साहित्यिक मंच एवं विद्याश्री न्यास की ओर से पं. विद्यानिवास मिश्र की जयंती पर वक्ताओं ने हिंदी की महत्ता पर चर्चा की। अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि काशी को सही रूप में जानने के लिए रुद्र काशिकेय की अमर कृति बहती गंगा को पढ़ना भी जरूरी है। इसमें पूरी विस्तृत जानकारी मिल जाएगी।
जिला पुस्तकालय सभागार में आयोजित व्याख्यानमाला में रुद्र काशिकेय और नजीर बनारसी के योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई। प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि काशी की साहित्यिक परंपरा में शिव प्रसाद मिश्र, रुद्र काशिकेय और नजीर बनारसी ऐसे नाम हैं, जो काशी की जीवंत संस्कृति के संवाहक होने के साथ पाठकों के मन में बनारस को गहराई से समझने की उत्कंठा भी जगाते हैं। बहती गंगा का हर अंश अपने आप में संपूर्ण है और समग्र रूप में वह काशी की भोर, उजास, आंखों की चमक, बतकही और फक्कड़पन का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। वहीं, नजीर बनारसी की शायरी में गंगा-जमुनी तहजीब का अनुपम स्वर दिखाई देता है। विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि काशी की सृजन परंपरा पर आयोजित यह व्याख्यानमाला की 13वीं कड़ी है, जो काशी के साहित्य की पहचान को सहेजने का प्रयास है। संचालन शिवकुमार पराग और धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। इस दौरान डाॅ. रामसुधार सिंह, प्रकाश उदय, दीपेश चौधरी, गिरीश पांडेय, संतोष प्रीत, रामजतन पाल आदि मौजूद रहे।