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UP: डेढ़ घंटे तक नहीं आई 108 एंबुलेंस, पिता की गोद में बेटे की माैत; 10 मिनट में पहुंचने का देते रहे आश्वासन

Fri, 07 Aug 2026 06:05 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़।
अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़। Published by: Aman Vishwakarma Updated Fri, 07 Aug 2026 06:05 AM IST
सार

Azamgarh News: चक्रपानपुर मेडिकल कॉलेज से बीएचयू रेफर किए गए गंभीर मरीज को डेढ़ घंटे तक 108 एंबुलेंस नहीं मिली। परिजनों को बार-बार 10 मिनट में एंबुलेंस पहुंचने का भरोसा दिया गया। मजबूरी में निजी एंबुलेंस से वाराणसी के लिए निकले, लेकिन रास्ते में पिता की गोद में बेटे ने दम तोड़ दिया। बताया गया कि मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर खाली नहीं था।

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108 ambulance failed arrive for hour and half son died in father lap despite assurances  in azamgarh
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : संवाद

विस्तार

UP News: आजमगढ़। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सुस्ती ने एक मासूम की जिंदगी छीन ली। मऊ जिले के रानीपुर फतेहपुर निवासी अंश (11) को समय पर 108 एंबुलेंस न मिलने के कारण इलाज के लिए वाराणसी नहीं पहुंचाया जा सका और रास्ते में पिता की गोद में ही उसने अंतिम सांस ले ली।

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इस घटना ने एक बार फिर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित पिता अमित के अनुसार, बुधवार शाम अंश की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

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उसे पहले चिरैयाकोट के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने हालत गंभीर बताते हुए राजकीय मेडिकल कॉलेज, चक्रपानपुर ले जाने की सलाह दी। मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर की जरूरत है, लेकिन वहां कोई वेंटिलेटर खाली नहीं था। इसके बाद उसे बीएचयू, वाराणसी रेफर कर दिया गया।

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अंश के पिता ने तुरंत बाद 108 एंबुलेंस सेवा पर कॉल किया। आरोप है कि हर बार उन्हें यही कहा जाता रहा कि एंबुलेंस 10 मिनट में पहुंच रही है, लेकिन इंतजार करते-करते करीब डेढ़ घंटे बीत गए। इस दौरान मासूम की हालत लगातार बिगड़ती रही और परिजन बेबस होकर मदद का इंतजार करते रहे।

जब कोई सरकारी एंबुलेंस नहीं पहुंची तो परिवार ने उधार और मदद लेकर निजी एंबुलेंस की व्यवस्था की। परिजन बच्चे को लेकर वाराणसी के लिए रवाना हुए, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। बीएचयू पहुंचने से पहले ही रास्ते में अंश ने अपने पिता की गोद में दम तोड़ दिया।

बेटे को तड़पते हुए खोने का दर्द पिता की आंखों में साफ दिखाई दे रहा था। इस दर्दनाक घटना ने स्वास्थ्य विभाग की आपातकालीन सेवाओं, 108 एंबुलेंस की उपलब्धता और मेडिकल कॉलेजों में गंभीर मरीजों के लिए पर्याप्त वेंटिलेटर जैसी सुविधाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

परिजनों का आरोप है कि यदि समय पर एंबुलेंस उपलब्ध हो जाती और रेफरल व्यवस्था प्रभावी होती, तो संभव है कि मासूम अंश की जान बचाई जा सकती थी। परिजन पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

समय से मिल जाता इलाज तो बच सकती थी जान
मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक कृष्णकांत ने बताया कि बच्चे के फेफड़े में पानी जमा हो गया था। उसकी हालत गंभीर थी। इसके लिए बीएचयू में भी बात की गई थी। परिजन एंबुलेंस के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। पीड़ित के पिता अमित ने आरोप लगाया कि अगर समय से एंबुलेंस मिल गई होती तो शायद बेटा बीएचयू पहुंच जाता और आज मेरा बेटा मेरे साथ होता।

डेढ़ घंटे तक सरकारी एंबुलेंस का इंतजार करना पड़ा। उधर, 108 नंबर के प्रभारी अजय ने बताया कि जिले में 108 एंबुलेंस का औसत रिस्पांस टाइम सात मिनट है। बुधवार की रात पहला फोन रात 9:09 बजे आया था। रात 9:45 बजे एंबुलेंस मेडिकल कॉलेज पहुंच गई थी और मरीज को ले जाने के लिए तैयार थी।

राजकीय मेडिकल कॉलेज से प्रतिदिन 15 से 16 मरीज रेफर होते हैं। मेडिकल कॉलेज में दो से तीन एंबुलेंस लगाई गई हैं। इनमें कई वाहन रेफर मरीजों को ले जाने में व्यस्त रहते हैं। - सुमित सिंह, 108 रीजनल मैनेजर।

रात में एक एंबुलेंस बीएचयू मरीज लेकर गई थी। दूसरी तरवां से मरीज लेकर मेडिकल कॉलेज आ रही थी। उसके चालक ने बताया था कि जैसे ही वह वहां पहुंचेगा, मरीज को लेकर फिर वाराणसी के लिए निकल जाएगा। जब एंबुलेंस वहां पहुंची तो कॉलर ने 108 एंबुलेंस लेने से मना कर दिया और निजी एंबुलेंस से जाने लगे। इसी दौरान बच्चे की मृत्यु हो गई। - अजय, प्रभारी 108 एंबुलेंस।

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