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UP: बढ़ते तापमान ने बढ़ाई किसानों की चिंता चिंता, वैज्ञानिक बोले- 20 दिन पर गेहूं की फसल की करें हल्की सिंचाई

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Mon, 16 Mar 2026 02:27 PM IST
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सार

Varanasi News: बढ़ते तापमान ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में वैज्ञानिक का कहना है कि 20 दिन पर गेहूं की फसल की हल्की सिंचाई करें, नहीं तो 25 फीसदी गेहूं की पैदावार घट सकती है। 

Rising temperatures could reduce wheat crop yields in Varanasi
गेहूं की फसल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

मार्च में ही तापमान बढ़ने से किसानों की चिंता बढ़ने लगी है। इससे गेहूं के दाने कमजोर हो जाएंगे और उत्पादन में गिरावट आएगी। ऐसे में कृषि वैज्ञानिक किसानों की चिंता को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने हर 20 दिनों पर हल्की सिंचाई करने का सुझाव दिया। कहा कि प्रयास करें कि सिंचाई रात में करें। फसल में नमी से गेहूं के दानों का विकास होगा। तेज हवा के दौरान सिंचाई करने से बचें। इससे फसल गिरने का डर रहता है।

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मार्च और अप्रैल में गेहूं के दाने का विकास होता है। इसके दाने बड़े होते हैं। मगर, इन दोनों माह में तापमान बढ़ने से गेहूं के उत्पादन पर काफी असर पड़ेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी तापमान 33 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तक पहुंच गया है। इसका असर फसल की उत्पादकता पर पड़ेगा।
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फसल समय से पहले पक जाती है तो दाने सिकुड़ जाते हैं और इससे उत्पादन में करीब 15 से 25 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। जबकि अभी पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में गेहूं की फसल दूधिया दाने की अवस्था में है, जो दाने के विकास के लिए संवेदनशील अवस्था मानी जाती है।


फोटो: सुधांशु सिंह

इरी की दक्षिण एशिया की शाखा आइसार्क के कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं की फसल पर बढ़ते तापमान के प्रभाव को कम करने के लिए तात्कालिक उपायों में समय पर सिंचाई करना सबसे प्रभावी उपाय है। इससे मिट्टी में पर्याप्त नमी रहने से फसल का आवरण ठंडा रहेगा। इससे दानों का समुचित विकास होगा।

आईसार्क के निदेशक डॉ. सुधांशु सिंह ने बताया कि गेहूं की अच्छी उपज के लिए समय पर बोआई जरूरी है। गेहूं की बोआई नवंबर के पहले पखवाड़े में करना सबसे अच्छा होता है, ताकि गर्मी आने के पहले ही गेहूं का दाना बन जाए। 20 नवंबर के बाद बोई गई गेहूं की फसल में बढ़ते तापमान से काफी प्रभाव पड़ेगा। डॉ. सुधांशु सिंह ने बताया कि दाना भराव वाले चरण के दौरान प्रति हेक्टेयर प्रतिदिन करीब 40–50 किलोग्राम उपज की कमी होने लगती है।

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