गंगा घाट पर अनोखी गुरुकुल परंपरा: न फीस, न शुल्क, तैराकी सीखो और मां गंगा को चढ़ाओ लड्डू; जानें खासियत
Varanasi News: गंगा घाट पर कन्हैया पहलवान पिछले 15 वर्षों से अनोखी गुरुकुल परंपरा के तहत नि:शुल्क तैराकी सिखा रहे हैं। यहां न कोई फीस ली जाती है और न ही कोई शुल्क। प्रशिक्षण पूरा होने पर शिष्य मां गंगा को लड्डू अर्पित करते हैं। बाढ़ और डूबने की घटनाओं से लोगों को बचाने के संकल्प के साथ वह अब तक 900 से अधिक बच्चों, युवाओं और महिलाओं को तैराकी सिखा चुके हैं।
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Swimming in Ganga River: जहां एक ओर तैराकी सीखने के लिए लोग बड़े-बड़े स्विमिंग पूल और प्रशिक्षण केंद्रों का सहारा लेते हैं, हजारों रुपये खर्च करते हैं, वहीं डोमरी में गंगा किनारे एक ऐसी अनोखी पाठशाला चल रही है जहां बच्चों, युवाओं और महिलाओं को पूरी तरह नि:शुल्क तैराकी सिखाई जाती है। इस पाठशाला के संचालक हैं सूजाबाद के कन्हैया पहलवान। जो पिछले 15 वर्षों से मां गंगा की गोद में लोगों को तैराकी का प्रशिक्षण दे रहे हैं। बाढ़ के समय गंगा में कोई न डूबे इस संकल्प के साथ उन्होंने इस प्रशिक्षण की शुरुआत की थी।
कन्हैया पहलवान का उद्देश्य केवल तैराकी सिखाना नहीं, बल्कि गंगा किनारे रहने वाले लोगों को जल सुरक्षा के प्रति जागरूक करना और डूबने की घटनाओं को रोकना है। उनका मानना है कि गंगा किनारे रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को तैरना आना चाहिए, ताकि किसी भी आपात स्थिति में वह अपनी और दूसरों की जान बचा सके।
कन्हैया पहलवान के पिता स्व. रामजी उर्फ चिल्लर राष्ट्रीय स्तर के पहलवान थे। गायघाट, वाराणसी में जन्मे कन्हैया ने छह वर्ष की आयु से ही तैराकी और पहलवानी शुरू कर दी थी। युवावस्था में उन्होंने पूर्वांचल के कई प्रतिष्ठित दंगलों में हिस्सा लेकर पुरस्कार भी जीते।
वर्तमान में वे वाराणसी के मच्छोदरी स्थित एक प्रिंटिंग प्रेस में ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हैं। गंगा से उनका लगाव बचपन से रहा है। रोजाना गंगा स्नान, दंड-बैठक और तैराकी उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहा। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि गंगा किनारे रहने वाले अनेक लोग तैरना नहीं जानते और हर वर्ष डूबने की घटनाएं होती रहती हैं।
इसी सोच के साथ लगभग 15 वर्ष पूर्व गायघाट पर नि:शुल्क तैराकी प्रशिक्षण शुरू किया। बाद में सूजाबाद में बसने के बाद उन्होंने डोमरी गंगा घाट को प्रशिक्षण का केंद्र बना दिया। आज डोमरी घाट पर प्रतिदिन सुबह और शाम प्रशिक्षण चलता है।
केवल बाढ़ के दिनों में सुरक्षा कारणों से इसे अस्थायी रूप से बंद किया जाता है। अब तक 900 से अधिक लोगों को तैराकी सिखा चुके कन्हैया पहलवान के पास प्रशिक्षण लेने के लिए किसी उम्र की बाध्यता नहीं है। पांच वर्ष के बच्चों से लेकर बुजुर्ग और महिलाएं तक यहां तैराकी सीखने पहुंचते हैं।
प्रशिक्षण पूरा होने पर मां गंगा को चढ़ाना होता है प्रसाद
वर्तमान में सूजाबाद के शांतनु यादव, तेजस वर्मा, अंश यादव, हर्ष यादव, सत्यम गुप्ता, दिव्या केसरी, अनन्या साहनी, प्रिंस यादव, उज्ज्वल यादव, कटेसर के दानियाल, नींबूपुर के यादवेश यादव सहित कई प्रशिक्षु नियमित रूप से प्रशिक्षण ले रहे हैं।
पीडीडीयू नगर की दो महिलाएं भी इन दिनों तैराकी सीख रही हैं। प्रशिक्षण की सबसे खास बात यह है कि इसे पूरी तरह निशुल्क रखा गया है। प्रशिक्षण पूरा होने पर प्रशिक्षुओं से केवल मां गंगा को लड्डू चढ़ाने के लिए कहा जाता है। बाद में वही प्रसाद सभी लोगों में बांट दिया जाता है। कन्हैया पहलवान कहते हैं कि इससे गुरु-शिष्य परंपरा, आस्था और सामाजिक समरसता तीनों का संदेश मिलता है।
सम्मान और सुरक्षा के साथ प्रशिक्षण देना प्राथमिकता
कन्हैया पहलवान बताते हैं कि अब तक 50 से अधिक महिलाओं को तैराकी सिखा चुके हैं। प्रशिक्षण के दौरान वे महिलाओं को कभी स्पर्श नहीं करते। केवल तकनीक और अभ्यास की विधि समझाकर उन्हें आत्मविश्वास के साथ तैरना सिखाते हैं। उनका कहना है कि सम्मान और सुरक्षा के साथ प्रशिक्षण देना उनकी प्राथमिकता है। यही कारण है कि महिलाओं और उनके परिजनों का उन पर विशेष भरोसा है।
बाढ़ में जान बचाने का मिशन
गंगा और उसकी सहायक नदियों में हर वर्ष डूबने की घटनाएं होती हैं। कन्हैया पहलवान का मानना है कि यदि गंगा किनारे के अधिकांश लोगों को तैरना आ जाए तो कई जानें बचाई जा सकती हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने इसे सामाजिक अभियान का रूप दिया है। उनका सपना है कि हर गांव और घाट पर तैराकी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित हों।
तैराकी केवल खेल नहीं, जीवन रक्षा का कौशल है। मेरा प्रयास है कि गंगा किनारे रहने वाला कोई भी बच्चा, महिला या युवक पानी के कारण अपनी जान न गंवाए। जब तक जिंदगी है नि:शुल्क यह सेवा करता रहूंगा। - कन्हैया पहलवान, तैराकी प्रशिक्षक।