। साथ ही हर संभव मदद भी की जाती है। गांव में आग से कुछ नुकसान होता है तो पीड़ितों को आर्थिक सहायता दिलवाई जाती है। सड़क और पुल पर काम कराए जाने के लिए दिशा- निर्देश दिए जाएंगे।
- राजेश कुमार, एसडीएम, डुमरियागंज

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