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Sitapur News: मड़रुवा पहुंचा रामादल, भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
Updated Wed, 25 Feb 2026 12:21 AM IST
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सीतापुर। आस्था व उल्लास के साथ 84 कोसी परिक्रमा मंगलवार को सातवें पड़ाव मड़रुवा पहुंची। सातवें पड़ाव पर डेरा डालकर कोई भोजन बनाने में जुट गया तो कई परिक्रमार्थी सुस्ताते नजर आए। संतों ने आसन लगाकर उपदेश देना शुरू कर दिया। भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय हो गया। बुधवार की सुबह परिक्रमा आठवें पड़ाव जरिगवां के लिए निकलेगी।
पौराणिक 84 कोसी परिक्रमा हरदोई के चार पड़ाव पार करते हुए से चलकर शुक्रवार को छठें पड़ाव देवगवां पहुंची थी। यहां पर साधु-संतों व परिक्रमार्थयों डेरा डालकर विभिन्न मठ मंदिरों की पूजा अर्चना की। रात्रि विश्राम के बाद मंगलवार की सुबह गोमती में स्नान कर बोल कड़ाकड़ सीताराम का जयघोष करते हुए सातवें पड़ाव की ओर चल दिए। रास्ते में जगह-जगह लोगों ने परिक्रमार्थियों का स्वागत किया। ढ़ोल-मंजीरे की धुन पर राम नाम का संकीर्तन करते परिक्रमार्थी धर्मयात्रा पर आगे बढ़ते नजर आए। सुबह 10 बजे तक रामादल सातवें पड़ाव मड़रुवा पहुंचने लगा। यहां डेरा डालकर श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन शुरू कर दिया। संतों ने आसन लगाया तो श्रद्धालु व ग्रामीण प्रवचन सुनने पहुंच गए। पड़ाव स्थल पर मंगलवार की दोपहर कई श्रद्धालु भोजन बनाते जबकि तमाम परिक्रमार्थी थकान मिटाने के लिए आराम करते दिखाई दिए। स्थानीय ग्रामीण पड़ाव स्थल पर पहुंचकर रामादल की सेवा-सत्कार में जुट गए। हर तरफ भक्ति की बयार बहने लगी।
इस दौरान परिक्रमार्थियों ने शिवगंगा तीर्थ व प्रमोद वन आदि देव स्थानों के दर्शन कर पुण्य कमाया। इसी क्रम में चंद्रावल में चंद्र चंद्रनी, चंद्रावल देवी, मांडव ऋषि आश्रम, मंडरीक तालाब, लक्कड़ बाबा मंदिर के दर्शन भी किए। यहां रात्रि विश्राम कर बुधवार की सुबह परिक्रमा अपने आठवें पडाव जरिगवां के लिए प्रस्थान करेगी।
परिक्रमार्थियों ने दान किया लोटा-डोर
मान्यता है कि यहां पर मांडव ऋषि की कुटिया थी, मांडव ऋषि यहीं पर तपस्या करते थे। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम मड़रुआ पड़ा। इस स्थान पर आज भी मांडव ऋषि की प्रतिमा विद्यमान है। सातवें पड़ाव पर लोटा डोर का दान करने की परंपरा है। यहां बड़ी संख्या में परिक्रमार्थियों ने लोटा-डोर दान कर परंपरा का निर्वाहन किया।
परिक्रमा की अलौकिक अनुभूति से श्रद्धालु निहाल
इस परिक्रमा में शामिल श्रद्धालु पुण्य पथ पर जितना आगे बढ़ रहे हैं उनका उत्साह व उल्लास भी बढ़ता जा रहा है। परिक्रमार्थयों को इस धर्मयात्रा में अलौकिक अनुभूति हो रही है। नेपाल के काठमांडू की रहने वाली महंत मोहिनी दास ने बताया कि इससे पहले एक बार अकेले परिक्रमा किया था। परिक्रमा से आत्मसंतुष्टि व अनूठा अहसास मिला। उन्होंने बताया कि महंत बनने के बाद यह पहली परिक्रमा है। पुण्य पथ पर नई स्फूर्ति व ऊर्जा प्राप्त होती है।
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पौराणिक 84 कोसी परिक्रमा हरदोई के चार पड़ाव पार करते हुए से चलकर शुक्रवार को छठें पड़ाव देवगवां पहुंची थी। यहां पर साधु-संतों व परिक्रमार्थयों डेरा डालकर विभिन्न मठ मंदिरों की पूजा अर्चना की। रात्रि विश्राम के बाद मंगलवार की सुबह गोमती में स्नान कर बोल कड़ाकड़ सीताराम का जयघोष करते हुए सातवें पड़ाव की ओर चल दिए। रास्ते में जगह-जगह लोगों ने परिक्रमार्थियों का स्वागत किया। ढ़ोल-मंजीरे की धुन पर राम नाम का संकीर्तन करते परिक्रमार्थी धर्मयात्रा पर आगे बढ़ते नजर आए। सुबह 10 बजे तक रामादल सातवें पड़ाव मड़रुवा पहुंचने लगा। यहां डेरा डालकर श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन शुरू कर दिया। संतों ने आसन लगाया तो श्रद्धालु व ग्रामीण प्रवचन सुनने पहुंच गए। पड़ाव स्थल पर मंगलवार की दोपहर कई श्रद्धालु भोजन बनाते जबकि तमाम परिक्रमार्थी थकान मिटाने के लिए आराम करते दिखाई दिए। स्थानीय ग्रामीण पड़ाव स्थल पर पहुंचकर रामादल की सेवा-सत्कार में जुट गए। हर तरफ भक्ति की बयार बहने लगी।
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इस दौरान परिक्रमार्थियों ने शिवगंगा तीर्थ व प्रमोद वन आदि देव स्थानों के दर्शन कर पुण्य कमाया। इसी क्रम में चंद्रावल में चंद्र चंद्रनी, चंद्रावल देवी, मांडव ऋषि आश्रम, मंडरीक तालाब, लक्कड़ बाबा मंदिर के दर्शन भी किए। यहां रात्रि विश्राम कर बुधवार की सुबह परिक्रमा अपने आठवें पडाव जरिगवां के लिए प्रस्थान करेगी।
परिक्रमार्थियों ने दान किया लोटा-डोर
मान्यता है कि यहां पर मांडव ऋषि की कुटिया थी, मांडव ऋषि यहीं पर तपस्या करते थे। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम मड़रुआ पड़ा। इस स्थान पर आज भी मांडव ऋषि की प्रतिमा विद्यमान है। सातवें पड़ाव पर लोटा डोर का दान करने की परंपरा है। यहां बड़ी संख्या में परिक्रमार्थियों ने लोटा-डोर दान कर परंपरा का निर्वाहन किया।
परिक्रमा की अलौकिक अनुभूति से श्रद्धालु निहाल
इस परिक्रमा में शामिल श्रद्धालु पुण्य पथ पर जितना आगे बढ़ रहे हैं उनका उत्साह व उल्लास भी बढ़ता जा रहा है। परिक्रमार्थयों को इस धर्मयात्रा में अलौकिक अनुभूति हो रही है। नेपाल के काठमांडू की रहने वाली महंत मोहिनी दास ने बताया कि इससे पहले एक बार अकेले परिक्रमा किया था। परिक्रमा से आत्मसंतुष्टि व अनूठा अहसास मिला। उन्होंने बताया कि महंत बनने के बाद यह पहली परिक्रमा है। पुण्य पथ पर नई स्फूर्ति व ऊर्जा प्राप्त होती है।
