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UP News: 29 साल पहले पुलिस अभिरक्षा में मौत के मामले में दो दरोगा-डॉक्टर दोषी, कोर्ट ने सुनाई सजा

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Tue, 02 Jun 2026 03:11 PM IST
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सार

Varanasi News: 29 साल पहले पुलिस अभिरक्षा में मौत के मामले में दो सेवानिवृत्त दरोगा और डॉक्टर दोषी करार हुए। अदालत ने तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 साल की सजा, 31 हजार रुपये जुर्माना लगाया। वहीं राधेश्याम सिंह को छह महीने की सजा सुनाई गई।

Two Retired Sub-Inspectors and Doctor Convicted in Case of Death in Police Custody in Varanasi
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार

विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) अमित कुमार तिवारी की अदालत ने लंका थाना क्षेत्र में 29 वर्ष पुराने पुलिस हिरासत में राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत के मामले में सोमवार को दो सेवानिवृत्त दरोगा और एक सेवानिवृत्त डॉक्टर को दोषी करार दिया। अदालत ने दरोगा रहे नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 साल की सजा सुनाई। साथ ही 31 हजार रुपये जुर्माना लगाया। दरोगा रहे राधेश्याम सिंह को छह महीने की सजा सुनाई गई। 



काशी के प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके जैन को पांच साल की सजा मिली है। डॉ. केके जैन पर 40 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया है। वह आईएमए के वरिष्ठ सदस्य हैं। मंडलीय अस्पताल कबीरचौरा से सेवानिवृत्त हुए हैं। अभियोजन के मुताबिक, पुलिस अभिरक्षा में मौत के मामले में 40 साल में पहली बार ऐसी सजा सुनाई गई है जिसमें दो सेवानिवृत्त दरोगा और डॉक्टर दोषी पाए गए हैं।
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दोषी राधेश्याम सिंह गोरखपुर के हरपुर बुदहट का रहने वाला है। नरेंद्र प्रताप सिंह प्रयागराज के हंडिया के निवासी है। अभियोजन के मुताबिक, जंसा थाना क्षेत्र के बखरिया गांव निवासी राजेंद्र प्रसाद सिंह वर्ष 1997 में अपने बेटे की दवा लेने शहर आए थे। महानगर बस से सुंदरपुर जा रहे राजेंद्र का सीट के लिए एक यात्री से विवाद हो गया। 
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आरोप था कि सुंदरपुर पुलिस चौकी पर तैनात तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह राजेंद्र को पुलिस चौकी ले गया और विवाद करने वाले यात्री दयाराम की जेब से 100 रुपये चोरी करने का आरोप लगाया। पुलिस चौकी पर प्रताड़ना के दौरान राजेंद्र की मौत हो गई। इसके बाद लंका थाने की पुलिस ने राजेंद्र के खिलाफ चोरी की प्राथमिकी दर्ज की और मामले की विवेचना तत्कालीन दरोगा राधेश्याम सिंह को सौंप दी। राधेश्याम ने जांच में राजेंद्र की मौत को आत्महत्या बताया। 

पुलिस का दावा था कि राजेंद्र ने अपने शॉल के सहारे पंखे से लटक कर जान दे दी थी। मौत के अगले दिन बीएचयू में पोस्टमार्टम कराया गया जिसे मंडलीय अस्पताल के तत्कालीन डॉ. केके जैन ने किया था। डॉ केके जैन ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट दी और मौत का कारण दम घुटने से मौत बताई। रिपोर्ट के मुताबिक राजेंद्र ने फंदा लगाकर जान दी थी। पुलिस ने परिजनों को सूचना नहीं दी और हरिश्चंद्र घाट पर राजेंद्र का अंतिम संस्कार कर दिया।

इस मामले को राजेंद्र की पत्नी ने उठाया और मानवाधिकार आयोग से शिकायत दर्ज कराई। शासन ने भी मामले का संज्ञान लिया और जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई। जांच अधिकारी इंस्पेक्टर श्रीकांत पांडेय ने जांच की और मामले को साजिश करार दिया। रिपोर्ट में बताया कि राजेंद्र की मौत पुलिस अभिरक्षा में प्रताड़ना से हुई है। 

जांच अधिकारी ने तत्कालीन लंका थानाध्यक्ष हसन अब्बास समेत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। मुकदमे के दौरान अवध मणि त्रिपाठी और कविंद्र नारायण सिंह को आरोपों से मुक्त कर दिया गया। वहीं कांस्टेबल श्रीनिवास शुक्ला और अनिरुद्ध यादव को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया। 

अदालत ने गवाहों के बयान और उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर राधेश्याम सिंह, डॉ. केके जैन, और नरेंद्र प्रताप सिंह को दोषी करार दिया। साथ ही सजा सुना दी।

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