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बुढ़वा मंगल: काशी की 300 साल की परंपरा को संजोने के लिए बजट नहीं, इक्का-दुक्का संस्थाएं निभा रहीं परंपरा

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Tue, 17 Mar 2026 05:58 PM IST
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सार

Varanasi News: काशी की 300 साल की परंपरा बुढ़वा मंगल को संजोने के लिए 2017 से कोई बजट नहीं आ रहा है। कभी काशी की इस ठाट-बाट और मौज-मस्ती की रवानी के लोग मुरीद होते थे। 

Budhwa Mangal 2026 No Budget to Preserve Kashi 300-Year-Old Tradition in Varanasi
बुढ़वा मंगल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

काशी की प्राचीनता बताती है कि यहां की परंपराएं देश-विदेश में एक अहम स्थान रखती हैं। पर्व, त्योहार, उत्सव यहां की की जिंदगी हैं। इसकी एक कड़ी होली के बाद होने वाले बुढ़वा मंगल के ठाट-बाट की है, जो 300 साल पहले की रवायत है। मगर, अब यह रस्म अदायगी भर ही है। बदलते वक्त ने इसकी मौज-मस्ती की रवानी की धार को कुंद कर दिया है। न रस से भरे आयोजक मिलते हैं और न रसिये। जिम्मेदार प्रशासन ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। इस बार यह पर्व 17 मार्च को मनाया जाएगा।

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नृत्य, संगीत की महफिलों से सजी नौकाओं की अठखेलियों वाला विश्व का अनूठा जल उत्सव बुढ़वा मंगल होली के बाद पहले मंगलवार को मनाने की परंपरा रही है। मगर, नए-नए आए रहनुमाओं ने अपनी सुविधानुसार इसे दूसरे मंगलवार को मनाना शुरू कर दिया।
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इस उत्सव को इक्का-दुक्का संस्थाएं परंपरा को जीवंत रखने के लिए दम भर रही हैं। मगर, प्रशासन की नुमाइंदगी नहीं दिखती है। इस उत्सव की उत्कृष्टता को देखने और एहसास कर जीने वाले नव गीतकार सुरेंद्र बाजपेयी कहते हैं कि अब न वो मस्ती दिखती है और न रौनक। रस्म अदायगी भर रह गई है।

वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि फागुन की विदाई के बाद नववर्ष के आगमन को वृद्ध अंगारक पर्व के रूप में मनाते हैं। मूलरूप से यह रईसों का पर्व है। इनके साथ आम लोग भी पहुंचकर आनंद उठाने लगे। फिर यह सार्वजनिक हो गया। एक दशक से अधिक समय तक बनारस और शासन में संस्कृति अधिकारी के रूप में कार्य करने वाले सेवानिवृत्त डॉ. रत्नेश वर्मा ने इस उत्सव को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। कई साल तक बजड़े पर आयोजन हुआ। 2017 में इनकी सेवानिवृत्त के बाद संस्कृति विभाग का कोई अधिकारी नहीं आया। इस विभाग का प्रभार पुरातत्व विभाग के पास लंबे समय से है। तब से इस आयोजन के लिए कोई बजट भी नहीं आया।

गिरता-संवरता रहा बुढ़वा मंगल
सुरेंद्र बाजपेयी ने बताया कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के दौर में यह उत्सव अपनी ऊंचाई पर पहुंचा। कुछ दशक बाद फिर बंद होने के कगार पर पहुंच गया। मगर, व्यापारी घनश्याम गुप्ता, नवगीतकार व साहित्यकार अशोक मिश्र सामयिक, शंभूनाथ सिंह, होरीलाल, पन्नालाल, विद्यानारायण आदि के प्रयास से एक बार फिर अपने मौलिक रूप में आया। बुढ़वा मंगल की महफिल जब सजती थी, तब गंगा में मेला का रेला दिखता था। बड़े-बड़े बजड़ों पर महफिल सजती थी। हिंदू-मुसलमान सभी इस मेले में परंपरागत पोशाक में पहुंचते थे।

सुर-साज संग गणिकाओं की बिखरती थी नृत्य की आभा
बुढ़वा मंगल में बनारस के अलावा अन्य घरानों के कलाकारों के साथ ही बाहर से गणिकाएं आती थीं। उनका मोहक नृत्य होता था। बड़ी मोती, राजेश्वरी बाई, सरस्वती बाई, विद्याधरी, हुस्ना बाई, तौखी, मैना बाई, छोटी मोती, सरस्वती बाई, विद्याधरी, हुस्ना बाई जैसी गायिकाएं ध्रुपद, धमार, बिहाग, मालकौस आदि रागों पर चैत के नवरंग को मदमस्त बना देती थीं। बुढ़वा मंगल में गिरिजा देवी, सिद्धेश्वरी देवी, किशन महाराज, महादेव प्रसाद, कोदई महाराज, बिस्मिल्लाह खां, राजन-साजन मिश्र, छन्नूलाल मिश्र जैसे कलाकारों की भी प्रस्तुतियां हो चुकी हैं।

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रुस्तम अली ने शुरू किया था वृद्ध अंगारक उत्सव
लखनऊ के नवाबों के प्रतिनिधि के रूप में मीर रुस्तम अली ने बनारस में 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बुढ़वा मंगल स्थापित किया था। पहले काशी में वृद्ध अंगारक उत्सव के नाम से यह आयोजन प्रचलन में था। हालांकि चैत्र कृष्ण पक्ष के मंगल को मानता था, तब सामूहिक जल यात्रा के रूप में मनाता था। शुरू में इस उत्सव में संकटमोचन हनुमान के दर्शन पूजन का भी विधान रहा। इसीलिए मंगलवार को ही होने से इसकी पहचान बन गई।
 
अधिकारी बोले
विभाग की ओर से बुढ़वा मंगल का आयोजन कई वर्षों से बंद है। शासन से इसके लिए कोई बजट भी नहीं आता है, जिससे आयोजन करवाया जा सके। संस्थाएं ही मिलकर आयोजन करती हैं। -रामनरेश पाल, क्षेत्रीय जिला पुरातत्व अधिकारी/प्रभारी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र
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